“ज़हर, साज़िश और सन्नाटा: जब संदीप सिंह ने अपनी ज़िंदगी की सबसे ख़ौफ़नाक कहानी ख़ुद सुनाई

1. मेदांता हॉस्पिटल से मुंबई तक: थैलियम ने कैसे तोड़ी एक लड़ाकू समाजवादी सिपाही की देह
2. ‘जिन हाथों से खाना मिला, उन्हीं से ज़हर भी’: संदीप की जुबानी पांच संदिग्ध नाम
3. 3.50 करोड़ के आरोप पर करारा जवाब: “एक-एक पैसा लौटाया है”
4. पार्टी, पत्रकार और पीड़ा: जब अपनों ने भी नहीं उठाई आवाज़
5. योगी आदित्यनाथ से गुहार: “न्याय दीजिए, वरना अगला नंबर मेरे परिवार का होगा”

संदीप सिंह से एक विशेष मुलाक़ात में हमने खास बातचीत की है। संदीप आज अपने दोनों पैरों पर चलने के काबिल नहीं हैं। समाजवादी पार्टी के नेता होने के साथ-साथ संदीप की लोकप्रियता समाज में भी है। संदीप ने अपनी लगन और मेहनत के बूते अपना एक अलग मुकाम खड़ा किया।
हाल ही में एक डिजिटल मीडिया के हवाले से यह बताया गया कि संदीप के पिता तुल्य अभिभावक, जिनका नाम शिव प्रसाद यादव उर्फ शिव सरदार है, उन्होंने संदीप के अस्पताल में भर्ती होने से पूर्व संदीप को लगभग 3:30 करोड़ रुपये दिए थे। डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म की खबर के अनुसार शिव सरदार ने संदीप को यह पैसा इलाज से पूर्व दिया था। इस चैनल ने इस बात का कोई एविडेंस प्रस्तुत नहीं किया और बिना किसी प्रमाण के संदीप पर सीधे तौर पर आरोप लगा दिया।
एक डिजिटल मीडिया के पत्रकार ने संदीप की विपरीत और अति संवेदनशील परिस्थितियों में न केवल संदीप से फोन करके जबरदस्ती बात की, बल्कि मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का दुस्साहस भरा अपराध भी किया। उन्हें एक बार यह सोचना चाहिए था कि जो व्यक्ति बीमारी से जूझ रहा है, उसे इस तरह की मानसिक प्रताड़ना नहीं दी जानी चाहिए। हो सकता है कि इस तनाव में आकर संदीप की हालत और बिगड़ जाती। यदि उस एक फोन कॉल के बाद संदीप की हालत फिर से बिगड़ जाती तो इसका जिम्मेदार कौन होता? मीडिया समाज का चौथा स्तंभ है और उसकी भी अपनी गरिमा और एक दायरा होता है। ऐसे में उस डिजिटल मीडिया पत्रकार को इतना बड़ा आरोप लगाने से पहले कम से कम संदीप के ठीक होने का इंतजार करना चाहिए था।
जब संदीप पर गबन का आरोप लगाकर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिश की गई, तो आज अनचाहे ही मैं संदीप से मिला। संदीप के साथ घटित इस अप्रत्याशित घटना और उनके विरुद्ध लगाए जा रहे तमाम आरोपों के बीच आज हम संदीप की कहानी उन्हीं की जुबानी जानेंगे और आपको हकीकत से रूबरू कराने की कोशिश करेंगे।
हम संदीप से जानने की कोशिश करेंगे कि वे वाराणसी से गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल कैसे पहुंचे, शिव सरदार के साथ वहां क्यों थे, यह घटना कब और कैसे हुई, किन लोगों ने जहर देकर उन्हें मारने की कोशिश की, क्या शिव सरदार ने उन्हें 3:30 करोड़ रुपये दिए थे और क्या वह रकम वापस की गई। इन तमाम सवालों के जवाब के लिए संदीप से हुई बातचीत के खास अंश प्रस्तुत हैं।

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सवाल :
संदीप जी, आप बताइए कि आप वाराणसी से गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल क्यों गए थे, किसकी सेवा के लिए गए थे और वहां क्या हुआ?
