पुलिस सुधार: कमिश्नरी में बाहरी पर्यवेक्षण का अभाव, ये रहा मेरा सुझाव

Cover Story अन्तर्द्वन्द

“वर्ष 1861 में अंग्रेजी शासन के दौरान बने इंडियन पुलिस एक्ट में लिख दिया गया था कि कोर्ट ऑफ लॉ में पुलिस का बयान स्वीकार्य नहीं होगा। उस वक्त खत्म किया गया पुलिस का भरोसा आज तक वापस नहीं लौट सका। जब अविश्वास आज भी है तो मुंबई पुलिस जैसे काम तो होंगे ही। सरकारें कमिश्नरी तो प्रभावी करना चाहती हैं किंतु उसके पर्यवेक्षण व नियंत्रण के लिए कोई व्यवस्था तय करना नही चाहती हैं। इस कारण यह प्रणाली अपना सकारात्मक असर नही दिखा पा रही है”

-निखिलेश मिश्रा-

आपने देखा होगा कि जब भी कोई दल सत्ता में आता है तब अलग अलग चार्जेज में ओपोजिशन के लोग जेल भेजे जाते हैं। सरकार बदलते ही अफसरों का मनमाफिक ट्रांसफर कर दिया जाता है। ला एन्ड आर्डर पर अपना शिकंजा बिठाने के लिए पोलिस को सबसे पहले शिकंजे में लिया जाता है और उनकी जी हुजूरी करने में माहिर लोगो को महत्वपूर्ण जगहों का चार्ज दिया जाता है।

नेताओ का पोलिस विभाग में हस्तक्षेप नही होना चाहिए इसको लेकर पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल डाली थी और सुप्रीम कोर्ट ने पीआईएल को एक्सेप्ट भी किया। प्रकाश सिंह यह केस जीत गए। 22 सितम्बर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि पोलिटिकल पार्टी का पोलिस विभाग में हस्तक्षेप नही होना चाहिए और सभी राज्यो को निर्देश भी दिए।

ऑन पेपर तो सब कुछ मौजूद है और सबने एक्सेप्ट भी किया क्योंकि मजबूरी थी लेकिन ग्राउंड पर इम्पलीमेंट नही किया। तब सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई और मॉनिटरिंग की। इसे लीड किया था जस्टिस थॉमस ने और उस कमेटी ने रिपोर्ट दी उसमे कहा गया है कि यह निराशा जनक है कि किसी स्टेट ने सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्शन को माना ही नही।

स्पष्ट है कि ना ये तब लागू हुआ था और ना आज लागू हुआ है क्योंकि कोई चाहता ही नही है। पोलिस स्टेट का सब्जेक्ट है। स्टेट चाहे तो वह अपने यहां इसे लागू कर सकती है। इसके लिए उसे सेट्रल पर आश्रित रहने की बाध्यता नही है।

दरअसल जब पहली बार भारतीयों ने 1857 में ब्रिटिशर्स के खिलाफ विद्रोह किया तब अंग्रेजों ने मन बनाया कि ऐसा दुबारा ना हो इसके लिए इंतजाम किया जाय। इसके लिए 1861 में वे पोलिस एक्ट लेकर आये। जिसका काम लोगो की सहायता करना नही बल्कि लोगो को दबाना और नियंत्रित करना था।

अगर यह सिस्टम अच्छा होता तो वे लोग अपने देशों में भी इम्पलीमेंट करते लेकिन 1861 वाला एक्ट केवल यहीं चल रहा है। तबसे यूपी पुलिस रिफॉर्म जीरो है। इस एक्ट को आज के अनुरूप पुनर्गठित करने का साहस ही नही उतपन्न किया गया या यूं कह लें कि नेताओ ने होने ही नही दिया क्योंकि ये सिस्टम हमारे नेताओं के मनमुताबिक है। जो आशा ब्रिटिशर्स की थी वो ही हमारे नेताओं की भी है। ला एन्ड आर्डर सम्हालना। हमारे यहां पोलिस को बहुत शक्ति प्राप्त है.

