ईरान संकट की आहट से कांपती भारत की अर्थव्यवस्था, देश मे ईंधन के प्रति भारी दुर्व्यवस्था
क्या ‘कोविड पार्ट-2’ की ओर बढ़ रहा है भारत?

- प्रधानमंत्री का बयान या छुपी चेतावनी ईरान संकट को कोविड से जोड़ने का मतलब क्या है!
- डगमगाती जीडीपी 7 फीसदी का दावा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और!
- मूडीज की डरावनी भविष्यवाणी ग्रोथ में 4 फीसदी तक की गिरावट का खतरा
- कॉरपोरेट सेक्टर का सवाल विकास हो रहा है तो मुनाफा क्यों नहीं?
- टैक्स कटौती से लेकर ब्याज दर में ढील तक फिर भी बाजार में सन्नाटा
- रुपया कमजोर, तेल महंगा सरकारी खजाने पर डबल अटैक
- चुनावी साल में ‘रेवड़ी मॉडल’ क्या अर्थव्यवस्था को और डुबो देगा
- छोटे रोजगारों पर सबसे बड़ा संकट क्या फिर लौटेगा कोविड जैसा दौर
प्रधानमंत्री द्वारा ईरान संकट की तुलना कोविड-19 महामारी से करना महज एक सामान्य बयान नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के भीतर चल रही गहरी बेचैनी का संकेत भी हो सकता है। जिस कोविड संकट ने भारत समेत पूरी दुनिया की आर्थिक रीढ़ को झकझोर कर रख दिया था, उसी से मौजूदा भू-राजनीतिक संकट की तुलना करना बताता है कि हालात सामान्य नहीं हैं।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। सरकार लगातार 7 प्रतिशत के आसपास की जीडीपी वृद्धि दर का दावा करती रही है, लेकिन इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर देश और विदेश दोनों जगह सवाल उठते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां जैसे गोल्डमैन सैक्स और मूडीज अब खुलकर आशंका जता रही हैं कि भारत की आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ सकती है। सबसे गंभीर बात यह है कि मूडीज ने यह संकेत दिया है कि यदि ईरान संकट लंबा खिंचता है, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ में सीधे-सीधे 4 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि विकास दर 4 प्रतिशत रह जाएगी, बल्कि जितनी भी वास्तविक दर है, उसमें 4 प्रतिशत अंक की सीधी कटौती हो सकती है जो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए झटका नहीं बल्कि आर्थिक भूकंप के समान है। यह संकट केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। कॉरपोरेट सेक्टर, जो किसी भी अर्थव्यवस्था की नब्ज होता है, वह भी अब सरकारी दावों पर सवाल उठाने लगा है। बड़ी उपभोक्ता कंपनियों के नतीजे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि बाजार में मांग कमजोर है। अगर वास्तव में 7 प्रतिशत की दर से विकास हो रहा होता, तो कंपनियों की बिक्री और मुनाफे में उसका स्पष्ट असर दिखाई देता। लेकिन हकीकत इसके उलट है। सरकार ने मांग को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए इनकम टैक्स में कटौती, ब्याज दरों में कमी, जीएसटी में राहत लेकिन इनका अपेक्षित असर नहीं दिखा। इसका सीधा मतलब है कि समस्या कहीं गहरी है, और केवल नीतिगत घोषणाओं से उसका समाधान संभव नहीं। इसी बीच ईरान संकट ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित तेल पर निर्भर है। यदि यह संकट बढ़ता है और तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इसका सीधा असर सरकारी खजाने, महंगाई और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। रुपया पहले ही दबाव में है, और महंगा तेल इस दबाव को और बढ़ा सकता है। चुनावी साल में सरकार पर जनकल्याणकारी योजनाओं और सब्सिडी का दबाव भी बढ़ेगा, जिससे वित्तीय अनुशासन कमजोर पड़ सकता है। ऐसे में अर्थव्यवस्था एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां एक तरफ वैश्विक संकट है और दूसरी तरफ घरेलू कमजोरी। प्रधानमंत्री का कोविड जैसा संकट आने का संकेत देना शायद इसी दोहरी मार की ओर इशारा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकार को खतरे का अंदेशा है, तो उसके पास इससे निपटने की क्या रणनीति है। क्या देश एक और आर्थिक झटके के लिए तैयार है, या फिर हम एक बार फिर उसी अंधेरे दौर की ओर बढ़ रहे हैं, जहां रोजगार, आय और विकास तीनों पर संकट मंडराने लगता है।

ईरान संकट या आर्थिक विस्फोट ‘कोविड जैसा खतरा’ पीएम मोदी की चेतावनी या असफल नीतियों की स्वीकारोक्ति!
