मोदी के संसदीय क्षेत्र में सट्टा माफ़िया पंकज आर्या रहा फ़ल-फूल,वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट के आंखों में झोंक रहा धूल

* टी20 विश्व कप 2026 पर सट्टा बाज़ार गरम!*
* हर गेंद पर लग रहा दांव, डिजिटल नेटवर्क बना चुनौती*
* मैच नतीजे से लेकर रन, विकेट और पावरप्ले तक तय हो रहे भाव
* ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और विदेशी सर्वर से संचालित हो रहा कथित नेटवर्क
* युवाओं में तेजी से बढ़ रही सट्टेबाजी की प्रवृत्ति
* प्रशासन के लिए हाई-टेक निगरानी बनी बड़ी परीक्षा

वाराणसी/नई दिल्ली। टी20 विश्व कप 2026 का रोमांच चरम पर है, लेकिन खेल के इस महाकुंभ के साथ सट्टा बाजार भी कथित तौर पर तेज रफ्तार से सक्रिय हो गया है। सूत्रों के अनुसार देश के कई हिस्सों में मैचों के परिणाम ही नहीं, बल्कि हर रन, हर विकेट, हर ओवर और यहां तक कि पावरप्ले तक पर भाव लगाए जा रहे हैं।
बताया जा रहा है कि छोटे दांव 100 से 500 रुपये से शुरू होकर 50,000 और उससे अधिक तक पहुंच रहे हैं। कुछ जानकारों का दावा है कि बड़े मुकाबलों में लाखों और करोड़ों रुपये तक की बाज़ी लग रही है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि जांच का विषय है।
विश्लेषकों के मुताबिक, इस बार सट्टा बाजार का स्वरूप पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। इंटरनेट आधारित प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ग्रुप और विदेशी सर्वर से जुड़े कथित नेटवर्क के जरिये यह कारोबार संचालित हो रहा है। यही वजह है कि निगरानी एजेंसियों के सामने तकनीकी चुनौती बढ़ गई है।
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि जब भविष्यवाणी मनोरंजन से आगे बढ़कर धन के लेन-देन में बदल जाती है, तो खेल की निष्पक्षता और युवाओं की आर्थिक सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।
*पूर्वांचल में सट्टे का साम्राज्य : क्या वाराणसी में कानून से बड़ा हो गया एक नाम ? सट्टा माफिया पंकज आर्या का शान-ओ-शौकत या योगी सरकार को खुली चुनौती : सवालों के घेरे में पूरा तंत्र