जब भी कोई भ्रस्ट सरकार सत्ता में आती है तो उसके केवल दो उद्देश्य होते हैं। पहला मौजूदा स्थितियों पर नियंत्रण रखना और अगले चुनाव को आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाये रखना। दूसरे उद्देश्य के लिए तो कई विभाग है लेकिन मौजूदा स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए पोलिस की पावर्स अपने कंट्रोल में ले लेते हैं।

सत्ता में बैठे लोग वर्ष 1978 में सबमिट की गई धर्मवीर आयोग की रिपोर्ट लागू करने से भी डरते हैं। उन्हें मालूम है कि इसके बाद उनका पुलिस व्यवस्था में हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा। इस आयोग की सिफारिशों में साफतौर पर लिखा है कि टॉप पुलिस लीडरशिप का चयन राजनेताओं के द्वारा न हो। उनकी नियुक्ति निष्पक्ष एवं गैर राजनीतिक तरीके से की जाए.

संविधान के अंतर्गत, पुलिस राज्य सूची का विषय है, इसलिये भारत के प्रत्येक राज्य के पास अपना एक पुलिस बल है। राज्यों की सहायता के लिये केंद्र को भी पुलिस बलों के रखरखाव की अनुमति दी गई है ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति सुनिश्चित की जा सके।

दरअसल, पुलिस बल राज्य द्वारा अधिकार प्रदत्त व्यक्तियों का एक निकाय है, जो राज्य द्वारा निर्मित कानूनों को लागू करने, संपत्ति की रक्षा और नागरिक अव्यवस्था को सीमित रखने का कार्य करता है। पुलिस को प्रदान की गई शक्तियों में बल का वैध उपयोग करना भी शामिल है।

देश में अधिकांशतः राज्यों में पुलिस की छवि तानाशाहीपूर्ण, जनता के साथ मित्रवत न होना और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने की रही है।

रोज़ ऐसे अनेक किस्से सुनने-पढ़ने और देखने को मिलते हैं, जिनमें पुलिस द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया जाता है। पुलिस का नाम लेते ही प्रताड़ना, क्रूरता, अमानवीय व्यवहार, रौब, उगाही, रिश्वत आदि जैसे शब्द दिमाग में कौंध जाते हैं।

भारत के अधिकांश राज्यों ने अपने पुलिस संबंधी कानून ब्रिटिश काल के पुलिस अधिनियम, 1861 के आधार पर बनाए हैं, जिसके कारण ये सभी कानून भारत की मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

मौजूदा दौर में गुणवत्तापूर्ण जाँच के लिये नवीन तकनीकी क्षमताओं की आवश्यकता होती है, किंतु भारतीय पुलिस व्यवस्था में आवश्यक तकनीक के अभाव में सही ढंग से जाँच संभव नहीं हो पाती है और कभी-कभी इसका असर उचित न्याय मिलने की प्रक्रिया पर भी पड़ता है।

भारत में पुलिस-जनसंख्या अनुपात काफी कम है, जिसके कारण लोग असुरक्षित महसूस करते हैं और पुलिस को मानव संसाधन की कमी से जूझना पड़ता है।

वर्ष 1977 में पुलिस सुधारों को केंद्र में रखकर जनता पार्टी की सरकार द्वारा श्री धर्मवीर की अध्यक्षता में गठित इस आयोग को राष्ट्रीय पुलिस आयोग (National Police Commission) कहा जाता है। चार वर्षों में इस आयोग ने केंद्र सरकार को आठ रिपोर्टें सौंपी थीं, लेकिन इसकी सिफारिशों पर अमल नहीं किया गया।

धर्मवीर आयोग की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं-

-प्रत्येक राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए।
-जाँच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग किया जाए।
-पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिये एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाए।
-पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय किया जाए।
-एक नया पुलिस अधिनियम बनाया जाए।

वर्ष 2000 में पुलिस सुधारों पर पद्मनाभैया समिति का गठन किया गया था। इस समिति का मुख्य कार्य पुलिस बल की भर्ती प्रक्रियाओं, प्रशिक्षण, कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों, पुलिस अधिकारियों के व्यवहार और पुलिस जाँच आदि विषयों का अध्ययन करना था।

