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अमेरिका के लाख चाहने के बाद ईरान झुकने को नही तैयार,ट्रम्प की तानाशाही से तीसरे विश्व युद्ध के आसार

चीन को पता था कि पश्चिम वही गलती दोहराएगा; यह युद्ध डॉलर के वर्चस्व को पूरा तबाह कर देगा

– ईरान ने 40 साल तक पाबंदियां झेलीं, फिर बार-बार उठ खड़ा हुआ
– वहां की जनता पर्याप्त विकास न कर पाने के लिए सरकार को दोषी नहीं मानती
– ईरान में है तेल और आईआरजीसी का समानांतर आर्थिक ढांचा, जो बन गया है ढाल
– ईरान पर गिरा हर बम अरब मुल्कों को चीन के नजदीक लेकर आएगा

नई दिल्ली। बीते 40 साल से अमेरिकी पाबंदियों झेल रहा ईरान अब अपनी निर्णायक जंग लड़ रहा है। अमेरिका ने एक और विमानवाहक जहाज मध्य पूर्व में बुलाया है। नाम है जॉर्ज वॉशिंगटन। इसे मिलाकर ईरान को घेरने वाले विमान वाहकों की संख्या 3 हो जाएगी और इस तरह ईरान पर तीन तरफ से हमले की तैयारी हो गई है।

लेकिन शायद बात तब भी बन नहीं पाएगी, क्योंकि 1996, 2006, 2012 और 2018 के दौर में जब भी ईरान के खिलाफ कार्रवाई हुई, यह देश सब-कुछ झेलकर भी उठ खड़ा हुआ और विकास विरोधी पश्चिमी देशों के हमलों को इसने नाकाम कर दिया। अब तो अमेरिका के सैन्य विशेषज्ञ भी यह मानने लगे हैं कि ईरान पर हमलों के बाद भी वह झुकेगा नहीं। फिर खड़ा होगा और दुनिया में एक बार फिर सिर उठाएगा।

ईरान की असली ताकत है उसका तेल

ईरान की असल ताकत है, उसका तेल भंडार, जिसकी उत्पादन क्षमता प्रतिदिन 15 लाख बैरल तेल उत्पादन करने की है। अमेरिका और इजरायल ने इसीलिए ईरान के तेल ढांचे पर हमला किया और अधिकांश तेल कुओं को तबाह कर दिया। ईरान पर अगर हमला रुक जाए और उस पर पाबंदियां हट जाएं तो 70 डॉलर प्रति बैरल की लागत से वह सालभर में 38 बिलियन डॉलर कमा सकता है। इतना पैसा वहां की 9 करोड़ आबादी के विकास पर लगाने का मतलब है कि ईरान पांच साल में फिर विकास की राह पर चल निकलेगा। लेकिन, यह विश्व मुद्रा कोष का सरकारी आंकड़ा है। अघोषित आंकड़ा इससे भी अधिक है। पाबंदियों के बावजूद ईरान ब्रेंट क्रूड ऑयल के भाव से 10 डॉलर कम कीमत में चीन को खासतौर पर तेल बेचता आया है। 2024 की कीमत पर आंकें तो उसने 20 लाख बैरल प्रतिदिन का उत्पादन चीन को बेचा है, जिसका 50 फीसदी तेल आयात ईरान से होता रहा है और इसीलिए चीन अब ईरान का सबसे करीबी मित्र देश है। उसने जंग के बीच भी चीनी तेल टैंकरों को हॉर्मूज से निकलने की अनुमति दे रखी है और चीनी युद्धपोत अपने टैंकरों को सुरक्षा देते हुए तेल लाने का प्रबंध कर रहे हैं। माना जा रहा है कि ईरान इसी पैसे के दम पर फिलहाल जंग लड़ रहा है।

जितना बाहर से दिखता है, अंदर से अलग है

ईरान की इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड (आईआरजीसी) का कारोबार कुछ ऐसा है कि यह ऊपर से जो दिखता है, भीतर से उतना ही अलग है। आईआरजीसी का आर्थिक ढांचा ईरान की जीडीपी का करीब 30 फीसदी है, जो कि खाड़ी के बीकी देशों से समानांतर व्यापार, आयात में मोनोपोली और बाहर के देशों में स्थापित वित्तीय संस्थानों से संचालित होता है। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंध भी इस काले कारोबार पर पाबंदी नहीं लगा सके। इस पर ईरान की संसद का कोई अधिकार नहीं है और यह एक प्रकार से पूरे वित्तीय स्वायत्तता के साथ ईरान पर इस समय हो रहे अमेरिका और इजरायल के हमलों में ढाल की तरह से काम कर रहा है। इसके अलावा चीन ने 2021 को हुए समझौते के तहत ईरान के ऊर्जा, ढांचागत और विनिर्माण क्षेत्र में 400 बिलियन डॉलर का निवेश कर रखा है। इसके बदले चीन ईरान से तेल खरीदता है। ईरान का 90 प्रतिशत तेल चीन की खरीदता है। एक तरह से ईरान के लिए चीन एक लाइफलाइन की तरह है, जिसे पश्चिमी ताकतें चाहकर भी अलग नहीं कर सकतीं।