जब देश का प्रधानमंत्री किसी अंतरराष्ट्रीय तनाव को कोविड जैसी आपदा से जोड़ता है, तो इसे हल्के में लेना भूल होगी। यह बयान महज कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस गहरे भय की झलक है जो सत्ता के शीर्ष पर बैठा तंत्र महसूस कर रहा है। कोविड का दौर भारत के लिए सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं था, यह आर्थिक तबाही का प्रतीक बन गया था। करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गईं, छोटे उद्योग बंद हो गए, और मध्यम वर्ग कर्ज में डूब गया। अब वही तुलना दोहराई जा रही है तो सवाल उठता है कि क्या सरकार को आने वाले संकट का वास्तविक अंदाजा है। यह बयान जनता को मानसिक रूप से तैयार करने की रणनीति है या फिर यह उस असहज सच्चाई का संकेत है कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले से ही इतनी कमजोर हो चुकी है कि एक और झटका उसे हिला सकता है।
7 फीसदी विकास दर वास्तविकता या राजनीतिक कथा
सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास हर वर्ग तक पहुंच रहा है या यह आंकड़ा जमीनी सच्चाई को दर्शाता है। जीडीपी अब एक राजनीतिक टूल बन चुका है। आंकड़ों की प्रस्तुति इस तरह की जाती है कि तस्वीर चमकदार दिखे, जबकि जमीनी हकीकत धुंधली कर दी जाती है। बेरोजगारी दर पर स्पष्ट डेटा नहीं उपभोक्ता मांग में गिरावट, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती, अगर विकास वास्तविक होता, तो इसका असर इन सभी संकेतकों पर दिखता। लेकिन यहां स्थिति उलटी है विकास का दावा मजबूत है, लेकिन अर्थव्यवस्था के संकेत कमजोर हैं।
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की ‘रेड अलर्ट’ रिपोर्ट
वैश्विक एजेंसियां भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अब सतर्क हो चुकी हैं। गोल्डमैन सैक्स ने स्पष्ट कहा कि ग्रोथ 6 फीसदी से नीचे जा सकती है। मूडीज ने चेतावनी दी है कि ईरान संकट लंबा चला तो 4 फीसदी तक गिरावट संभव है, यह कोई सामान्य टिप्पणी नहीं है। यह उस जोखिम का संकेत है जिसे भारत की अर्थव्यवस्था झेलने की स्थिति में नहीं है। मूडीज की बात का असली मतलब समझना जरूरी है। यह 4 फीसदी तक गिरावट कह रहा है, यानी जो भी वास्तविक विकास दर है, उसमें सीधी कटौती होगी। यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए शॉक थेरेपी नहीं, बल्कि शॉक डिजास्टर हो सकता है।
कॉरपोरेट सेक्टर का विद्रोह ‘सच’ अब छुप नहीं रहा
अब तक सरकार के आर्थिक दावों पर सबसे ज्यादा भरोसा कॉरपोरेट सेक्टर दिखाता था या कम से कम सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं करता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। बड़ी कंपनियों के परिणाम खुद कहानी बयां कर रहे हैं कि एफएमसीजी कंपनियां ग्रामीण मांग कमजोर, ऑटोमोबाइल में लगातार गिरावट
रियल एस्टेट में खरीदार गायब हैं। अगर अर्थव्यवस्था 7 फीसदी से बढ़ रही है, तो उपभोग क्यों नहीं बढ़ रहा।
यह सवाल सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। क्योंकि यह सरकार के दावों की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
नीतिगत फैसले संकेत या स्वीकारोक्ति