जवाब :
मैंने, मेरी जिंदगी में भगवान के अलावा यदि किसी को माना, तो वह श्री शिव प्रसाद यादव जी हैं। वे बीमार हुए थे, इसलिए हम उन्हें लेकर गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल गए थे। वहां और भी लोग थे, बाद में भी आए, लेकिन उन लोगों ने क्या भूमिका निभाई, यह मैं नहीं बता सकता।
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सवाल :
कौन-कौन लोग थे, उनके नाम भी बता दीजिए।
जवाब :
वही नाम जो चल रहे हैं – राजेश यादव, प्रवीण यादव, किशन दीक्षित, अंकित रस्तोगी और पुरु यादव।
मैं बताना चाहूंगा कि शिव प्रसाद यादव मेरे दादाजी हैं। उन्होंने ही मुझे पढ़ाया-लिखाया है। बचपन में जब मैं उनके पास जाता था, तो वे मुझे पैसे देते थे, उन्हीं पैसों से मैंने पढ़ाई की। दादाजी मेरे लिए भगवान का दूसरा रूप हैं। उनके लिए मैं मर भी जाऊं तो कम है। लेकिन उनके साथ जो लोग चलते हैं, उनमें जलन रखने वाले लोग भी हैं। वही पांच लोग वहां थे।
मेदांता हॉस्पिटल में बाहर का खाना अलाउड नहीं होता, वहीं का खाना मिलता है। लेकिन पहली बार पुरु यादव बाहर से खाना लाए। वह खाना अंकित जी ने बनाया था। ये सभी लोग अस्पताल के सामने वाले फ्लैट में रहते थे और रोज वहीं से खाना भेजते थे। हम अस्पताल के एक कमरे में रहते थे और 24 घंटे में 24 सेकंड के लिए भी बाहर नहीं आते थे। दादाजी से भी पूछ लीजिएगा। खाना यही लोग देते थे। उसमें क्या मिलाया गया, क्या नहीं, यह भगवान और देने वाला ही जानता है।
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सवाल :
मुंबई की डॉक्टर मेघा धामने ने आपके रक्त की जांच में थैलियम की पुष्टि की। खाना यही लोग बनाते थे, आप खुद थैलियम तो खा नहीं लेंगे। ऐसे में या तो बनाने वाले ने मिलाया या पहुंचाने वाले ने। यह पुलिस जांच का विषय है। इन पांचों में से किसी को भी क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। इस पर आपका क्या कहना है?
जवाब :
सीधी सी बात है, मेरे भगवान अस्पताल में भर्ती थे और मैं उनकी सेवा में लगा था। मुझे खाने से कोई मतलब नहीं था। जो मिलता था खा लेते थे। ये लोग फ्लैट पर क्या बना रहे थे, क्या मिला रहे थे, कौन मिला रहा था-हमें कुछ नहीं पता । हम सिर्फ इतना जानते हैं कि खाना यही लोग देते थे और काफी लंबे समय तक देते रहे। इसलिए हमें लगा कि खाने में कुछ ऐसा मिला, जिससे जांच में थैलियम आया।
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सवाल :
आपकी नजर में इन पांचों की भूमिका संदिग्ध है या नहीं?
जवाब :
बिल्कुल है ! जब खाना कोई और नहीं, यही लोग दे रहे थे, तो हम किसे संदिग्ध मानें?
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सवाल :
एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दावा किया गया कि शिव सरदार ने आपके खाते में 3 करोड़ से अधिक रुपये दिए और आपने वापस नहीं किए। इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब :
मैंने पहले ही कहा है कि शिव सरदार मेरे लिए भगवान से बढ़कर हैं। उनका सहयोग हमेशा रहा है। लेकिन जिस पत्रकार ने फोन किया, उसने मेरी बात पर एक शब्द भी नहीं बोला और साजिशकर्ताओं के कहने पर गलत बातें चलाईं। दादाजी ने मुझ पर बहुत एहसान किया है।
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सवाल :
क्या शिव सरदार ने आपको 3:30 करोड़ रुपये दिए?