बलिदान पर खड़ी ईरान की घरेलू आर्थिक राजनीति

बीते 40 साल के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरान की घरेलू आर्थिक राजनीति लोगों के बलिदान पर खड़ी है। लोग अपने इलाके का पर्याप्त विकास नहीं हो पाने के पीछे सरकार की नाकामी नहीं, आर्थिक पाबंदियों को दोष देते हैं। इससे वहां की सरकार मजबूत रही है। अब अमेरिकी हमलों ने सरकार की ताकत को और बढ़ा दिया है। इसके बावजूद 2019 में ईंधन के दाम में इजाफे और 2022 में माहसा अमीनी आंदोलन ने दिखाया कि लोग सरकार से नाराज हैं। लेकिन दोनों आंदोलनों को इस कदम सख्ती से कुचला गया कि वे व्यापक विद्रोह का रूप नहीं ले पाए। इरान ने कभी भी लोगों की नाराजगी को अपनी विदेश नीति पर हावी नहीं होने दिया। अपने भीतर के झगड़े को उन्होंने घर में ही निपटा दिया। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में प्रतिबंधों का असर न के बराबर दिखा है। पश्चिमी विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी बाहरी हमला ईरान की व्यवस्था में इन चारों कारकों को प्रभावित नहीं कर सकती। यही बात अमेरिका और इजरायल के खिलाफ चली गई जो यह मान रहे हैं कि ईरान पर व्यापक हवाई हमले से लोग बगावत पर उतारू हो जाएंगे।

चीन इसलिए खामोश है

चीन ने ईरान समेत दुनिया के 150 देशों में बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम के जरिए ढांचागत निवेश कर रखा है। इसमें बंदरगाह, रेल्वे, सड़कें, फाइबर ऑप्टिक केबल और बिजली के ग्रिड शामिल हैं। जैसे ईरान चीन को तेल बेचता है, वैसे ही सऊदी अरब भी 2023 से युआन में चीन को तेल बेचता है। ब्रिक्स ने सऊदी अरब और चीन दोनों को शामिल किया है। चीन ने डॉलर की जगह युआन में भुगतान करने के लिए अरब मुल्कों को स्विफ्ट की सुविधा दी है। ऐसे में ईरान पर गिरने वाला हर बम अरब देशों में मिसाइल हमलों को तेज करेगा और वे चीन के पाले में मजबूती से आते जाएंगे और इससे डॉलर के व्यापार को नुकसान होगा। चीन यह होते देख रहा है और इसीलिए चुप है, क्योंकि यह उसे फायदा पहुंचा रहा है। चीन का मकसद डॉलर के व्यापार को खत्म करना है।

अफ्रीका दुनिया का भविष्य है

चीन ने 20 साल पहले ही जान लिया था कि अफ्रीका आने वाली दुनिया का भविष्य है। वहां की आबादी की औसत आयु 19 साल है। साल 2050 तक अफ्रीका की आबादी ढाई अरब हो जाएगी और फिर वहां के युवा कामगार उसके लिए काम करेंगे। इसी को देखते हुए चीन ने केन्या में रेल्वे, जिबूती में बांध, नाइजीरिया में हाईवे और रवांडा में टेक्नोलॉजी हब, अस्पताल, स्टेडियम, हाईवे और टेलीकॉम नेटवर्क बनाए हैं, जहां चीनी कंपनी हुआवे अपना काम कर रही है। इसके लिए चीन ने एक गोली नहीं चलाई। कोई सत्ता परिवर्तन नहीं किया, कोई पाबंदी नहीं लगाई और न ही लोकतंत्र को लेकर कोई हस्तक्षेप किया। ऐसे में ईरान पर हमले में खरबों डॉलर फूंककर अमेरिका और इजरायल वही गलती कर रहे हैं, जो चीन ने नहीं किया। वे मध्यपूर्व को डॉलर के कारोबार से अलग कर रहे हैं। इस तरह वे वैश्विक दक्षिण को चीन से और भी नजदीक ला रहे हैं, जिसका सपना चीन ने 20 साल पहले देखा था। असल में अमेरिका अब चीन के उसी सपने का साकार करने में जुटा है और इसे देखकर ही चीन चुप है।

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