जानिये क्यों है: बीजेपी का हृदय मस्तिष्क अंग, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने वाला संगठन आरएसएस कैसे काम करता है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)में सबसे मुख्य रोल ‘प्रचारक’ का होता है। प्रचारक- पर्चे बाँटने वाला नहीं। प्रचारक आजीवन विवाह ना करने का संकल्प लेने वाले उस कार्यकर्ता को कहते हैं, जो RSS की विचारधारा के प्रसार के लिए ज़िंदगी समर्पित करता है।

प्रचारक, RSS की प्रशासनिक मशीनरी की तरह काम करते हैं। जैसे नगर प्रचारक, फिर वो तहसील प्रचारक बनता है, फिर ज़िला प्रचारक, फिर विभाग प्रचारक(3 ज़िलों पर), फिर प्रांत प्रचारक, फिर क्षेत्रीय प्रचारक (3 प्रांतों पर), फिर अखिल भारतीय स्तर के प्रचारक(नेशनल लेवल)।

ये प्रचारक समझिए RSS के एसडीएम, ज़िलाधिकारी, एडीएम, एडीजी, डीजी हैं।ब्लॉक लेवल, डिस्ट्रिक्ट लेवल, स्टेट लेवल , नेशनल लेवल इन सभी जगहों के मुख्य पद प्रचारक सँभालते हैं। इसके अलावा हर स्तर पर दो पद और होते हैं- सर कार्रवाह और संघचालक।

नेशनल लेवल के संघचालक को सर संघचालक कहते हैं- जो वर्तमान में मोहन भागवत हैं। सबसे 1st- हेडगेवार, फिर गोलवलकर बने। 1925 से शुरू हुए RSS में अब तक सिर्फ़ 6 सरसंघचालक बने हैं। जिनमें से 5 ब्राह्मण वो भी मराठी ब्राह्मण, सिर्फ़ 1 राजपूत। बाक़ी किसी अन्य जाति का कोई नहीं बना।

सरसंघचालक सिर्फ़ कोई प्रचारक ही बन सकता है। वर्तमान सरसंघचालक खुद अपने अगले सरसंघचालक का नाम तय करता है। RSS में सरसंघचालक का सम्मान देवतुल्य है। वह उनके लिए भगवान से कम नहीं। सबसे अधिक सम्मान सरसंघचालक का होता है। हालाँकि RSS में उसकी स्थिति राष्ट्रपति जैसी होती है।

सरसंघचालक प्रशासनिक काम नहीं करता। वो RSS को सिर्फ़ दिशा देने का काम करता है। उसके भले के लिए चीजें तय करता है। असली काम करता है “कार्यवाह”। ये RSS में प्रशासनिक स्तर पर सबसे बड़ा पद होता है। राष्ट्रीय स्तर के कार्यवाह को सरकार्यवाह कहते हैं।

वर्तमान में RSS के सरकार्रवाह दत्तात्रेय होसबोले हैं। देशभर में RSS का संगठन इनके ही अंडर आता है। इसी तरह कार्रवाह हर लेवल पर होते हैं। National से लेकर Block तक। राष्ट्रीय को छोड़कर बाक़ी स्तर पर इस पद के लिए प्रचारक की ज़रूरत नहीं होती अन्य कार्यकर्ता को लिया जाता है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरे देश में RSS के बमुश्किल 2.5 से 4 हज़ार प्रचारक हैं। लेकिन ये 4 हज़ार कार्यकर्ता दिन-रात, सर्दी-गर्मी RSS के लिए समर्पित हैं। पूरे जीवन भर के लिए ये घर छोड़ आते हैं और संघ कार्यालयों पर रहते हुए हर दिन क्षेत्र में रहते हैं। मोदी भी प्रचारक थे।

RSS के प्रचारक कार्यालय पर खाना नहीं खाते बल्कि तीनों टाईम अलग-अलग कार्यकर्ताओं के घर-घर जाकर खाना खाते हैं। जिससे इनके सम्बन्ध भी मजबूत होते हैं। कार्यकर्ता स्थायी बनते हैं। और रसोई से सीधा सम्बन्ध हो जाता है। अक्सर नए लोगों के घर जाकर भोजन करते हैं।

