बंगाल जीत नहीं सकती तो क्या राष्ट्रपति शासन लगाएगी मोदी सरकार?नए राज्यपाल भी निशाना लगाएंगे जोरदार
केंद्र के इशारे पर नहीं नाचा तो राज्यपाल बदल दिया, अब क्या लोकतंत्र हड़पेंगे?

* ममता बनर्जी बोलीं- न हमसे पूछा, बस बता दिया कि आरएन रवि बनेंगे गवर्नर, ये कैसा लोकतंत्र?
* 7 मई को खत्म होगा बंगाल विधानसभा का कार्यकाल
* उससे पहले कैसे चुनाव कराएगी केंद्र सरकार, जबकि सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट ही नहीं बनी?
* अमित शाह का यह नया अंदाज- जहां चुनाव नहीं जीत सकते, वहां राष्ट्रपति शासन लगा दो
सुष्मिता सेनगुप्ता कोलकाता। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने विगत इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति को सौंपे अपने इस्तीफे के पीछे बोस ने कोई कारण नहीं बताया है। बोस ने एक समाचार एजेंसी को केवल इतना ही कहा कि उन्होंने राज्यपाल के रूप में काफी समय बिताया है। ने नवंबर 2022 से बंगाल के राज्यपाल थे। बतौर राज्यपाल उनका कार्यकाल 6 साल का होता है, लेकिन चौथे ही साल उन्होंने इस्तीफा दे दिया। बोस ने इस्तीफा दिया या उनसे इस्तीफा लिखवा लिया गया, इस बात की अभी तक तस्दीक नहीं हुई है। हालांकि, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने ट्विटर यानी X पर बताया कि उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया है कि पटना में पैदा हुए तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल आरएन रवि बंगाल के नए राज्यपाल होंगे।

इसलिए लग सकता है राष्ट्रपति शासन
आपको बता दें कि अमित शाह गुरुवार को पटना में ही थे। वे वहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और राज्य के सीएम नितीश कुमार का राज्यसभा मेुं नामांकन दाखिल करवाने आए थे। ममता ने यह भी कहा कि आरएन रवि को बंगाल का राज्यपाल बनाने के लिए उनसे कभी चर्चा तक नहीं की गई, जो कि संवैधानिक परंपराओं का उल्लंघन है। ममता ने गाहे-बगाहे यह भी कह दिया कि आनंद बोस पर भाजपा नेतृत्व की कुछ शर्तों का पालन नहीं करने पर भारी दबाव था। वे चाहकर भी भाजपा नेतृत्व के हितों का पालन नहीं कर सके, इसलिए उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्यपाल का बदलना अभी तक किसी को समझ नहीं आया है। वहीं लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रखकर बंगाल की सीएम को केवल यह बताना कि राज्य के नए राज्यपाल कौन होंगे, यह साफप कर देता है कि कहीं न कहीं निवर्तमान राज्यपाल केंद्र सरकार की बातों पर चलने में नाकाम हुए हैं। इससे नाराज होकर केंद्र ने उनकी बलि ले ली। इस धारणा के पीछे की वजह यह है कि SIR के बावजूद बंगाल में भाजपा को अपेक्षित बढ़त नहीं मिल रही थी। इससे राज्य में भाजपा एकजुट होकर मजबूती से काम नहीं कर पाई। इसका एक और मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि राज्यपाल के रूप में केंद्र की भाजपा सरकार उन सभी असंवैधानिक कार्यों की एक राज्यपाल से उम्मीद रखती है, जो लोकतांत्रिक परंपराओं से अलग हैं और यह काम तमिलनाडु के राज्यपाल रहे आरएन रवि ने बखूबी किया और इसके लिए अदालतों तक को उन्हें फटकार लगानी पड़ी थी। अब लगता है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यही काम बंगाल में उनसे करवाना चाहते हैं। अगर अगले कुछ दिनों में वे केंद्र के इशारे पर नहीं चल सके तो बंगाल में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है।
नए राज्यपाल की यह होगी चुनौती