जवाब :
उन्होंने खाते में जो दिया है वह मैंने खाते से वापस भी किया है। उसमें साढ़े तीन रुपया भी बाकी नहीं होगा। व्यापार के मामले में हम ईमानदार आदमी हैं। मुझे अपनी जिंदगी में दो ही नशा है, दो ही नशा मैंने किया है, पहला- इज्जत कमाने का, दूसरा- पैसा कमाने का। इज्जत बेचकर पैसा नहीं कमाने का। तो यह जो क्लाउन टाइम्स के संपादक अशोक मिश्रा हैं इन्होंने जो दिखाया है, इन्होंने हमको जहर देने वाले संदिग्ध लोगों के कहने पर अपने मन का दिखाया है। मैं इनके ऊपर भी मुकदमा करने जा रहा हूं। मैं इनके खिलाफ मुकदमा करूंगा। दुनिया की कोई ताकत मुझे नहीं रोक सकती। मैं मुकदमा जरूर करूंगा, इसने मुझे साढ़े तीन करोड़ का कर्जदार बतायाहै। इससे पूछिए कभी साढे तीन करोड़ इसने देखा है।
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सवाल :
तो आप यह मानते हैं कि शिव सरदार ने आपको पैसा दिया, लेकिन आपने उनका पाई-पाई वापस कर दिया?
जवाब :
जब-जब उन्होंने जो भी दिया है, ईमानदारी से मैं वापस किया है। इसने 3:30 करोड़ रुपये कैसे बोला। मुझे बेइज्जत कर रहा है। मैंने मेहनत से इज्जत कमाई है। मार्केट में गुडविल कमाई है। हमारी गुडविल और इज्जत को क्लाउन टाइम्स ने बेच दिया।
सवाल :
संदीप जी एक सफल व्यापारी थे। ट्रांसपोर्ट का इनका कारोबार है, एनटीपीसी से जुड़कर यह काम करते थे। संदीप जी, यह बताइए कि आपके व्यापारिक रिश्ते किन-किन लोगों से रहे हैं।
जवाब :
देखिए, व्यापारिक रिश्ते तो बहुत रहे हैं। लेनदेन बहुत लोगों के साथ रहा है। लेकिन मैंने एक कंपनी के साथ काम किया था, अस्पताल में भर्ती होने से पहले। अंजलि कंस्ट्रक्शन नाम की यह कंपनी अजय सिंह खलनायक की कंपनी है। मैं इस पर काम किया था। इनके साथ काम में ₹10 टन की मार्जिन पर मैं काम किया था। मेरा लगभग 1 करोड़ 15 लाख रुपये इनके ऊपर बकाया था। इनके अंदर यदि जरा-सी भी इंसानियत होती या थोड़ी भी गैरत होती, तो मेरी बीमारी के दौरान मेरा पैसा मुझे दे दिए होते। जबकि आगे से पेमेंट आ चुका था। उसके बावजूद मेरा पैसा नहीं दिया गया। तो यह सब क्या है। और क्लाउन टाइम्स उल्टा दिखा रहे हैं। जबकि मेरा लेना बाकी है, देना किसी को नहीं है।
सवाल :
आपके हिसाब से एक करोड़ 15 लाख आपका अंजलि कंस्ट्रक्शन पर बकाया है।
जवाब :