पिछले एक साल में सरकार ने कई कदम उठाए जिसमें इनकम टैक्स में कटौती, ब्याज दरों में कमी, जीएसटी में राहत इन कदमों को रिफॉर्म कहा गया, लेकिन असल में ये रिस्पॉन्स थे, यानी समस्या पहले से मौजूद थी। अगर अर्थव्यवस्था मजबूत होती, तो इतनी जल्दी-जल्दी राहत पैकेज की जरूरत नहीं पड़ती। सबसे बड़ा सवाल इन कदमों का असर क्यों नहीं दिखा, क्योंकि समस्या सतही नहीं, बल्कि संरचनात्मक है।
ईरान संकट तेल के बहाने अर्थव्यवस्था पर हमला
भारत की ऊर्जा निर्भरता उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।
ईरान संकट अगर बढ़ता है, तो तेल महंगा होगा, आयात बिल बढ़ेगा, रुपया गिरेगा और इसका असर सीधे आम आदमी तक पहुंचेगा। जिससे महंगाई बढ़ेगी, जीवन यापन महंगा होगा, बचत घटेगी यह एक ऐसा चक्र है, जो अर्थव्यवस्था को धीमा ही नहीं, बल्कि अस्थिर कर सकता है।
रुपया और निवेश खतरे की घंटी
रुपया सिर्फ मुद्रा नहीं, बल्कि भरोसे का संकेतक है।
जब रुपया गिरता है, तो यह संकेत देता है कि विदेशी निवेशक भरोसा खो रहे हैं, बाजार में अनिश्चितता बढ़ रही है। अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो पूंजी का पलायन शुरू हो सकता है। जो किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है। चुनावी साल में सरकारें अक्सर कठिन फैसलों से बचती हैं। सब्सिडी बढ़ती है, मुफ्त योजनाएं आती हैं, खर्च बढ़ता है। यह सब अल्पकालिक राहत देता है, लेकिन दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था पर बोझ डालता है। भारत इस समय उसी मोड़ पर खड़ा है जहां अर्थशास्त्र और राजनीति आमने-सामने है।
रोजगार सबसे बड़ा संकट, सबसे कम चर्चा
कोविड के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान रोजगार को हुआ था। आज भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। बेरोजगारी ऊंची है, स्वरोजगार अस्थिर है, छोटे व्यवसाय संघर्ष कर रहे हैं, अगर नया संकट आता है, तो सबसे पहले और सबसे ज्यादा असर इसी वर्ग पर पड़ेगा। अब सवाल यह है कि क्या सरकार तैयार है। क्या कोई स्पष्ट आर्थिक रणनीति है, रोजगार बचाने की क्या योजना है, क्या महंगाई नियंत्रित करने का रोडमैप है।
अगर इन सवालों का जवाब नहीं है, तो खतरा सिर्फ ईरान संकट नहीं, बल्कि उस तैयारी की कमी है जो किसी भी संकट को आपदा बना देती है।
कोविड पार्ट-2 नहीं, बल्कि ‘नीतिगत विफलता पार्ट-2
आज भारत जिस स्थिति में है, वहां संकट केवल बाहरी नहीं है। अंदर से कमजोर अर्थव्यवस्था, बाहर से बढ़ता वैश्विक दबाव, ऊपर से चुनावी राजनीति ये तीनों मिलकर एक विस्फोटक स्थिति बना रहे हैं। प्रधानमंत्री का बयान एक चेतावनी है। लेकिन यह चेतावनी केवल जनता के लिए नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी है।
क्योंकि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि संकट कहां से आया। इतिहास यह पूछेगा कि जब संकेत मिल रहे थे, तब तैयारी क्यों नहीं की गई।
* ईरान संकट को कोविड से जोड़ना बड़ी चेतावनी
* जीडीपी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल
* मूडीज की 4 फीसदी गिरावट की आशंका गंभीर खतरा
* कॉरपोरेट सेक्टर सरकार के दावों से असहमत
* नीतिगत कदम बेअसर संरचनात्मक समस्या बरकरार
* तेल संकट से महंगाई और रुपया दोनों पर दबाव
* चुनावी साल में आर्थिक अनुशासन खतरे में
* रोजगार पर सबसे बड़ा संकट
* प्रधानमंत्री ने ईरान संकट को कोविड जैसा बताया
* जीडीपी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल
* टैक्स कटौती और नीतिगत राहत बेअसर



