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योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ परंपरा के सजीव प्रतीक,सनातन के प्रति काम कर रहे एकदम सटीक

राष्ट्रवाद, आध्यात्मिक शक्ति और जनजागरण की दीर्घ धारा है गोरखनाथ परंपरा

  • योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ परंपरा के सजीव प्रतीक,सनातन के प्रति काम कर रहे एकदम सटीक
  • राष्ट्रवाद, आध्यात्मिक शक्ति और जनजागरण की दीर्घ धारा है गोरखनाथ परंपरा
  • गोरखनाथ मठ को हिंदू चेतना के ऐतिहासिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया
  • महंत दिग्विजयनाथ की भूमिका स्वतंत्रता-पूर्व हिंदू संगठनों में प्रभावशाली बताई गई
  • महंत अवैद्यनाथ द्वारा राम जन्मभूमि आंदोलन को राष्ट्रीय विमर्श बनाने का दावा
  • हिंदू महासभा से दिग्विजयनाथ के संबंध का उल्लेख
  • 22 दिसंबर 1949 को अयोध्या में रामलला प्राकट्य की घटना को ऐतिहासिक मोड़ के रूप में रेखांकित किया
  • मीडिया और वामपंथी इतिहासकारों पर गोरखनाथ मठ की भूमिका को कमतर दिखाने का आरोप
  • राम मंदिर आंदोलन को किसी एक राजनीतिक दल के बजाय दीर्घकालिक धार्मिक-सांस्कृतिक संघर्ष का परिणाम

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित गोरखनाथ मठ लंबे समय से धार्मिक आस्था, सामाजिक प्रभाव और क्षेत्रीय राजनीति का एक प्रमुख केंद्र रहा है। इस मठ की परंपरा को उसके समर्थक केवल एक आध्यात्मिक धारा नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी चेतना के एक स्रोत के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। उनका दावा है कि हिंदुत्व और राम जन्मभूमि आंदोलन जैसे विषयों पर जो राजनीतिक विमर्श आज दिखाई देता है, उसकी पृष्ठभूमि में दशकों का धार्मिक-संगठनात्मक कार्य रहा है, जिसमें गोरखनाथ पीठ की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इतिहास के पन्नों में झांकें तो पता चलता है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में महंत दिग्विजयनाथ का नाम उभरता है, जिन्हें उनके अनुयायी एक प्रभावशाली संन्यासी और संगठनकर्ता के रूप में देखते हैं। 1930 के दशक में उनका हिंदू महासभा से जुड़ाव रहा। उस दौर में देश स्वतंत्रता संग्राम की जटिल परिस्थितियों से गुजर रहा था और विभिन्न विचारधाराएं अपने-अपने तरीके से राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ रही थीं। समर्थकों के अनुसार, दिग्विजयनाथ ने धार्मिक मंच को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के केंद्र में बदला, हालांकि आलोचक इस भूमिका का मूल्यांकन अलग दृष्टिकोण से करते हैं।
1949 में अयोध्या में रामलला की मूर्तियों के प्रकट होने की घटना को उनके अनुयायी एक निर्णायक क्षण के रूप में देखते हैं। इस प्रसंग को लेकर ऐतिहासिक और न्यायिक स्तर पर व्यापक बहसें रही हैं। इसके बाद के दशकों में महंत अवैद्यनाथ ने राम जन्मभूमि आंदोलन को सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक विमर्श के जरिए व्यापक स्तर पर उठाया। 1980 और 1990 के दशक में यह आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया। वर्तमान समय में योगी आदित्यनाथ जो इसी परंपरा से जुड़े हैं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सक्रिय हैं। उनके समर्थक उन्हें गोरखनाथ परंपरा की निरंतरता के रूप में देखते हैं और यह तर्क देते हैं कि यह धारा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव में भी परिलक्षित होती है। हालांकि यह भी तथ्य है कि गोरखनाथ मठ की भूमिका को लेकर इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों में मतभेद रहे हैं। कुछ विद्वान इसे क्षेत्रीय धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र मानते हैं, जबकि अन्य इसे उत्तर भारत की राजनीति में प्रभावशाली संस्थान के रूप में देखते हैं। मीडिया कवरेज और इतिहास-लेखन में किस पक्ष को कितना महत्व मिला, यह भी बहस का विषय है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और परंपरा

