पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल की ढिलाई,मातहत अधिकारियों की जारी है ढिठाई
वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट का हाल-स्लग

* जनसुनवाई या जनभुलावा? कमिश्नर साहब की चौखट पर दम तोड़ती फरियाद
* वाराणसी पुलिस में सुनवाई नहीं, सिर्फ ‘रिपोर्ट-रिपोर्ट’ का खेल
* कमिश्नर साहब, ये कौन-सी पुलिसिंग है जहां शिकायत से पहले ही निस्तारण हो जाता है?
* चौकीदार बोले सब ठीक है, एसीपी ने माना, कमिश्नर ने देखा ही नहीं!
* जनसुनवाई पोर्टल नहीं, वाराणसी कमिश्नरेट का डिजिटल कब्रिस्तान
* 25 शिकायतें, 25 झूठी रिपोर्टें और एक मौन कमिश्नर
* काशी में न्याय नहीं, कॉपी-पेस्ट रिपोर्ट का राज जनता रोती रही, पुलिस फाइल बंद करती रही

वाराणसी। कहते हैं लोकतंत्र में सबसे बड़ा हथियार ‘सुनवाई’ होती है। लेकिन वाराणसी कमिश्नरेट में यह हथियार अब खोखला, जंग लगा और सिर्फ दिखावे का औजार बन चुका है। यहां जनसुनवाई होती तो है, लेकिन जन की नहीं, सिर्फ कागजों की। फरियादी आता है, अपनी पीड़ा सुनाता है, उम्मीद की एक डोर बांधता है और बदले में उसे मिलती है वही पुरानी, घिसी-पिटी रिपोर्ट ‘आवेदक से वार्ता की गई’, ‘कोई पुष्टिकारक साक्ष्य नहीं मिला’। सवाल यह नहीं कि रिपोर्ट गलत है या सही। सवाल यह है कि बिना जांच, बिना बातचीत, बिना मौके पर जाए रिपोर्ट आती कैसे है? थानेदार लिखता है, चौकी प्रभारी मुहर लगाता है, एसीपी हस्ताक्षर कर देता है और मामला ‘निस्तारित’ घोषित कर दिया जाता है। अगर लोकतंत्र में उम्मीद की आखिरी खिड़की किसी आम आदमी के लिए बची है, तो वह है जनसुनवाई। लेकिन वाराणसी कमिश्नरेट में यह खिड़की अब खुलती नहीं, सिर्फ दिखती है। बाहर से चमकदार, भीतर से जंग खाई। फरियादी आता है, अपनी पीड़ा दर्ज कराता है, पोर्टल पर शिकायत नंबर मिलता है और साथ ही एक अदृश्य आश्वासन अब न्याय मिलेगा। लेकिन यही आश्वासन कुछ ही दिनों में एक परिचित सरकारी जुमले में बदल जाता है मामले में कोई पुष्टिकारक साक्ष्य प्रकाश में नहीं आया। यह वाक्य अब सिर्फ एक रिपोर्ट लाइन नहीं, बल्कि वाराणसी पुलिस की जनसुनवाई व्यवस्था की आत्मा बन चुका है। वही शब्द, वही भाषा, वही निष्कर्ष चाहे मामला जमीन विवाद का हो, मारपीट का, धमकी का या पुलिसिया निष्क्रियता का। जांच अलग-अलग मामलों की होती है, लेकिन रिपोर्ट एक जैसी। मानो सच्चाई की नहीं, बल्कि सुविधा की जांच हो रही हो। थाना और चौकी स्तर पर भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं, लेकिन जब यही भ्रष्टाचार जनसुनवाई पोर्टल की आड़ में वैधता का चोला ओढ़ ले, तो समस्या साधारण नहीं रह जाती। यहां फरियादी से न तो ठीक से बात की जाती है, न मौके पर जाकर जांच होती है और न ही दस्तावेज़ों को गंभीरता से देखा जाता है। इसके बावजूद रिपोर्ट में पूरे आत्मविश्वास से लिखा जाता है, आवेदक से वार्ता की गई। सवाल यह है कि कौन-सी वार्ता? कब हुई और क्यों आवेदक को इसका पता तक नहीं? सबसे बड़ा व्यंग्य तब सामने आता है, जब पीड़ित थाना-चौकी से हारकर पुलिस मुख्यालय या आयुक्त कार्यालय का दरवाज़ा खटखटाता है। उसे उम्मीद होती है कि अब कोई वरिष्ठ अधिकारी उसकी बात सुनेगा। लेकिन यहां भी वही पुराना खेल। अधिकारी गंभीरता से सिर हिलाते हैं, सहानुभूति दिखाते हैं और अंत में फाइल फिर उसी थाने भेज दी जाती है, जहां से पीड़ित को पहले ही निराशा मिली थी। यानी न्याय का रास्ता गोल-गोल घूमकर फिर वहीं आ जाता है, जहां से शुरुआत हुई थी। कागजों में भले ही आयुक्त कार्यालय में रोज 25 से 50 मामलों की जनसुनवाई हो रही हो, लेकिन असली सवाल यह है कि उन मामलों में विधिवत कार्रवाई कितनी हो रही है? क्या किसी थानेदार से यह पूछा गया कि उसने जांच क्यों नहीं की? क्या किसी चौकी प्रभारी से जवाब तलब हुआ कि उसने मनमानी रिपोर्ट क्यों लगाई? क्या किसी एसीपी ने यह जिम्मेदारी ली कि उसने बिना जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर क्यों किए? इन सवालों का जवाब खामोशी है गहरी और सुविधाजनक खामोशी। इसी खामोशी में एक पीड़ित व्यक्ति ने जनसुनवाई पोर्टल पर 25 शिकायतें दर्ज कराईं। हर बार उसे यही भरोसा दिलाया गया कि इस बार न्याय होगा। लेकिन हर बार नतीजा वही एक जैसी रिपोर्ट, एक जैसा निष्कर्ष। यह संयोग नहीं, बल्कि एक सिस्टमेटिक पैटर्न है। और जब यह पैटर्न लगातार दोहराया जाए, तो सवाल सिर्फ थानेदार या चौकीदार पर नहीं, बल्कि पूरे कमिश्नरेट की निगरानी व्यवस्था पर उठता है। ऐसे में पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या वह इस जमीनी सच्चाई से अनजान है या फिर सब जानते हुए भी व्यवस्था को यूं ही चलने दिया जा रहा है?