वर्ष 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने देश के सभी राज्यों के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को एक पत्र लिखकर पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिये कुछ सिफारिशें भेजी थीं।

देश में आपातकाल के दौरान हुई ज़्यादतियों की जाँच के लिये गठित शाह आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिये पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही थी। इसके अलावा राज्य स्तर पर गठित कई पुलिस आयोगों ने भी पुलिस को बाहरी दबावों से बचाने की सिफारिशें की थीं।

इन समितियों ने राज्यों में पुलिस बल की संख्या बढ़ाने और महिला कांस्टेबलों की भर्ती करने की भी सिफारिश की थी।

वर्ष 2006 में सोली सोराबजी समिति ने मॉडल पुलिस अधिनियम का प्रारूप तैयार किया था, लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

गृह मंत्रालय ने 20 सितंबर, 2005 को विधि विशेषज्ञ सोली सोराबजी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने 30 अक्तूबर 2006 को मॉडल पुलिस एक्ट, 2006 का प्रारूप केंद्र सरकार को सौंपा

जब किसी भी आयोग और समिति की रिपोर्ट पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो उत्तर प्रदेश व असम में पुलिस प्रमुख और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह ने वर्ष 1996 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर अपील की जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया है कि सभी राज्यों को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने के निर्देश दिये जाए।

इस याचिका पर एक दशक तक चली सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कई आयोगों की सिफारिशों का अध्ययन कर आखिर में 22 सितंबर, 2006 को पुलिस सुधारों पर निर्णय देते हुए राज्यों और केंद्र के लिये कुछ दिशा-निर्देश जारी किये।

राज्यों को निर्देश दिए गए कि इनमें पुलिस पर राज्य सरकार का प्रभाव कम करने के लिये राज्य सुरक्षा आयोग का गठन करने, पुलिस महानिदेशक, पुलिस महानिरीक्षक और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल दो साल तय करने, जाँच और कानून व्यवस्था की बहाली का ज़िम्मा अलग-अलग पुलिस इकाइयों को सौंपने, सेवा संबंधी तमाम मामलों पर फैसले के लिये एक पुलिस इस्टैब्लिशमेंट बोर्ड (Police Establishment Board) का गठन करने और पुलिस अफसरों के खिलाफ शिकायतों की जाँच के लिये पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन करने जैसे दिशा-निर्देश शामिल थे। ₹

केंद्र को निर्देश दिए गए कि सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को केंद्रीय पुलिस बलों में नियुक्तियों और कर्मचारियों के लिये बनने वाली कल्याण योजनाओं की निगरानी के लिये एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के गठन का भी निर्देश दिया था, लेकिन अब तक इसका गठन नहीं हो सका है।

पुलिस व्यवस्था को आज नई दिशा, नई सोच और नए आयाम की आवश्यकता है। समय की मांग है कि पुलिस नागरिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों के प्रति जागरूक हो और समाज के सताए हुए तथा वंचित वर्ग के लोगों के प्रति संवेदनशील बने। देखने में यह आता है कि पुलिस प्रभावशाली व पैसे वाले लोगों के प्रति नरम तथा आम जनता के प्रति सख्त रवैया अपनाती है, जिससे जनता का सहयोग प्राप्त करना उसके लिये मुश्किल हो जाता है।

हमारे सामने प्रायः पुलिस की नकारात्मक छवि ही आती है, जिससे उसके प्रति आमजन का अविश्वास और बढ़ जाता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में पुलिस बल की शक्ति का आधार जनता का उसमें विश्वास है और यदि यह नहीं है तो समाज के लिये घातक है। पुलिस में संस्थागत सुधार ही वह कुंजी है, जिससे कानून व्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। सभी तरह के गैर-कानूनी कार्यों पर नकेल कसी जा सकती है।