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की सुगबुगाहट इसलिए भी तेज हो रही है, क्योंकि राज्य के करीब 60 लाख वोटरों की सुनवाई अभी होनी है। इसी सुनवाई के बाद उनके नाम वोटर लिस्ट में जोड़े जा सकेंगे। बंगाल की आखिरी वोटर लिस्ट 28 फरवरी को प्रकाशित होनी थी, जो सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अभी तक नहीं हो सकी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय चुनाव आयोग को सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट का प्रकाशन करने को कहा है। लेकिन इसके लिए भी आयोग ने कोई अंतिम तारीख नहीं बताई है। ऐसे में बंगाल का विधानसभा चुनाव भी टलता नजर आ रहा है, क्योंकि इस सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट का प्रकाशन हुए बिना बंगाल का चुनाव हो नहीं सकता है।
सात मई को खत्म होगा विधानसभा का कार्यकाल
पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को खत्म हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि राज्य में विधानसभा चुनाव हर हाल में उससे पहले ही हो जाना चाहिए, ताकि सरकार का गठन हो सके। चुनाव की घोषणा और मतदान के बीच अमूमन 3 हफ्ते का समय होता है, जिसमें नामांकन, नाम वापसी और उम्मीदवारों के नाम अतिम रूप से तय किए जाते हैं। उसके बाद चुनाव प्रचार शुरू होता है। इससे पहले यह जानकारी सामने आ रही है कि केंद्रीय चुनाव आयोग राज्य में एक ही चरण में मतदान करवाना चाहता है। लेकिन इसके लिए चुनाव प्रचार के लिए समय चाहिए।
वोटिंग 5 अप्रैल से पहले हो जानी चाहिए
अगर हम बंगाल के पिछले चुनाव की बात करें तो 2021 में राज्य में 8 चरणों में 34 दिन के दरम्यान चुनाव हुआ था। इस आधार पर राज्य में पांच अप्रैल तक वोटिंग शुरू हो जानी चाहिए। इस प्रकार पश्चिम बंगाल में चुनाव का ऐलान 16 मार्च तक हो जाना चाहिए। उससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, राज्य में वोटरों की सप्लीमेंट्री लिस्ट भी प्रकाशित हो जानी चाहिए। अब इस लिस्ट के प्रकाशन की दूर-दूर तक कोई सुगबुगाहट तक नहीं है। ऐसे में अगर बंगाल में चुनाव 7 मई तक नहीं हो पाते हैं तो फिर केंद्र सरकार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का पूरा मौका मिलेगा। अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आरएन रवि को राज्य का नया राज्यपाल बनाकर भावी राष्ट्रपति शासन की राह और आसान कर दी है। बंगाल के तृणमूल कांग्रेस में इसे राज्य में लोकतंत्र की लूट का एक और बहाना माना जा रहा है।
ममता पर ड्रामेबाजी का आरोप
इस बीच, केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने दावा किया है कि ममता बनर्जी को विधानसभा चुनाव के बाद विपक्ष में बैठना पड़ेगा और वे इसीलिए अभी से धरने पर बैठने की प्रैक्टिस कर रही हैं। उन्होंने ममता पर ड्रामेबाजी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि आनंद बोस ने स्वास्थ्यगत कारणों से इस्तीफा दिया है। हालांकि, वे इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाए कि इस तरह का कोई भी कारण बोस ने राष्ट्रपति को भेजे अपने इस्तीफे में नहीं लिखा है। लेकिन, सुकांत परोक्ष रूप से यह कह गए कि राज्य में विधानसभा का चुनाव तब तक नहीं होगा, जब तक हर बाहरी घुसपैठिए को वहां से खदेड़ नहीं दिया जाता। इससे भी यह साफ होता है कि केंद्र सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहती है, क्योंकि वह घुसपैठियों के मुद्दे पर चुनाव नहीं जात पा रही है। इस बीच, केंद्र सरकार ने केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि दिल्ली और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में भी गवर्नर बदले हैं। दिल्ली में पूर्व राजनयिक तरनजीत सिंह संधु को लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाया गया है, जबकि लद्दाख में दिल्ली के पूर्व एलजी वीके सक्सेना को राज्यपाल बनाया गया है।


