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यूजीसी बिल बना पीएम के गले की फांस,मोदी का होगा अब सत्यानाश

कांग्रेस-मुक्त भारत से सवर्ण-मुक्त भारत तक मोदी सरकार की सामाजिक इंजीनियरिंग और यूजीसी की फांस

* कांग्रेस को कोसते-कोसते वही रास्ता, जिस सामाजिक विनाश का आरोप कांग्रेस पर, वही प्रयोग अब मोदी सरकार में

* यूजीसी बनी बलि का बकरा न सुधार, न समाधान सिर्फ आदेश और दमन

* मेरिट बनाम मैनेजमेंट योग्यता की जगह सत्ता-संरक्षण का खेल

* शिक्षा का केसरियाकरण अकादमिक स्वायत्तता पर वैचारिक पहरा

* सवर्ण असंतोष का विस्फोट चुप्पी अब टूट रही, भरोसा दरक रहा

* संविधान की आड़ में राजनीति चयनात्मक संवैधानिकता

* पीएम के ‘मन की बात’ और जनता का मनोभंग संवाद नहीं निर्देश

* यूजीसी प्रकरण भाजपा के गले की फांस न निगलते बन रहा, न उगलते


कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा लगाते-लगाते कब राजनीति का रुख सवर्ण-मुक्त भारत की ओर मुड़ गया, इसका एहसास तब हुआ जब शिक्षा, नियुक्ति और नीति तीनों मोर्चों पर एक साथ प्रयोग शुरू हुए। वर्षों तक ‘मन की बात’ सुनते रहे, उम्मीद करते रहे कि बात केवल संवाद की है, दिशा सुधार की है। लेकिन अब जो दिख रहा है, वह संवाद नहीं, आदेश है, सुधार नहीं, संहिता है और न्याय नहीं, चयनात्मक न्याय है। कांग्रेस पर सवर्णों के ‘नाश’ का आरोप लगाना आसान रहा है। आरक्षण विस्तार, संस्थागत उपेक्षा, और वैचारिक वर्चस्व के बहाने। पर भाजपा ने जिस तेजी और पैमाने पर सामाजिक इंजीनियरिंग को नीति बना दिया, उसने आलोचना के पैमाने बदल दिए हैं। यहां सवाल आरक्षण का नहीं, प्रक्रिया का है। प्रतिनिधित्व का नहीं, पारदर्शिता का है, और सबसे अहम संस्थागत स्वायत्तता का है। यूजीसी जो विश्वविद्यालयों की अकादमिक आत्मा की संरक्षक मानी जाती थी। आज भाजपा के गले की फांस बन चुकी है। न उसे पूरी तरह निगलना संभव है, न उगलना। एक तरफ केंद्र के फरमान, दूसरी तरफ शिक्षकों-छात्रों का प्रतिरोध, एक तरफ ‘सुधार’ की भाषा, दूसरी तरफ नियमों का केंद्रीकरण। परिणाम अराजकता, असंतोष और अविश्वास। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व निर्णायक कहा गया। लेकिन निर्णायकता और एकाधिकार में फर्क होता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ नीति लागू करना, राज्यों और विश्वविद्यालयों की विविधताओं को नजर अंदाज करना यह सुधार नहीं, सरलीकरण की आड़ में नियंत्रण है। आज सवर्ण समाज के भीतर जो बेचैनी है, वह किसी एक वर्ग के विशेषाधिकार की चिंता नहीं, बल्कि योग्यता, अवसर और संस्थानों की विश्वसनीयता की रक्षा की चिंता है। जब चयन प्रक्रियाएं अपारदर्शी हों, जब नियम बार-बार बदले जाएं, और जब अकादमिक निकायों को राजनीतिक इच्छाशक्ति के अधीन कर दिया जाए तो सवाल उठेंगे। मोदी सरकार को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय का मतलब सामाजिक ध्रुवीकरण नहीं होता। शिक्षा सुधार का अर्थ आदेशात्मक शासन नहीं। यूजीसी विवाद इसी टकराव का प्रतीक है जहां सरकार व देश की शिक्षा फंसी है।

कांग्रेस बनाम भाजपा सवर्ण राजनीति का बदलता चेहरा

कांग्रेस शासनकाल में सवर्ण समाज के भीतर यह धारणा लगातार मजबूत होती गई कि नीति-निर्माण में उसकी भूमिका सीमित की जा रही है। मंडल आयोग, आरक्षण का विस्तार और शैक्षणिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व के पुनर्संतुलन को कांग्रेस ने सामाजिक न्याय के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह रहा कि योग्यता, प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता जैसे प्रश्न हाशिये पर चले गए। भाजपा ने इसी असंतोष को राजनीतिक पूंजी में बदला और ‘मेरिट बनाम तुष्टिकरण’ का नैरेटिव खड़ा किया। लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा उसी ढांचे को और अधिक केंद्रीकृत रूप में लागू करने लगी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब फैसले राजनीतिक लाभ-हानि के आधार पर लिए जाने लगे। सवर्ण समाज, जिसने कांग्रेस के विरोध में भाजपा का साथ दिया था, आज खुद को उसी चक्रव्यूह में फंसा महसूस कर रहा है।