यदि किसी भी व्यवस्था को प्रभावी करने के लिए उसके नियंत्रण और पर्यवेक्षण की व्यवस्था ना की जाए तो वह व्यवस्था अपेक्षित परिणाम नही दे पाती है अपितु उल्टी दिशा में कार्य करने लगती है।

एक उदाहरण के तौर पर यूपी के कुछ जिलों में कमिश्नरी प्रणाली लागू की गई है। उदाहरण देखने को मिले कि सड़क पर अपराधियो को ले जा रही गाड़ियां पलटने, पुलिसिया वाहन पंचर होने और इससे उतपन्न परिस्थितियों से अंतिम सूचना के रूप में अपराधियो के एनकाउंटर होने की खबरे प्रकाश में आने लगीं।

एक अन्य रूप में लॉकअप में पोलिस की पिटाई से आरोपी की मौत होने, होटल में मनमर्जी छापे डालकर गेस्ट को पीटते पीटते मौत तक पंहुचाने, मनमाने तरीके से एनकाउंटर होने के उदाहरण प्रकाश में आए। सरकार ने पीड़ित परिवारों को मुआवजा भले ही दिया हो किन्तु एक दो नही बल्कि एक के बाद शक्तियों के दुरुपयोग के अनेको घटनाओ की बाढ़ सी आ गयी है।

महत्वपूर्ण बात ये भी है कि तब गठित कमेटी या एसआईटी की रिपोर्ट हो या मृतक की पीएम रिपोर्ट, दबाव के अधीन होकर विभाग को पाक दामन सिद्ध करने वाली सामने आई है, दोषी पुलिस कर्मी बच निकले हैं। ऐसे मामलो में जो कार्यवाहियां हुई है, वह शोसल मीडिया मुहिम और वायरल वीडियो से उपजी मांगो के दबाव के चलते हुई हैं। पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव होते हुए भी जनदबाब में की गई उन कार्यवाहियों के भविष्य का पूर्वानुमान लगाना कठिन नही है.

इसी तर्ज पर हाल ही में महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख और पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के बीच चल रहे झगड़े ने पुलिस व्यवस्था को हिलाकर कर रख दिया था जबकि महाराष्ट्र में पोलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू है। इसके बावजूद वहां सियासतदानों के बीच पुलिस प्रायः सवालों के घेरे में खड़ी रहती है।

वर्ष 1861 में अंग्रेजी शासन के दौरान बने इंडियन पुलिस एक्ट में लिख दिया गया था कि कोर्ट ऑफ लॉ में पुलिस का बयान स्वीकार्य नहीं होगा। उस वक्त खत्म किया गया पुलिस का भरोसा आज तक वापस नहीं लौट सका। जब अविश्वास आज भी है तो मुंबई पुलिस जैसे काम तो होंगे ही। सरकारें कमिश्नरी तो प्रभावी करना चाहती हैं किंतु उसके पर्यवेक्षण व नियंत्रण के लिए कोई व्यवस्था तय करना नही चाहती हैं। इस कारण यह प्रणाली अपना सकारात्मक असर नही दिखा पा रही है।

आज इनकी नियुक्ति से राजनैतिक हस्तक्षेप समाप्त नही किया गया है तथा आईएएस लॉबी का इन पर पर्यवेक्षण चला आ रहा था वह भी समाप्त कर इन्हें इनके हाल पर शक्तिसम्पन्न कर दिया गया है परिणामतः सकारात्मक परिणाम मिलने के बजाय शक्तियों के दुरुपयोग और निरंकुशता के उदाहरण सामने आ रहे हैं।

अतैव मेरे विचार से उचित होगा कि पोलिस कमिश्नरी प्रणाली प्रभावी करने के लिए इन पर आवश्यक नियंत्रण और पर्यवेक्षण की व्यवस्था भी अस्तित्व में लाई जाए अन्यथा इन्हें प्राप्त कराई गई शक्तियों के दुरुपयोग से अंतिम नुकसान आम नागरिकों का ही हो सकता है जिसके यदा कदा सामने आते उदाहरण आज स्पष्ट हैं।

-अचूक संघर्ष-

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