आप मेरे चार्टर्ड अकाउंटेंट सीए के पास चले जाइए, उनके पास जाकर रिकॉर्ड चेक कर लीजिए। मैंने उनकी कंपनी को बिल दिया है, यह नंबर एक का पैसा है, जो उनके ऊपर मेरा बकाया है। मेरे चार्टर्ड अकाउंटेंट के पास जाकर आप इसकी पुष्टि कर लीजिए। वाराणसी में उनके घर जाइए और डिटेल ले लीजिए।
देखिए, मेरे लिए सबसे बड़ी दुख की बात यह भी है कि मैं मुंबई के अस्पतालों में पड़ा था। एक नहीं, तमाम अस्पतालों में मैं जिंदा लाश की तरह पड़ा रहा। ऐसे वक्त में मेरा अपना पैसा लोगों ने जब नहीं दिया, आगे से पेमेंट मिलने के बाद भी नहीं दिया, तो ऐसे लोगों से हम क्या उम्मीद करें। अजय सिंह के यहां मेरा पैसा बाकी था, नंबर एक से अकाउंट पर। एक करोड़ 15 लाख कुछ रुपये बकाए थे, मुझे आज भी याद है। लेकिन मुझे वह पैसा नहीं मिला, तो भी मैंने किसी से नहीं कहा। यदि मैंने किसी से यह कहा हो, तो कोई भी मुझे बता दे। लेकिन ईमानदारी से मुझे वह पैसा मिलना चाहिए था।
ऐसे बुरे वक्त में, जब मैं मुंबई के तमाम अस्पतालों में मौत से लड़ते हुए बेड पर पड़ा था। और एक बड़ी बात बताऊं, माइक पर बताने वाली बात नहीं है, लेकिन बता रहा हूं कि मुझसे मिलने तक नहीं आए, एक बार भी मिलने तक नहीं आए। जब मिलने तो आए नहीं, तो पैसा क्या देते, यह शर्म की बात है। इतने बड़े-बड़े लोग हमसे मिलने के लिए नहीं आए। कोई बात नहीं, लेकिन मेरा पैसा तो कम से कम अपने नौकर से भेजवा दिए होते। अकाउंट में लगाना था, लगा दिए होते। दुख की कितनी पराकाष्ठा आपको बताऊं। दुख बहुत है। न कहूं तो अच्छा है, मेरा मुंह न खुले तो अच्छा है।
मैं आज जिंदा हूं तो कर्ज के पैसे से जिंदा हूं। भगवान की दया से जिंदा हूं। लेकिन एक बात और आपको बता दूं। ऑफिशियल बात नहीं है, यह एक अनऑफिशियल बात है। मेरे इलाज के लिए कर्ज मेरे भाई अजीत सिंह ने लिया। अजीत सिंह नहीं होते, तो मैं आज यहां बैठकर आपसे बात नहीं कर रहा होता। मैं यहां बैठकर बात कर रहा हूं, तो मेरे भाई की वजह से कर रहा हूं। वह मेरे लिए भगवान का दूसरा रूप है। मैं अगर जिंदा हूं, तो उन्हीं की वजह से जिंदा हूं। अगर यह लोग मेरा पैसा देना चाहते होते, तो मेरे अकाउंट में डालकर एक फोन कर दिए होते।

सवाल :
संदीप जी, समाजवादी पार्टी के लिए आप जेल गए, लाठी-डंडे खाए। मुझे याद है, एक बार खून से लथपथ, हाथ टूटे हुए हालात में आपको आउटलुक मैगजीन ने भी कवर किया था। लगातार समाजवादी पार्टी के लिए आपने सड़क पर संघर्ष किया। लाठी-डंडे खाए और जेल भी गए। समाजवादी पार्टी की तरफ से इस बुरे समय में आपको क्या सपोर्ट मिला?