कार्यकर्ताओं को हर रोज़ सुबह एकत्रित करने के लिए “शाखा” लगाई जाती है। किसी एक पार्क में वे इकट्ठा होते हैं। खेलकूद करते हैं। RSS की प्रार्थना करते हैं। देश-दुनिया की राजनीति पर चर्चा करते हैं। Block और ज़िला लेवल के प्रचारक आते हैं। इसमें भी पद होते हैं। जैसे शाखा प्रमुख, घटनायक

शाखा हर RSS कार्यकर्ताओं को जोड़कर रखती है। शाखा गाँव, क़स्बे, मोहल्ले और कॉलोनी में अपने हिसाब से लगाई जाती हैं। कई शाखाओं में बीस लोग आ जाते हैं, कई में पाँच ही। शाखाओं में मोहल्लों-कालोनियों के नए लोगों को लाने के प्रयास होते हैं।

इस समय देश में 50 हज़ार से अधिक शाखाएँ हैं। जिनमें पाँच लाख से अधिक सक्रिय कार्यकर्ता हैं। ये वो कार्यकर्ता हैं जो RSS के लिए पूर्णतः समर्पित हैं। RSS के स्कूल हैं- विद्या मंदिर और शिशु मंदिर नाम से। हर ज़िले तहसील में ये स्कूल मिलेंगे।

स्कूल अंग्रेज़ी माध्यम होते हैं। ज़िलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती, इसलिए इन स्कूलों की डिमांड होती है। ये स्कूल ही RSS के लिए खाद हैं। RSS को बिना मेहनत के बड़ी भीड़ मिल जाती है। RSS कार्यकर्ताओं को इन्हीं स्कूलों में पढ़ाने के लिए नौकरी दे दी जाती है।

शिशु मंदिर-विद्या मंदिरों की संख्या जानकर आप दंग रह सकते हैं। पूरे देश में 36 हज़ार से अधिक स्कूल हैं। इनमें पढ़ाने वाले शिक्षक, स्टाफ़ सब RSS कार्यकर्ता बन जाते हैं। तभी उनकी नौकरी रह सकती है। ये संख्या लाखों में पहुँचती है। इससे RSS वित्तीय और सांगठनिक रूप से मजबूत होती है।

RSS को कितना बड़ा बजट इन स्कूलों से आता होगा आप अनुमान नहीं लगा सकते। इस पैसे से RSS के स्कूलों का और अधिक विस्तार किया जाता है। नई जगहों पर स्कूल खोले जाते हैं। RSS के कार्यकर्ताओं को यहाँ नौकरी मिल जाती है तो आर्थिक पक्ष मज़बूत रहता है। फिर वो दम लगाकर RSS का काम करता है।

RSS के कार्यक्रमों का केंद्र, प्रोग्रामों के लिए, आयोजनों के लिए ये स्कूल ही होते हैं। कोई कार्यक्रम करना हो तो स्कूल चले गए। स्कूलों में टेंट, कुर्सी, बिस्तर सब होते हैं। RSS का प्रचारक RSS छोड़कर शादी कर ले तो ऐसे स्कूलों में सेट कर दिया जाता है। जैसे होस्टल या स्टाफ़ में।

RSS के ज़िला, ब्लॉक लेवल के प्रचारक के लिए ये स्कूल एक स्थायी-अस्थायी कार्यालय की तरह काम करते हैं। वे हर हफ़्ते, 15 दिन, महीने पर इन स्कूलों में प्रोग्राम करते हैं। कार्यकर्ताओं का एकत्रीकरण करते हैं। ये देखते हैं कि संगठन का कितना प्रचार-प्रसार हुआ। अगले महीने क्या करना है।

ऐसे ही RSS के बहुत से संगठन हैं। इनकी संख्या 130 से अधिक जाती है। जैसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए भाजपा, पहले जनसंघ नाम से थी। इसके अलावा बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, विवेकानंद केंद्र, हिंदू जागरण मंच, सेवा भारती आदि।

