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सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज हाईकोर्ट के 510 मामलों में दिए गए जमानत पर उठाए सवाल,देश की न्यायिक व्यवस्था बनी जी का जंजाल

वाह रे इलाहाबाद हाईकोर्ट: दहेज हत्या के 510 मामलों में जज ने कॉपी-पेस्ट कर आरोपियों को जमानत दे दी, सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज की, अब जस्टिस बन गए माफीवीर, बाकी मामलों का क्या?

* 510 में से 508 मामलों में जज ने आरोपियों को दी जमानत
* कहा- ऐसे कोई सबूत नहीं, जिनमें दहेज उत्पीड़न साबित होता हो
* दहेज उन्मूलन के सभी नियम-कानूनो को ताक पर रख दिया
* फिर सुप्रीम कोर्ट से जज से की अपील- कहा: मुझे जमानत रोस्टर से मुक्त करें

नई दिल्ली/प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जिस जज को सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर खुद ही चुना, अब उसी जज की भर्त्सना देश की सबसे ऊंची अदालत को करनी पड़ रही है। यह वाकया है इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया का, जिन्होंने बीते साल अक्तूबर से दिसंबर के महीने में दहेज हत्या के 510 मामलों में 508 को जमानत दे दी। उसके बाद दहेज हत्या की शिकार हुईं दो महिलाओं के परिजनों ने मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया। सु्प्रीम कोर्ट ने दोनों मामलों में जमानत को खारिज करते हुए कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज का इन मामलों में जमानत देना बहुत ही चौंकाने वाला और निराशाजनक है। इसके कुछ ही दिन के बाद जस्टिस भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखकर उनसे अनुरोध किया कि उन्हें दहेज हत्या के मामलों में जमानत के रोस्टर पर नहीं बिठाया जाए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने बिना लाग लपेट के कहा कि जज के इस आग्रह से कोर्ट का मनोबल गिरा है और इसका गंभीर दुष्प्रभाव जज पर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट पर उठे गंभीर सवाल

जस्टिस पंकज भाटिया ने जिन 510 मामलों पर आरोपियों को जमानत दी, वे सभी आईपीसी की धारा 304 बी के तहत थे, जो कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 के तहत आते हैं। यह दहेज हत्या का मामला है। इनके साथ दहेज उन्मूलन कानून की धारा 3 और 4 भी लगी हुई थी। इन सभी मामलों की शिकार महिलाओं के शादी की औसत आयु 3.5 महीने से 4 साल के बीच थी। 510 मामलों में आरोपियों के रूप में 362 आरोपी महिला के पति, 68 सास, 63 ससुर और बाकी नंद और अन्य रिश्तेदार शामिल थे। छह मामलों में दहेज हत्या की शिकार होने से पहले महिलाएं गर्भवती थीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, 340 मामलों में महिलाओं को फंदे पर लटकाकर, 27 में जहर देकर, 16 का गला दबाकर और 11 को सिर पर मारकर हत्या कर दी गई। इन 510 मामलों में 356 को एक साल से कम अवधि के लिए कस्टडी में भेजा गया, 104 को तीन महीने, 142 को छह माह और 105 को उक साल के लिए जेल भेजा गया। पांच को एक महीने से कम समय के लिए जेल भेजा गया था। हैरत की बात यह है कि जस्टिस पंकज भाटिया ने इन सभी गलत फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखकर कहा कि अब उन्हें दहेज हत्या के मामलों में जमानत रोस्टर में नहीं बिठाया जाए। इसके कुछ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि जज की इस अपील ने कोर्ट का मनोबल गिराया है और जज पर इसका गंभर दुष्परिणाम पड़ेगा। जस्टिस भाटिया ने अपने आदेश में कहा कि सभी साक्ष्यों और पुलिस की डायरी को देखकर उन्हें पीड़िताओं की मौत से पहले दहेज उत्पीड़न का कोई मामला नहीं दिखा। ऐसे में आरोपियों के खिलाफ उनके आदेश के अनुसार कोई खास आरोप नहीं बनता। एक फैसले में तो उन्होंने यहां तक लिख दिया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट को देखकर उन्हें आरोपी के खिलाफ कोई भी अपराध नजर नहीं आया। पीड़िता को उसकी मौत से पहले दहेज उत्पीड़न जैसा कोई मामला नहीं बनता और चूंकि आरोपी का इससे पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, इसलिए उसे जमानत न देने का कोई कारण नहीं है। जस्टिस भाटिया ने सभी मामलों में जिन आरोपियों को जमानत दी, उन सभी के कारण एक जैसे थे। उन्होंने सभी को 20 हजार रुपए के दो निजी मुचलकों के साथ जमानत दे दी।

जज ने इन नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया

दहेज हत्या के मामलों में अगर कोई महिला अपनी शादी के 7 साल के भीतर अप्राकृतिक रूप से मृत्यु का शिकार हो जाती है और उसकी मौत के पीछे दहेज उत्पीड़ने के कुछ प्राकृतिक आधार हों तो वह एक संगीन जुर्म बन जाता है। ऐसे में कोर्ट को महिला के ससुराल वालों पर पहला शक जाता है और फिर आरोपियों को अपने बचाव में सबूत पेश करने के लिए केस का ट्रायल चलता है। लेकिन जस्टिस भाटिया ने इन सभी नियम-कानूनों को अनदेखा किया और आरोपियों को जमानत दे दी।

यहां फंस गया पेंच

लेकिन सुषमा देवी (28) के मामले में पेंच फंस गया। उनकी शादी के केवल दो माह बाद ही उनका शव मायके के बरामदे पर पाया गया। उनके पिता का कहना है कि उन्होंने शादी के समय बेटी को 3.5 लाख रुपए का दहेज दिया था। फिर लड़के वालों ने कार की फरमाइश कर दी। सेशंस कोर्ट से मामले में आरोपियों की जमानत रद्दा हो गई थी। कोर्ट ने कहा था कि चूंकि सुषमा देवी की मौत गला दबाकर हत्या करने से हुई है, इसलिए आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट से जमानत होने के बाद जब परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में आदेश को चुनौती दी तो कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश खारिज करते हुए कहा कि जस्टिस भाटिया का आदेश उन्हें समझ नहीं आया कि वह कहना क्या चाहते हैं। कोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट को अपराध की प्रकृति का परीक्षण करना चाहिए था, साथ आरोपी और पीड़िता के बीच के संबंध को भी देखना चाहिए था। कोर्ट के सामने पोस्टमार्टम रिपोर्ट थी। फरवरी में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश में आरोपी को सरेंडर करने के लिए कहा गया है।

आखिर कॉलेजियम ऐसे जज बनाता ही क्यों है

अब आखिर में सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे जजों को हाईकोर्ट जैसी अदालतों में बिठाता ही क्यों है, जो कॉपी-पेस्ट कर अपने आदेश देते हैं। क्या कॉलेजियम जज का पिछला रिकॉर्ड नहीं देखता ? और आखिर में यह भी सवाल उठता है कि अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया है कि जस्टिस भाटिया ने दहेज हत्या के 510 मामलों में आरोपियों को जमानत दे दी है तो केवल एक-दो केस में इंसाफ कर बाकी के 508 मामलों में कोर्ट की नाइंसाफी के बावजूद आरोपी जज पर कोई एक्शन लिया जाएगा। कायदे से ऐसे जज को अदालती प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाना चाहिए, लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में ऐसा करने की हिम्मत है?

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