थाने से लेकर एसीपी तक एक ही भाषा
काशी जहां न्याय की परंपरा धर्म और दर्शन से जुड़ी रही है, आज वहीं पुलिस की जनसुनवाई व्यवस्था आवेदनों की कब्रगाह बन चुकी है। फरियादी आता है, शिकायत करता है और लौटते समय उसके हाथ में सिर्फ एक पंक्ति होती है मामले में कोई पुष्टिकारक साक्ष्य नहीं पाया गया। थाने से लेकर एसीपी तक एक ही भाषा, एक ही रिपोर्ट जनसुनवाई पोर्टल पर दर्ज शिकायतों की जांच का तरीका बेहद सरल है चौकीदार रिपोर्ट लिखता है, चौकी प्रभारी उसी को आगे बढ़ाता है, थाना प्रभारी ‘संतुष्ट’ हो जाता है, एसीपी बिना जांच हस्ताक्षर कर देता है और मामला यहीं खत्म। न मौके का मुआयना, न आवेदक को फोन, न किसी दस्तावेज की मांग।
25 शिकायतें, 25 बार वही झूठ
एक पीड़ित ने हिम्मत नहीं हारी। उसने 25 बार शिकायत की हर बार उम्मीद थी कि शायद इस बार कोई अधिकारी सच सुनेगा। लेकिन हर बार जवाब वही रहा।
यहां तक कि एसीपी स्तर से भी चौकीदार की रिपोर्ट को ही सत्य मान लिया गया। जनसुनवाई का मतलब सिर्फ सुन लेना नहीं होता। आयुक्त कार्यालय में सुनवाई होती है यह सच है। लेकिन सुनवाई का मतलब सिर्फ सामने बैठा लेना नहीं होता। कार्रवाई कहां है? जवाबदेही कहां है? दंड कहां है? अगर हर शिकायत को वापस उसी थाने भेज दिया जाएगा जहां से न्याय नहीं मिला तो जनसुनवाई का औचित्य क्या है?
कमिश्नर साहब की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल से बड़ा सवाल यही है क्या आपको नहीं दिख रहा कि आपकी जनसुनवाई व्यवस्था खोखली हो चुकी है? अगर नहीं दिख रहा तो यह गंभीर लापरवाही है और अगर दिख रहा है लेकिन कार्रवाई नहीं हो रही तो यह सिस्टम की मिलीभगत है।
अब तक कितने थानेदारों से जवाब तलब हुआ? कितने एसीपी पर कार्रवाई हुई? कितनी झूठी रिपोर्टों की जांच हुई? मामला शून्य।
* जनसुनवाई पोर्टल पर बिना जांच रिपोर्ट लगाई जा रही
* चौकी-थाना-एसीपी सभी स्तरों पर एक ही झूठी भाषा
* 25 शिकायतों पर भी कोई वास्तविक जांच नहीं
* आयुक्त कार्यालय में सुनवाई सिर्फ औपचारिक
* पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल की चुप्पी सवालों के घेरे में



