
– इसी मॉनसून सत्र में लाए जाएंगे दोनों बिल, 2029 के चुनाव में अमल होंगे
– जन्मदर के आधार पर पिछड़े दक्षिण के राज्य, सीटें घटने से परेशान
– विपक्ष अब इसका विरोध नहीं कर पाएगी, क्योंकि सरकार को दी थी चुनौती
– संसद की कुल सीटें 50 फीसदी ज्यादा होंगी
नई दिल्ली। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार संसद के इसी मॉनसून सत्र में नया परिसीमन कानून लाने जा रही है। इसे 2011 में हुई जनगणना के आधार पर लाया जाएगा। इसके पारित होने के बाद संसद में सीटों की कुल संख्या 50 प्रतिशत बढ़ जाएगी। इसके अलावा केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी पेश करने जा रही है। यह 2023 के उस कानून की जगह लेगा, जिसमें नई जनगणना के बाद देश में महिला आरक्षण को लागू करने की बात कही गई है। लेकिन अब महिला आरक्षण के लिए भी आधार वर्ष 2011 की जनगणना को माना जाएगा।
कैबिनेट में होगा विचार
इसके आधार पर संसद की कुल सीटें 816 हो जाएंगी, जिनमें से 33 फीसदी, यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी के अनुसार अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण भी लागू होगा। नई व्यवस्था के अनुसार, संसद की 136 सीटें अनुसूचित जाति, 70 सीटें अनुसूचित जनजाति और बाकी की सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित की जाएंगी।
सरकारी सूत्रों ने बताया कि इन विधेयकों को संसद में पेश करने से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में पेश किया जाएगा, जहां से ये मंजूर होने के बाद ही संसद के पटल पर रखी जाएंगी। इन बिलों में महिला आरक्षण की बात लॉटरी के आधार पर रखी गई है। एक बार किसी सीट के महिला के लिए आरक्षित हो जाने के बाद वह सीट 15 साल के लिए महिलाओं के लिए आरक्षित मानी जाएगी। नए कानूनी प्रावधान 2029 के लोकसभा चुनाव में अमल में लाए जाएंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण विधेयक को लेकर गैर कांग्रेसी विपक्ष के सदस्यों से अलग से चर्चा की है। सोमवार की इस कवायद के बाद शाम को संसद भवन में ही एनडीए के सहयोगी दलों के नेताओं की गृह मंत्री की अध्यक्षता में बैठक हुई, जिसमें भावी रणनीति पर विचार किया गया। इससे पहले दक्षिण भारत में एनडीए के सहयोगियों ने परिसीमन के कारण उनकी सीटें घटने को लेकर चिंता जताई थी। सरकार में सहयोगी दल आंध्रप्रदेश के तेलुगू देशम पार्टी के नेता और सीएम चंद्रबाबू नायडू की चिंता यह थी कि परिसीमन से उत्तर भारतीय राज्यों को सीटों का बड़ा फायदा होगा, जबकि दक्षिणी राज्यों की सीटें घट जाएंगी।

टीडीपी खुश है
इसके बावजूद टीडीपी को परिसीमन के मुद्दे पर ज्यादा चिंता नहीं है। पार्टी के सांसद और लोकसभा में फ्लोर लीडर लारू श्रीकृष्ण देवरायुलु ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने सभी को परिसीमन के मसले पर एनडीए की रणनीति को साफतौर पर सामने रखा है और हम इस कदम से खुश हैं। हमारी इकलौती चिंता इस बात से है कि देश के दक्षिणी राज्यों में जन्मदर कम है, इसलिए जनसंख्या भी कम है। ऐसे में उत्तरी राज्यों- जहां जन्मदर भी अधिक है और जनसंख्या भी ज्यादा है, वहां के राज्यां को परिसीमन की इस कार्यवाही का ज्यादा फायदा मिलेगा। वहीं वायएसआर कांग्रेस के सांसद मिधुन रेड्डी ने कहा कि उनकी पार्टी संसद में महिला आरक्षण बिल को लाने के सरकार के कदम से खुश है। लेकिन हम पहले दोनों विधेयकों पर पार्टी के मंच पर चर्चा करना चाहते हैं।
डीएमके विधेयक के खिलाफ
इधर, डीएमके परिसीमन से घटने वाली सीटों को लेकर परेशान है। पार्टी के नेता तिरुची शिवा ने कहा कि हम तो पार्टी में दोनों बिलों पर चर्चा के बाद ही अपनी रणनीति तय करेंगे। यही हाल कांग्रेस का भी है, जहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अपने नेताओं से चर्चा के बाद ही रणनीति जाहिर करने की बात कर रहे हैं। इससे पहले कांग्रेस ने केंद्र सरकार को परिसीमन और पारी शक्ति वंदन को लागू करने की चुनौती दी थी। ऐसे में कांग्रेस ही नहीं, बल्कि समूचे विपक्ष के लिए इन बिलों का विरोध करना आसान नहीं होगा।
कानून में करना होगा संशोधन
नियम के तहत नई जनगणना के बाद जब परिसीमन होगा, तब उसके हिसाब से सीटों की संख्या तय होगी, फिर उसका 33 फीसदी महिलाओं के लिए रिजर्व किया जाना चाहिए। जो संवैधानिक प्रावधान है, उसके हिसाब से जनगणना के बाद ही परिसीमन होना है। अब अगर सरकार चाहती है कि रिजर्वेशन लागू करना है तो उसे 2011 के जनगणना के मुताबिक ही अमल करना होगा, लेकिन इसके लिए कानून में बदलाव के साथ-साथ संविधान में संशोधन कर प्रावधान करना होगा।
2002 में बना था कमिशन
वैसे 2001 के जनगणनना के बाद 2002 में डीलिमिटेशन कमिशन का गठन किया गया और रिटायर जस्टिस कुलदीप सिह उसके चेयरपर्सन बने। उनकी ओर से सिफारिश भी की गई। इसी दौरान संविधान में 84वां संशोधन कर डीलिमिटेशन एक्सरसाइज को रोक दिया गया। लोकसभा की सीटों की संख्या को दोबारा आकलन यानी रीएडजस्टमेट को 2026 तक रोक दिया गया था।
1972 में सीटों को आखिरी बार रिवाइज किया गया
1952, 1963, 1973 और 2020 में डीलिमिटेशन कमिशन का गठन हुआ था। लेकिन, 1972 में सीटों को आखिरी बार रिवाइज किया गया और सीटों की संख्या बढ़ाकर 543 कर दी गई, लेकिन उसके बाद सीटों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो पाई।
क्यों जरूरी है परिसीमन ?
परिसीमन के तहत तय सीटों की भौगोलिक सीमा में परिवर्तन होता है और उसे जनसंख्या के अनुपात में घटाया-बढ़ाया जा सकता है। अनुच्छेद-82 के तहत डेमोग्राफिक चेंज होता है। साथ ही अनुच्छेद-82 यह भी प्रावधान करता है कि जनगणना के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभा की सीटों का दोबारा एडजस्टमेंट हो सकता है यानी सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। लेकिन, इसके लिए कानूनी प्रावधान यह है कि डीलिमिटेशन ऐक्ट के तहत एक डीलिमिटेशन कमिशन का गठन होगा और वह इस कवायद को देखेगा। संसद द्वारा बनाए गए ऐक्ट के तहत डीलिमिटेशन कमिशन का गठन होना होता है और उसमें तीन मेंबर होंगे और उसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जस्टिस करेंगे। यह हाई पावर कमिटी होगी और उसकी सिफारिश में बदलाव भी नहीं हो सकता।