यूजीसी स्वायत्त संस्था से आदेश पालन तंत्र तक

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का गठन उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, स्वायत्तता और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए किया गया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यूजीसी एक नियामक संस्था से अधिक एक आदेशात्मक तंत्र में तब्दील होती दिखी है। नियुक्ति नियम, पीएचडी प्रवेश, प्रोफेसर पदोन्नति, और विश्वविद्यालयों की मान्यता हर स्तर पर केंद्र का दखल बढ़ा है। यूजीसी के नए-नए परिपत्र विश्वविद्यालयों पर थोपे गए, जिन पर न तो व्यापक चर्चा हुई, न राज्यों की सहमति ली गई। परिणामस्वरूप शिक्षा व्यवस्था में अस्थिरता पैदा हुई और अकादमिक समुदाय में गहरा असंतोष फैला।

नियुक्ति और प्रोन्नति में अविश्वास

शिक्षक नियुक्तियों में बार-बार नियम बदलना भाजपा सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जा रहा है। कभी नेट की अनिवार्यता, कभी साक्षात्कार के अंक, तो कभी संविदा और गेस्ट फैकल्टी की व्यवस्था हर बदलाव ने योग्य उम्मीदवारों को अनिश्चितता में डाला। सवर्ण ही नहीं, ओबीसी और अन्य वर्गों के उम्मीदवार भी यह सवाल उठा रहे हैं कि जब प्रक्रिया ही पारदर्शी नहीं होगी, तो सामाजिक न्याय कैसे सुनिश्चित होगा।

शिक्षा का वैचारिक केंद्रीकरण

आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार ने शिक्षा को वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है। इतिहास, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रमों में एक खास वैचारिक झुकाव स्पष्ट दिखाई देता है। विश्वविद्यालयों से असहमति की आवाजें दबाई जा रही हैं और अकादमिक स्वतंत्रता सीमित की जा रही है। यह स्थिति सवर्ण समाज में भी चिंता का कारण है, क्योंकि शिक्षा का यह रूपांतरण योग्यता आधारित प्रतिस्पर्धा को कमजोर करता है।

‘मन की बात’ और संवाद हीनता

पीएम मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम संवाद का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर शिक्षा नीति को लेकर वास्तविक संवाद का अभाव दिखता है। विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्रों से औपचारिक परामर्श के बिना नीतियां लागू की जाती हैं। इससे अविश्वास और प्रतिरोध बढ़ता है। सरकार और उसके समर्थक सवर्ण असंतोष को अक्सर ‘विशेषाधिकार खोने का डर’ बताकर खारिज कर देते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि असंतोष का मूल कारण प्रक्रिया की अपारदर्शिता और संस्थागत अस्थिरता है।

संघीय ढांचा और शिक्षा नीति

शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, इसके बावजूद केंद्र सरकार राज्यों को हाशिये पर रखकर फैसले ले रही है। इससे संघीय ढांचे पर चोट पड़ती है और क्षेत्रीय आवश्यकताओं की अनदेखी होती है। सरकार न तो यूजीसी को पूरी तरह खत्म कर पा रही है और न ही उसे स्वायत्त छोड़ना चाहती है। यही द्वंद्व यूजीसी को भाजपा के लिए राजनीतिक फांस बना रहा है। विरोध, अदालती हस्तक्षेप और अकादमिक असंतोष सब मिलकर सरकार की परेशानी बढ़ा रहे हैं।

राजनीतिक लाभ बनाम शैक्षिक नुकसान

शिक्षा नीति को चुनावी चश्मे से देखने का नुकसान दीर्घकालिक होता है। भाजपा अल्पकालिक सामाजिक समीकरण साधने के चक्कर में उच्च शिक्षा की नींव कमजोर कर रही है। यदि सरकार वास्तव में सुधार चाहती है, तो उसे आदेशात्मक रवैये से बाहर आना होगा। यूजीसी को वास्तविक स्वायत्तता, नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता और वैचारिक तटस्थता ही इस संकट का समाधान है। कांग्रेस-मुक्त भारत के नारे से निकली राजनीति अगर सवर्ण-मुक्त भारत के आरोपों में उलझ गई है, तो आत्ममंथन जरूरी है। यूजीसी विवाद चेतावनी है। सुधार की आड़ में नियंत्रण लोकतंत्र को कमजोर करता है।

* यूजीसी का अत्यधिक केंद्रीकरण असंतोष का मूल।
* शिक्षा में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ा।
* नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव।
* सवर्ण असंतोष को गलत तरीके से पढ़ा गया।
* संवाद की जगह आदेशात्मक शासन।
* संघीय ढांचे की अनदेखी।
* भाजपा के लिए यूजीसी राजनीतिक फांस।

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