इन सभी संगठनों में अध्यक्ष की बजाय “संगठन मंत्री” नाम का पद मजबूत होता है। ये संगठन मंत्री कोई और नहीं बल्कि RSS के प्रचारक बनाए जाते हैं। इन संगठनों में क्या होना है, क्या करना है ये सब ये प्रचारक ही देखते हैं। इन्हें RSS से ही इन संगठनों में भेजा जाता है।

जैसे भाजपा में जितने भी संगठन मंत्री हैं, जैसे राष्ट्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष, इनसे पहले रामलाल थे। ये सब प्रचारक हैं। इन्हें RSS से भाजपा में भेजा जाता है। राष्ट्रीय लेवल की तरह ही क्षेत्रीय संगठन मंत्री, प्रांत संगठन मंत्री बनाया जाता है।

मोदी को RSS से भाजपा में क्षेत्र संगठन मंत्री के रूप में ही भेजा जाता है। अक्सर RSS से भाजपा में उन्हीं प्रचारकों को भेजा जाता है जो महत्वाकांक्षी हों, राजनीति करना चाहते हों, या जिन्होंने शादी कर ली और सेटल होना चाहते हों। उन्हें भाजपा में भेज दिया जाता है।

बहुत से प्रचारक बीजेपी में जाने के इच्छुक नहीं होते। जब बात अंदर कमरे में संगठन की हो तो RSS के प्रचारक की अधिक चलती है। RSS के प्रचारक का सम्मान भाजपा के अधिकारियों के मुक़ाबले अधिक होता है। RSS और भाजपा में एक ही स्तर के पद होने पर भी RSS के पद को एक स्तर अधिक माना जाता है।

अगर कोई RSS में प्रांत (state) की भूमिका में है, अगर उसे भाजपा में भेजा जाएगा तो एक स्तर अधिक बड़ा पद मिलेगा। यानी अब उसे तीन प्रांतों के ऊपर “क्षेत्रीय” स्तर की भूमिका मिलेगी। इसलिए अंदर कमरे में RSS वालों की चलती है, भाजपा वाले हाथ जोड़ते हैं।

इसी तरह छात्र राजनीति के लिए RSS का संगठन है- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP, इसमें भी ज़िले से लेकर राष्ट्रीय स्तर की Key पोस्ट- संगठन मंत्री पर RSS के भेजे लोग होते हैं। यहाँ जितने भी छात्र नेता होते हैं जो माइक पर दादा होते हैं वे सब प्रचारक के पैरों में होते हैं।

ABVP का संगठन मंत्री यानी RSS का प्रचारक ही तय करता है कि कौन यूनिवर्सिटी में चुनाव लड़ेगा। वर्तमान में ABVP के राष्ट्रीय संगठन मंत्री आशीष चौहान हैं, पहले सुनील आँबेकर थे।

जिस तरह RSS में कैंप होते हैं। वैसे ही प्रत्येक संगठन के अपने अपने प्रशिक्षण शिविर होते हैं। जैसे 3 दिन का परिचयात्मक शिविर, जिसमें स्कूल-कॉलेज के बच्चों को लाया जाता है। इसके बाद 7 दिन का शिविर जिसे ITC कहते हैं। फिर 21 दिन का शिविर, इसे OTC प्रथम वर्ष कहते हैं। प्रथम वर्ष वाले ही द्वितीय वर्ष OTC यानी 21 दिनों का ही अगला कैंप कर सकते हैं। इसके बाद आता है अंतिम शिविर। ये शायद 28 दिन का होता है(संख्या भूल रहा हूँ)। ये हर वर्ष केवल नागपुर में आयोजित होता है। नागपुर में ही RSS का मुख्य कार्यालय है। इस शिविर में बेहद चुनिंदा लोग जाते हैं।

RSS के इस सांगठनिक ढाँचे को अब उद्योगपतियों, सरकारी मशीनरी, विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसरों, मुंबई के फ़िल्म एक्टरों और गोदी मीडिया का समर्थन भी मिल चुका है। हर रोज़ लगने वाली शाखाओं का मुक़ाबला चुनाव के टाईम एक रैली करके नहीं किया जा सकता। सक्रिय कैडर की ज़रूरत है।

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