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परिवहन निगम में महिलाओं को रोजगार दयाशंकर कर रहे नारी शक्ति का उद्धार

महिलाओं को रोजगार का सशक्त पहिया परिवहन निगम में 2584 परिचालकों की भर्ती

  • रोजगार का अवसर या संविदा का जाल?
  • घर के पास नौकरी: सुविधा या सीमित विकल्प
  • मेरिट का गणित अंक बनाम अवसर
  • प्रमाणपत्र की शर्त योग्यता या बाधा
  • मेहनत का मोल 2.16 रुपए प्रति किलोमीटर
  • प्रोत्साहन का प्रलोभन 5000 किमी की शर्त
  • रोजगार मेला पारदर्शिता या दिखावा
  • महिला सशक्तिकरण बनाम अस्थिर भविष्य

लखनऊ/बलिया। उत्तर प्रदेश में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक और ठोस कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने परिवहन निगम में 2584 महिला परिचालकों की संविदा पर भर्ती का निर्णय लिया है। यह पहल केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है। खास बात यह है कि चयनित महिलाओं को उनके गृह जनपद के डिपो में ही तैनात किया जाएगा, जिससे उन्हें अपने परिवार के पास रहते हुए काम करने का अवसर मिलेगा। यह व्यवस्था उन महिलाओं के लिए विशेष रूप से राहतकारी है, जो दूर-दराज क्षेत्रों में नौकरी करने में सामाजिक या पारिवारिक बाधाओं का सामना करती हैं।
परिवहन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दयाशंकर सिंह ने इस योजना की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और सरल बनाया जाएगा। इसके लिए प्रदेश के विभिन्न शहरों में रोजगार मेलों का आयोजन किया जाएगा, जिससे अधिक से अधिक योग्य महिलाएं इस अवसर का लाभ उठा सकें। सरकार का यह कदम उस सोच को भी चुनौती देता है, जिसमें सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है। इस भर्ती में न्यूनतम शैक्षिक योग्यता इंटरमीडिएट रखी गई है और साथ ही सीसीसी प्रमाणपत्र अनिवार्य किया गया है, जो डिजिटल दक्षता को सुनिश्चित करता है। यह संकेत है कि सरकार अब केवल रोजगार नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से सक्षम कार्यबल तैयार करने पर भी ध्यान दे रही है। चयन प्रक्रिया पूरी तरह मेरिट आधारित होगी, जिसमें इंटरमीडिएट के अंकों के आधार पर सूची तैयार की जाएगी। इसके अलावा एनसीसी ‘बी’ प्रमाणपत्र, एनएसएस या भारत स्काउट एवं गाइड के राज्य अथवा राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अभ्यर्थियों को अतिरिक्त 5 प्रतिशत भारांक दिया जाएगा, जो युवाओं को अनुशासन और सामाजिक सेवा की दिशा में प्रेरित करता है। आर्थिक दृष्टि से भी यह योजना महत्वपूर्ण है। चयनित महिला परिचालकों को प्रति किलोमीटर 2.16 रुपये का पारिश्रमिक मिलेगा और यदि वे प्रतिमाह 22 दिन में 5000 किलोमीटर की ड्यूटी पूरी करती हैं, तो उन्हें 3000 रुपये का अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा। इसके अलावा ईपीएफ, मुफ्त यात्रा पास और रात्रि भत्ता जैसी सुविधाएं भी दी जाएंगी, जो इस नौकरी को अधिक आकर्षक बनाती हैं। इस पूरी योजना को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक भर्ती नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, ग्रामीण और शहरी रोजगार के बीच की खाई को पाटने और परिवहन व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने की एक व्यापक पहल है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या संविदा आधारित यह रोजगार लंबे समय में महिलाओं को स्थायित्व और सुरक्षा दे पाएगा।

महिला सशक्तिकरण या संविदा मॉडल का विस्तार

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा परिवहन निगम में 2584 महिला परिचालकों की संविदा भर्ती का निर्णय पहली नजर में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक सकारात्मक पहल प्रतीत होता है। लेकिन जब इस निर्णय को गहराई से परखा जाता है, तो इसके कई आयाम सामने आते हैं। एक ओर यह महिलाओं को रोजगार देने का अवसर है, वहीं दूसरी ओर यह संविदा आधारित रोजगार मॉडल के विस्तार की कहानी भी कहता है। सरकार लगातार स्थायी नौकरियों की बजाय संविदा प्रणाली को बढ़ावा दे रही है। इससे एक तरफ जहां सरकारी खर्च कम होता है, वहीं कर्मचारियों को स्थायित्व, पेंशन और अन्य दीर्घकालिक लाभों से वंचित रहना पड़ता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह भर्ती महिलाओं को सशक्त बनाएगी या उन्हें अस्थायी श्रमिक के रूप में सीमित कर देगी।

