योगी बनाम चौधरी में टकराव की आहट,2027 में बीजेपी के लिये बनेगी बड़ी आफत

* ‘डबल इंजन’ में डबल क्लच या 2027 की उलटी गिनती?
* प्रदेश अध्यक्ष के फेसबुक पोस्ट से उठा सियासी धुआं
* बजट सत्र की शुभकामना में मुख्यमंत्री का नाम नदारद
* ‘योगी ही उपयोगी’ बनाम संगठन की नई धुरी
* गुजरात धड़े की रणनीति या यूपी की अंतर्कलह?
* अनुशासन की दुहाई और लोक शिष्टाचार पर बहस
* 2027 की राह में भाजपा का आंतरिक समीकरण
* कार्यकर्ताओं में फुसफुसाहट, दूरी बढ़ी तो मंजिल दूर?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी-कभी शब्दों की अनुपस्थिति, शब्दों की मौजूदगी से ज्यादा बोलती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र 2026–27 के शुभारंभ पर प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी का सोशल मीडिया संदेश आया।विकास, समृद्धि, डबल इंजन और प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन की बात हुई, पर जिनके नेतृत्व में यह बजट दसवीं बार पेश होने जा रहा है, उस मुख्यमंत्री का नाम गायब था। राजनीति में यह ‘टाइपो’ नहीं, ‘टाइप’ होता है।और यही टाइप 2027 की पटकथा लिख सकता है। भाजपा की कहानी ‘डबल इंजन’ की रही है। एक इंजन दिल्ली में, एक लखनऊ में। दिल्ली वाले इंजन का नाम नरेंद्र मोदी है जिन्होंने 2022 में कहा था कि यूपी के लिए योगी ही उपयोगी। लखनऊ वाले इंजन का नाम योगी आदित्यनाथ है जो लगातार कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व के ब्रांड पर पार्टी के ‘पोस्टर-फेस’ बने रहे। ऐसे में अगर प्रदेश अध्यक्ष के औपचारिक संदेश में मुख्यमंत्री का नाम न हो, तो सवाल उठना लाजिमी है। यह महज चूक है या संकेत? भाजपा के अंदर अनुशासन की परंपरा की दुहाई दी जाती है। हाल में मंच पर दो वरिष्ठ नेताओं की आपसी बातचीत को ‘गैर-अनुशासन’ कहने वाले अध्यक्ष का अपना संदेश जब शिष्टाचार की कसौटी पर कसता है, तो कार्यकर्ताओं की कानाफूसी तेज हो जाती है। क्या यह संगठन की नई धुरी है, जो सरकार से दूरी बनाकर अपनी रेखा खींचना चाहती है? या फिर यह वही पुराना ‘फूट डालो-राज करो’ वाला अध्याय है, जिसका आरोप पार्टी के भीतर ही फुसफुसाहट में लगाया जा रहा है?
राजनीति में दूरी कभी अचानक नहीं बढ़ती; वह धीरे-धीरे शब्दों के बीच उगती है। और जब बजट जैसा संवैधानिक पर्व आए, तब नाम का छूट जाना, सिर्फ नाम का छूट जाना नहीं होता। 2027 की आहट अभी से सुनाई देने लगी है कि ‘डबल इंजन’ में कहीं डबल क्लच तो नहीं लग रहा?

पोस्ट, प्रतिक्रिया और परछाईं
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का संदेश आया बजट सत्र 2026-27 राज्य की प्रगति के नए द्वार खोलेगा, 11 फरवरी को बजट पेश होगा, ‘डबल इंजन’ यूपी को ग्रोथ इंजन बनाएगा। संदेश में प्रधानमंत्री का उल्लेख था, पर मुख्यमंत्री का नहीं। भाजपा के कार्यकर्ता समूहों में यही चर्चा रही कि क्या यह सिर्फ औपचारिकता थी या राजनीतिक संकेत? यूपी में योगी आदित्यनाथ 2017 से सत्ता में हैं और 2022 में दोबारा जनादेश लेकर लौटे। यह उपलब्धि भाजपा के लिए ऐतिहासिक रही लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत। पार्टी के भीतर योगी की छवि कानून-व्यवस्था, सख्त प्रशासन और हिंदुत्व की स्पष्ट रेखा के कारण ‘मांग वाले’ मुख्यमंत्री की रही है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के संदेश में नाम का न होना, कई कार्यकर्ताओं को खटका।
संगठन बनाम सरकार: पुराना द्वंद्व
भाजपा में संगठन और सरकार दो अलग धुरी मानी जाती हैं, पर दोनों की तालमेल ही चुनावी मशीनरी को धार देती है। 2027 की तैयारी अभी से शुरू मानी जा रही है। संगठन का काम बूथ-मैनेजमेंट, विस्तार और असंतोष का प्रबंधन, सरकार का काम डिलीवरी, विकास और कानून-व्यवस्था। जब संगठन का शीर्ष नेतृत्व सरकार से दूरी का संकेत दे, तो कार्यकर्ताओं में संदेश जाता है कि समीकरण बदल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की ताकत ‘सिंक’ में रही है दिल्ली और लखनऊ की रेखा एक। अगर यह रेखा दो दिखे, तो विपक्ष के लिए अवसर बनता है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले से ‘अंदरूनी खींचतान’ का नैरेटिव गढ़ते रहे हैं।