गोरखनाथ मठ की स्थापना और नाथ परंपरा का संबंध मध्यकालीन संत परंपरा से जोड़ा जाता है। यह परंपरा योग, तप और सामाजिक प्रभाव के लिए जानी जाती रही है। पूर्वांचल और नेपाल क्षेत्र में इसका व्यापक अनुयायी वर्ग रहा।

दिग्विजयनाथ का दौर

महंत दिग्विजयनाथ का कार्यकाल राजनीतिक सक्रियता के लिए उल्लेखनीय माना जाता है। हिंदू महासभा से जुड़ाव और स्वतंत्रता-पूर्व आंदोलनों में उनकी भागीदारी पर अलग-अलग ऐतिहासिक मत उपलब्ध हैं। समर्थकों का दावा है कि उन्होंने धार्मिक मंच को संगठित शक्ति में बदला।

1949 की अयोध्या घटना

22 दिसंबर 1949 को अयोध्या में रामलला की मूर्तियों के प्रकट होने की घटना भारतीय राजनीति का अहम अध्याय बनी। इस पर न्यायिक विवाद दशकों चला और अंततः सुप्रीम कोर्ट के फैसले (2019) के बाद मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकरण में विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों की भूमिका पर इतिहासकारों में मतभेद हैं।

अवैद्यनाथ और जनांदोलन

1980-90 के दशक में महंत अवैद्यनाथ ने राम जन्मभूमि आंदोलन को सार्वजनिक रैलियों और राजनीतिक मंचों के माध्यम से आगे बढ़ाया। इस दौरान आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बना।

योगी आदित्यनाथ का उदय

योगी आदित्यनाथ, जो गोरखनाथ पीठ के वर्तमान प्रमुख भी हैं, 2017 से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। उनके शासनकाल में कानून-व्यवस्था, धार्मिक स्थलों के विकास और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर कई पहलें हुईं। समर्थक इसे परंपरा का विस्तार मानते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक रणनीति बताते हैं।

मीडिया और इतिहास-लेखन पर बहस

कुछ विचारधारात्मक समूहों का आरोप है कि गोरखनाथ मठ की भूमिका को मुख्यधारा इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। वहीं, इतिहासकार तर्क देते हैं कि किसी भी संस्था की भूमिका का मूल्यांकन दस्तावेजी प्रमाण और व्यापक संदर्भ में होना चाहिए।

समकालीन राजनीति और भविष्य

गोरखनाथ परंपरा आज भी पूर्वांचल की राजनीति में प्रभावशाली मानी जाती है। योगी आदित्यनाथ को लेकर समर्थकों के दावे और विपक्ष की आलोचनाएं, दोनों ही भारतीय लोकतंत्र की बहस का हिस्सा है। गोरखनाथ मठ की ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को लेकर समर्थक और आलोचक दोनों पक्ष मौजूद हैं। यह निर्विवाद है कि इस पीठ ने पूर्वांचल की धार्मिक-सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। परंतु इतिहास का संतुलित मूल्यांकन तथ्यों, दस्तावेजों और बहु-दृष्टिकोणों के आधार पर ही संभव है।   

* पूर्वांचल में सदियों से सक्रिय यह पीठ केवल आध्यात्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का प्रमुख स्रोत रही है।
* योग और तप की परंपरा से जुड़ा मठ बीसवीं सदी में संगठित हिंदू चेतना के मंच के रूप में उभरा।
* 1930 के दशक में हिंदू महासभा से जुड़ाव, समर्थकों के अनुसार धार्मिक-सामाजिक संगठन को राजनीतिक दिशा देने का प्रयास।
* 22 दिसंबर 1949 को राम लला की मूर्तियों के प्रकट होने की घटना को समर्थक निर्णायक मोड़ मानते हैं, इस पर दशकों तक न्यायिक विवाद चला।
* राम जन्मभूमि मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित करने में सक्रिय भूमिका का दावा।
* आंदोलन में विभिन्न धार्मिक संगठनों, राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों की भागीदारी रही, इसे किसी एक संस्था तक सीमित नहीं माना जा सकता।
* योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ पीठ से जुड़े होने के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव।
* समर्थकों का आरोप कि मठ की भूमिका कम आंकी गई, इतिहासकार दस्तावेजी प्रमाण और व्यापक संदर्भ की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
* गोरखनाथ परंपरा आज भी गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों का महत्वपूर्ण कारक है।

समकालीन विमर्श और भविष्य की दिशा

धार्मिक परंपरा, राजनीति और राष्ट्रवाद के अंतर्संबंध पर जारी बहस भारतीय लोकतंत्र के व्यापक विमर्श का हिस्सा बनी हुई है।

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