अखिलेश का अतिआत्मविश्वास व तुनकमिजाजी ,सपा को पड़ गया भारी

Politics उत्तर प्रदेश

चापलूसों से यारी मिशनरी नेताओ को किया किनारा ऐसे तो सपा हो जाएगी बेसहारा

पुरानी गलतियों से सबक ले अखिलेश नही कुछ बचेगा नही शेष

सोनिका मौर्या

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से वंचित समाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव 2022 में भी मात्र कुछ सीटों से संतोष करना पड़ गया ।एक बार फिर वह सत्ता से बाहर हो गई है । वह भी ऐसे हालात में जब देश और प्रदेश के अंदर जनता के हित को लेकर अनगिनत मुद्दे उनके बीच में रहे है जो विरोधियों को हराने के लिए पर्याप्त थे ।

समाजवादी विचारधारा पर निर्भर राजनीतिक पार्टी समाजवादी पार्टी जब अपने वास्तविक मुद्दों को छोड़कर ,लुभावने मुद्दों की ओर बढ़ेगी तो स्वाभाविक है कि उसे अपेक्षित परिणाम नही मिलेंगे ,यही कारण है कि एक बार फिर जनता ने उसे अपना जनादेश न देकर सत्ता सौंपने से इंकार कर चुकी है ।

4 नवम्बर 1992 को अस्तित्व में आई समाजवादी पार्टी को एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विचारधारा के साथ, एक समाजवादी समाज बनाने में विश्वास करने वाले दल के रूप में स्थापित किया गया है, जिसे समानता के सिद्धांत पर काम करना था। समाजवादी पार्टी समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान की दिशा में लगातार अपने पिछले कार्यकाल में काम कर चुकी है और यह सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मजबूती से लड़ने का दावा भी करती है ।

लेकिन एक लंबी पारी खेलने के बाद कभी पारिवारिक अंतर्कलह तो कभी जातिगत आरोपों के बीच इस पार्टी ने सत्ता में भले आने का प्रयास किया ,परन्तु वह सफल नही हो सकी ।

इस विधानसभा चुनाव परिणाम में इस पार्टी को भले सम्मानजनक हार का सामना करना पड़ा लेकिन इस बात को भी साबित कर दिया कि मौजूदा सरकार के नीतियों से नाराज जनता ने इस पार्टी पर भरोसा जताते हुए ,इसे पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले सम्मानजनक स्थिति में लाकर मजबूत विपक्ष का विकल्प दे दिया ।

वास्तविक मुद्दों को जनता तक पहुँचाने में हुए विफल :

यह माना जाता है कि राजनीति हमेशा संभावना पर केंद्रित होती है , देश मे सिटीजन अमेंडमेंट एक्ट पर बिगड़े हालात, किसान आंदोलन ,बेरोजगारी ,महंगाई दर,आरक्षण, जाति जनगणना का बड़ा मुद्दा समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो के लिए पर्याप्त था ,जिसके आधार पर वंचित समुदाय को एकत्रित करके वोट में तब्दील करने का उनके पास भरपूर अवसर था ,लेकिन कमजोर संगठन का अनुमान अखिलेश यादव को पहले से नही था, जनपदों में समाजवादी पार्टी की मुख्य संगठन ,विधानसभाओं से लेकर बूथ तक खेमेबंदी में बंटी रही है । टिकट वितरण को लेकर उनकी ही पार्टी की नाराजगी उनको दिखाई नही दी,बल्कि उन्हें रैलियों में उमड़ी भीड़ से यह आत्मविश्वास हो गया था कि यह चुनावी लहर उनके पक्ष में है । बाकी कसर उनके इर्द-गिर्द मौजूद वरिष्ठ नेताओं ने पूरी कर दिया था ,जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा ।

मीडिया को भी नजरअंदाज करना पड़ गया भारी :

इसमें कहने में कोई गुरेज नही है कि अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के वह नेता है,जो लगातार अपनी बातों को मीडिया से कहते आये है । और मीडिया के सवालों का बेबाकी से जवाब भी देते रहे है,लेकिन चुनाव के दौरान मीडिया पर उनकी भड़ास भी सुर्खियों का कारण रही है, प्रेस कांफ्रेंस में भी लगातार मीडिया के वर्गीकरण को सार्वजनिक करते रहे । जबकि यह सच था कि गोदी मीडिया से ज्यादा बेव चैनलों के पत्रकार उनके वास्तविक मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाने में मददगार रहे है । लेकिन अंततः अखिलेश यादव ने इनके सवालों का जवाब देने के बजाय इन्हें हल्का पत्रकार या छोटा पत्रकार कहना शुरू कर दिया । जिससे इन पत्रकारों में भी विमुखता आ गई ,जिसका परिणाम यह निकलकर आया कि इन पत्रकारों ने उनके वाजिब मुद्दों पर लिखना और दिखाना बन्द कर दिया ।

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