‘योगी ही उपयोगी’ और नैरेटिव की ताकत
2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से कहा था कि यूपी के लिए योगी ही उपयोगी। यह वाक्य सिर्फ प्रशंसा नहीं, चुनावी रणनीति का केंद्र बना। भाजपा ने योगी को चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा और जीता। अब अगर संगठन का संदेश मुख्यमंत्री के उल्लेख के बिना जाता है, तो विपक्ष इसे ‘संदेश’ मानकर उछाल सकता है। राजनीति में नैरेटिव ही असली पूंजी है। भाजपा ने कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व पर जो कथा रची, उसमें योगी केंद्रीय पात्र रहे। संगठन की नई टीम अगर अपनी अलग छवि बनाना चाहती है, तो उसे यह तय करना होगा कि वह योगी की छवि के साथ चलेगी या समानांतर।
अनुशासन की कसौटी
कानपुर क्षेत्र के एक कार्यक्रम में मंच पर बातचीत को ‘गैर-अनुशासन’ कहने वाले प्रदेश अध्यक्ष से।कार्यकर्ताओं की अपेक्षा थी कि शिष्टाचार की औपचारिकताओं में सरकार और मुख्यमंत्री का नाम आए। यह अपेक्षा सिर्फ व्यक्ति-पूजा नहीं, राजनीतिक शिष्टाचार की समझ है। भाजपा में संदेश का वजन बहुत होता है कौन-सा नाम पहले, कौन-सा बाद में।
गुजरात धड़ा और रणनीति की चर्चा
भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में गुजरात की पृष्ठभूमि वाले नेताओं का प्रभाव सर्वविदित है। पार्टी के भीतर यह फुसफुसाहट रहती है कि राज्यों में नेतृत्व-परिवर्तन और संगठन-सरकार के संतुलन की रणनीति केंद्र से तय होती है। हालांकि इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं, पर कार्यकर्ताओं में चर्चा है कि 2027 से पहले संगठन की पकड़ मजबूत करने का प्रयास हो रहा है।
दसवां बजट और रिकॉर्ड
योगी आदित्यनाथ ने लगातार दसवीं बार बजट पेश किया जो अपने आप में रिकॉर्ड है। बजट सत्र सरकार की उपलब्धियों का मंच होता है। ऐसे समय में संगठन की ओर से शुभकामना में मुख्यमंत्री का उल्लेख न होना, राजनीतिक रूप से असहजता पैदा करता है।
इतिहास से सबक
पूर्व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का उदाहरण दिया जाता है उन्होंने प्रदेश राजनीति में संगठन-सरकार विवाद से दूरी रखी और राष्ट्रीय क्षितिज पर पहुंचे। भाजपा में कई प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद गुमनामी में चले गए, क्योंकि वे संगठन-सरकार संतुलन साध नहीं पाए। 2027 में यूपी का चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा। विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, किसान और सामाजिक समीकरणों पर हमला करेगा। ऐसे में अगर अंदरूनी मतभेद की तस्वीर बने, तो यह विपक्ष के लिए ऑक्सीजन होगी।
कार्यकर्ताओं का मनोविज्ञान
भाजपा की रीढ़ कार्यकर्ता हैं। वे संकेतों से संदेश पढ़ते हैं। अगर उन्हें लगे कि संगठन और सरकार में दूरी है, तो बूथ-स्तर पर ऊर्जा प्रभावित होती है। राजनीति में मनोबल ही असली पूंजी है।
डबल इंजन या डबल क्लच?
भाजपा ने यूपी में जो मॉडल बनाया, वह संगठन-सरकार की एकरूपता पर टिका है। अगर यह एकरूपता बनी रहती है, तो 2027 में पार्टी मजबूत रहेगी। पर यदि संदेशों में ही दूरी दिखे, तो ‘डबल इंजन’ में ‘डबल क्लच’ लग सकता है। अंततः यह नेतृत्व पर निर्भर है कि वह संकेतों को स्पष्ट करे क्या यह महज संयोग था या रणनीति? 2027 दूर नहीं। राजनीति में नाम का छूटना भी इतिहास लिख देता है।
* प्रदेश अध्यक्ष के संदेश में मुख्यमंत्री का उल्लेख न होना चर्चा का विषय।
* ‘डबल इंजन’ नैरेटिव में संभावित दरार पर विपक्ष की नजर।
* संगठन-सरकार संतुलन 2027 की कुंजी।
* कार्यकर्ताओं के मनोबल पर संकेतों का असर।
* नेतृत्व को स्पष्ट संदेश देकर भ्रम दूर करना होगा।