जवाब :
मैं बहुत डर रहा था कि कहीं आप यह सवाल न कर लें हमसे। यह सवाल केवल आपने नहीं किया, आपसे पहले भी 100 लोग यह सवाल कर चुके हैं कि आप तो समाजवादी पार्टी के बड़े कर्मठ सिपाही थे, आपके लिए पार्टी क्या कर रही है। मुझे बहुत डर था कि कहीं यह सवाल आप भी न कर लें। आपने यह सवाल पूछकर हमको भूक कर दिया।
9 से 10 महीने हो गए, मैं भर्ती था। अतुल प्रधान जी, जो सरधना के विधायक हैं, हमसे मिलने भी आए थे और मेरा हाल-चाल फोन करके मेरे भाई से लेते थे। हमें बताया गया कि अखिलेश यादव जी ने भी, जब मैं हिंदूजा हॉस्पिटल में था, तब मेरे भाई साहब को फोन करके एक बार हाल-चाल पूछा था। लेकिन बनारस भर के पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कभी मुझे इंसाफ दिलाने के लिए आवाज नहीं उठाई। मुझे इसका बहुत दुख है।
मैं उन नेताओं का चरण छूकर प्रणाम करता हूं और पूरी जिंदगी जब भी मिलूंगा, चरण छूकर प्रणाम करूंगा। मैं समाजवादी पार्टी का सिपाही था, समाजवादी पार्टी का सिपाही हूं और जिंदगी भर समाजवादी पार्टी का सिपाही रहूंगा। आजीवन, मरते दम तक मैं समाजवादी पार्टी का ही रहूंगा।
मैं आपको बता दूं कि मैं यहां जिस फिजियोथैरेपी सेंटर में फिजियोथैरेपी के लिए आता हूं, यहां भी मैं सभी लोगों को कसम देकर कहता हूं कि 2027 में अखिलेश यादव जी को वोट देना है और समाजवादी पार्टी की सरकार बनानी है। मैं अपने 3 साल के बेटे की कसम खाकर कह रहा हूं कि मैं आज भी सब से समाजवादी पार्टी को वोट देने के लिए कहता हूं। मेरे फिजियोथैरेपी सेंटर में मैं अच्छे-अच्छे भाजपाइयों के सामने भी सबको कसम देता हूं कि सब लोग सपा को वोट देना।
लेकिन मुझे इस बात का बहुत दुख है कि समाजवादी पार्टी के एक भी सिंगल नेता ने मुझे न्याय दिलाने के लिए आवाज नहीं उठाई। गलियों से लेकर सड़क तक, लखनऊ तक या विधानसभा तक, कहीं किसी ने भी आवाज नहीं उठाई। इस बात के लिए मुझे शर्म आती है। लेकिन मैं मरते दम तक समाजवादी पार्टी का रहूंगा, बस बात यही है।
सवाल :
आप मरते दम तक समाजवादी पार्टी के रहेंगे, लेकिन आपकी ही पार्टी के शहर दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र के एक प्रत्याशी किशन दीक्षित इस खबर के सामने आने के बाद से घूम-घूम कर आपके खिलाफ ऊंट-पटांग बोल रहे हैं। उनका कहना है कि संदीप मुझे झूठ में बदनाम कर रहा है।
जवाब :
अब आप बिल्कुल सही जगह आए हैं। हालांकि मैं बिल्कुल यहां नहीं आना चाहता था, लेकिन जब आप आए हैं तो मैं भी बता दूं। समाजवादी पार्टी के इस प्रत्याशी के लिए मैंने कितना मार खाया है और कितना संघर्ष किया है, यह बात समाजवादी पार्टी जानती है। माननीय अखिलेश यादव जी ने मुझे अपनी कलम से समाजवादी छात्र सभा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया था। लेकिन दक्षिणी क्षेत्र के यह नेता अपने आप को समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा नेता मानते हैं। यह पूरे उत्तर प्रदेश में खुद को सबसे बड़ा नेता समझते हैं।
इन्होंने मुझे जहर देने का काम किया या नहीं किया, यह मुझे नहीं पता, लेकिन जहर देने वालों के साथ साजिश में यह भी रहे हैं। उनका नाम किशन दीक्षित है। दक्षिणी के बहुत बड़े नेता हैं वह। उनके जैसा नेता आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ, यह बात वह स्वयं कहते हैं। उनके व्यवहार से यह आपको भी लगेगा।
संदीप सिंह जिंदा बचकर अगर आज यहां बैठे हैं, तो दो लोगों की वजह से-एक भगवान और दूसरा अपने भाई की वजह से, जिसने मुझे जिंदा बचाया।
मेरा बड़ा भाई आम आदमी पार्टी से दक्षिणी विधानसभा का चुनाव लड़ा था, और मैंने सारे संबंध, सगे-बड़े भाई का संबंध, परिवार का संबंध, सब पर पर्दा डालकर समाजवादी पार्टी का तन, मन और धन से प्रचार किया था। मेरा बच्चा 3 साल का है, मैं उसकी कसम खाकर कह रहा हूं कि मैंने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी किशन दीक्षित का प्रचार जितना हो सका, तन, मन, धन से किया। जितना हो सका, मैंने उतना किया, हर तरीके से किया। वोटर लिस्ट में नाम बढ़ाने से लेकर। लेकिन वह आदमी…! क्या