गृह जनपद में तैनाती सामाजिक बाधाओं को तोड़ने की कोशिश

इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चयनित महिलाओं को उनके गृह जनपद में ही तैनात किया जाएगा। यह निर्णय ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अक्सर देखा गया है कि परिवार और समाज के दबाव के कारण महिलाएं दूर शहरों में नौकरी करने से कतराती हैं। गृह जनपद में तैनाती से परिवार का समर्थन मिलता है, सुरक्षा संबंधी चिंताएं कम होती हैं, नौकरी और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संतुलन संभव होता है, यह कदम न केवल महिलाओं को रोजगार देगा, बल्कि समाज में उनकी भूमिका को भी मजबूत करेगा।

योग्यता और चयन प्रक्रिया मेरिट बनाम अवसर

भर्ती के लिए इंटरमीडिएट और सीसीसी प्रमाणपत्र अनिवार्य किया गया है। यह शर्तें जहां एक ओर न्यूनतम गुणवत्ता सुनिश्चित करती हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की कई योग्य लेकिन तकनीकी रूप से वंचित महिलाओं के लिए बाधा भी बन सकती हैं।

मेरिट आधारित चयन के प्रमुख बिंदु

इंटरमीडिएट अंकों के आधार पर चयन, एनसीसी, एनएसएस, स्काउट-गाइड प्रमाणपत्र पर 5 फीसदी का अतिरिक्त भारांक, कौशल विकास मिशन से जुड़ाव अनिवार्य। यह व्यवस्था पारदर्शिता लाती है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वंचित वर्ग की महिलाओं को इसमें बराबर अवसर मिले।

पारिश्रमिक और सुविधाएं क्या यह पर्याप्त

सरकार द्वारा घोषित पारिश्रमिक संरचना इस प्रकार है
2.16 रुपए प्रति किलोमीटर भुगतान, 5000 किमी प्रति माह पर 3000 अतिरिक्त प्रोत्साहन, ईपीएफ सुविधा, मुफ्त यात्रा पास, रात्रि भत्ता पहली नजर में यह पैकेज आकर्षक लगता है, लेकिन जब इसे महंगाई और जीवन यापन की लागत से जोड़ा जाता है, तो सवाल उठता है कि क्या यह पर्याप्त है? खासकर तब, जब यह नौकरी स्थायी नहीं है।

रोजगार मेला अवसर या औपचारिकता

भर्ती प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए विभिन्न शहरों में रोजगार मेलों का आयोजन किया जाएगा। यह पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर ही इसकी सफलता निर्भर करेगी। पारदर्शिता बनाए रखना, ग्रामीण क्षेत्रों तक सूचना पहुंचाना, बिचौलियों की भूमिका रोकना यदि इन चुनौतियों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह योजना भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह कागजों तक सीमित रह सकती है।

संविदा बनाम स्थायी नौकरी

यह पूरी भर्ती संविदा आधारित है, जो अपने आप में एक बड़ा मुद्दा है। संविदा कर्मचारियों को नौकरी की स्थिरता नहीं होती, भविष्य की सुरक्षा सीमित होती है, प्रमोशन और करियर ग्रोथ के अवसर कम होते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या सरकार महिलाओं को केवल अस्थायी रोजगार देना चाहती है या उन्हें दीर्घकालिक रूप से सशक्त बनाना चाहती है।

परिवहन व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी

यह भर्ती परिवहन क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब तक यह क्षेत्र पुरुष प्रधान रहा है, लेकिन इस पहल से महिलाओं की दृश्यता बढ़ेगी, सामाजिक सोच में बदलाव आएगा, अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के लिए रास्ते खुलेंगे।

योजना दोधारी तलवार की तरह

यह योजना एक दोधारी तलवार की तरह है एक ओर यह महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर देती है, वहीं दूसरी ओर संविदा आधारित रोजगार की अस्थिरता भी सामने लाती है। सरकार की मंशा सकारात्मक है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाता है। अगर यह पहल सही तरीके से लागू होती है, तो यह उत्तर प्रदेश में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। लेकिन अगर यह केवल आंकड़ों तक सीमित रह गई, तो यह भी उन योजनाओं की सूची में शामिल हो जाएगी, जिनकी घोषणा तो बड़ी होती है, लेकिन जमीन पर असर सीमित रह जाता है।

* 2584 महिला परिचालकों की संविदा भर्ती
* गृह जनपद में तैनाती की सुविधा
* इंटरमीडिएट + सीसीए अनिवार्य
* मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया
* 5 फीसदी अतिरिक्त भारांक (एनसीसी/एनएसएस/स्काउट)
* 2.16 रुपए प्रति किमी पारिश्रमिक
* 5000 किमी पर 3000 रुपए का प्रोत्साहन
* ईपीएफ, मुफ्त पास, रात्रि भत्ता
* रोजगार मेलों के जरिए भर्ती
* संविदा प्रणाली पर सवाल

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