वाराणसी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त प्रशासनिक दावों के बीच प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से क्रिकेट के सट्टा कारोबार को लेकर उठ रहे सवाल अब गंभीर रूप ले चुके हैं। सोशल मीडिया पर वायरल तमाम ख़बरों, चित्रों, वीडियो और कथित तौर पर दिखाए जा रहे एक हाई-प्रोफाइल सट्टा माफिया की जीवनशैली के प्रदर्शन ने न केवल युवाओं को आकर्षित किया है, बल्कि पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
आरोप है कि शहर और पूर्वांचल के कई जिलों में क्रिकेट मैचों पर बड़े पैमाने पर सट्टा संचालित किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस नेटवर्क से जुड़े एक नाम पंकज आर्या को लेकर चर्चा तेज है। बताया जाता है कि वह पहले भी सट्टा और बलात्कार सहित अन्य मामलों में जेल जा चुका है।
सोशल मीडिया पर जारी उसके अनेक वीडियो में कथित तौर पर विदेशी यात्राएं, महंगी गाड़ियां, बेशकीमती कपड़े और आलीशान जीवनशैली का प्रदर्शन दिखाया गया है। इन पोस्टों में युवाओं को “रातों-रात जिंदगी बदलने” का संदेश दिए जाने की भी चर्चा है। जांच का विषय यह है कि क्या यह वैभव वैध कारोबार का परिणाम है या सट्टा नेटवर्क की कमाई से जुड़ा है।
*कम समय में अधिक कमाई का लालच*
कम समय में अधिक पैसा कमाने की चाहत में पढ़े-लिखे युवाओं के भी सट्टे के खेल में शामिल होने के आरोप सामने आ रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि हर मैच में लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक का दांव लगवाया जाता है। कुछ जानकारों का दावा है कि सट्टा माफिया के सिंडिकेट से जुड़े करीब 150 बुकी अलग-अलग जिलों में सक्रिय हैं।जो बड़े पैमाने पर इस काले कारोबार की बदौलत कोडीन सीरप की तर्ज पर अकूत दौलत बना रहे हैं।
सवाल यह उठता है कि यदि वाराणसी से बैठकर सट्टा माफिया दर्जनों जिलों में सट्टा का काला कारोबार संचालित कर रहे है, तो स्थानीय पुलिस को इसकी भनक कैसे नहीं लगती? कुछ सूत्र यह भी आरोप लगाते हैं कि सटोरियों तक पुलिस के पहुंचने से पहले ही उन्हें सूचना मिल जाती है। हालांकि यह आरोप भी जांच का विषय है।
*युवाओं की बर्बादी और परिवारों पर असर*
रिपोर्टों के मुताबिक, सट्टेबाजी केवल मैच के नतीजों तक सीमित नहीं है- रन, बाउंड्री, विकेट तक हर गेंद दांव में बदल जाती है। 100 रुपये से लेकर 50,000 रुपये या उससे अधिक तक की रकम लगाई जाती है।
आरोप है कि कई युवा कर्ज में डूब गए हैं, कुछ ने संपत्ति गिरवी रखी, तो कुछ को कथित तौर पर खाली वचन पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े। यह भी कहा जा रहा है कि सामाजिक अपमान और आर्थिक बर्बादी के चलते कुछ लोगों ने आत्महत्या तक का रास्ता चुना। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
*क्या पुलिस की पकड़ कमजोर या नेटवर्क हाईटेक?*
क्रिकेट सट्टा अब कथित तौर पर हाईटेक प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो चुका है। इंटरनेट आधारित प्लेटफॉर्म, विदेशी सर्वर और लगातार बदलते सिमकार्ड के कारण जांच एजेंसियों के सामने तकनीकी चुनौतियां हैं।
हालांकि यह भी आरोप है कि पुलिस की निष्क्रियता या संभावित मौन सहमति के बिना इतना बड़ा नेटवर्क संचालित होना संभव नहीं। पुलिस की ओर से इन आरोपों पर स्पष्ट जवाब सामने आना अभी बाकी है।
*संगठित अपराध की गहराती जड़ें*
सूत्रों का दावा है कि इस नेटवर्क के तार नेपाल, श्रीलंका और दुबई तक जुड़े हो सकते हैं। यह भी आरोप है कि संगठित रूप से यह कारोबार संचालित हो रहा है और विभिन्न स्तरों पर संरक्षण प्राप्त है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
यदि यह सच है, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि संगठित अपराध का संकेत है।
*सबसे बड़ा सवाल*
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में यदि कथित तौर पर इस स्तर का सट्टा कारोबार फल-फूल रहा है, तो यह प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती है। क्या वाराणसी पुलिस इस नेटवर्क का खुलासा कर पाएगी? क्या मुख्यमंत्री के कानून-व्यवस्था के दावों की कसौटी पर यह मामला खरा उतरेगा?
जवाब जांच और पारदर्शी कार्रवाई में छिपा है। फिलहाल, वायरल वैभव और सट्टे के आरोपों ने वाराणसी की साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
*जहर और जुए का गठजोड़ : जब अवैध साम्राज्य सत्ता की साख पर हमला बन जाए*
देश के कई हिस्सों में दो काले कारोबार समानांतर रूप से पनपते दिख रहे हैं- एक, कोडीन युक्त कफ सिरप का अवैध नेटवर्क; दूसरा, क्रिकेट और ऑनलाइन सट्टे का फैला हुआ साम्राज्य। दोनों की प्रकृति अलग दिखती है, लेकिन उनकी जड़ एक ही है – तेजी से पैसा कमाने की अंधी दौड़, संगठित अपराध का ढांचा और समाज की कमजोरियों का निर्मम शोषण।
कोडीन कफ सिरप, जो चिकित्सा के लिए है, कथित तौर पर नशे के अवैध बाजार में खपाया जाता है। जांच एजेंसियों द्वारा हाल में ही उजागर किए गए मामलों में हजारों करोड़ के अवैध लेनदेन, अंतरराज्यीय सप्लाई चैन और फर्जी बिलिंग नेटवर्क सामने आए हैं। यह कारोबार युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलता है, परिवारों को तोड़ता है और अपराध की नई जमीन तैयार करता है।
दूसरी ओर, सट्टा कारोबार – विशेषकर क्रिकेट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से – तेजी से फैलता जा रहा है। कथित तौर पर सैकड़ों बुकी और एजेंटों का नेटवर्क करोड़ों-करोड़ का दांव संचालित करता है। यहां भी लालच वही है “रातों-रात अमीर बनने” का भ्रम। लेकिन परिणाम अक्सर कर्ज, बर्बादी और सामाजिक पतन के रूप में सामने आते हैं।
दोनों नेटवर्क की कार्यशैली में चौंकाने वाली समानताएं हैं।
• संगठित ढांचा: छोटे एजेंटों से लेकर बड़े फाइनेंसर तक।
• तकनीकी इस्तेमाल: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, फर्जी खातों और बदलते सिमकार्ड का जाल।
संभावित संरक्षण के आरोप: समय-समय पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतना बड़ा नेटवर्क संभव नहीं।
यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना पर हमला है। कोडीन का जहर शरीर को खोखला करता है, सट्टा का जहर मानसिक और आर्थिक संतुलन को। एक युवाओं को नशे का गुलाम बनाता है, दूसरा उन्हें कर्ज और निराशा के अंधे कुएं में धकेलता है।सबसे गंभीर प्रश्न सरकार की छवि से जुड़ा है। जब अवैध नेटवर्क हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं, तो आम नागरिक पूछता है -प्रशासन कहां है? क्या निगरानी तंत्र पर्याप्त है? क्या कार्रवाई समय पर हो रही है?
कानून-व्यवस्था केवल अपराध दर्ज करने का नाम नहीं, बल्कि अपराध के इकोसिस्टम को तोड़ने की क्षमता का नाम है। यदि संगठित गिरोह वर्षों तक फलते-फूलते रहें, तो यह शासन की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न है।
यह समय कठोर आत्ममंथन का है। नशे और जुए के इन समानांतर साम्राज्यों को केवल छापेमारी से नहीं, बल्कि आर्थिक ट्रैकिंग, डिजिटल मॉनिटरिंग और सामाजिक जागरूकता के बहुस्तरीय अभियान से तोड़ा जा सकता है।
क्योंकि अंततः यह लड़ाई केवल अवैध धन के खिलाफ नहीं – यह समाज की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। और जो भी इस आत्मा को खोखला करता है, वह केवल कानून का नहीं, राष्ट्र की नैतिक संरचना का भी विरोधी बन जाता है।



