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सौ रुपये का गेहूं और आधी सदी का न्याय ‘अन्याय”,जज लोग भी गए सठियाय सौ रुपये की चोरी, 45 साल की पेशी किसका मजाक है

* फरार था या व्यवस्था फरार थी?

* न्याय में देरी नहीं, न्याय की हत्या

* गरीब के लिए तारीख़ पर तारीख़, अमीर के लिए तुरंत राहत*

* बीएनएसएस आया, पर पुराने जख्म जस के तस

* समरी ट्रायल किताबों में, अदालतों में स्लो मोशन

* प्ली-बार्गेनिंग पर बहस, पर पीड़ित अब भी खाली हाथ

* न्यायपालिका या पेशी-पालिका? फैसला कौन करेगा?

मध्यप्रदेश। खरगोन में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हुई है। 45 साल पहले सौ रुपये का गेहूं चुराने का आरोपी आखिरकार गिरफ्तार हो गया। देश की पुलिस और न्याय व्यवस्था ने साबित कर दिया कि चाहे अपराध कितना भी छोटा क्यों न हो अगर आप गरीब हैं तो कानून आपको ढूंढ ही लेगा। भले ही इसमें आधी सदी लग जाए।
1980 में 20 साल का युवक, अब 65 साल का बूढ़ा, और अपराध? सौ रुपये का गेहूं। आज के हिसाब से यह रकम शायद एक परिवार की दो दिन की सब्जी भी न खरीद पाए। लेकिन न्याय का पहिया इतना धीरे घूमता है कि गेहूं की फसलें कई बार बोई और काटी जा चुकीं, सरकारें बदलीं, कानून बदले, संविधान में संशोधन हुए, मगर अदालत की फाइल वहीं की वहीं रही धूल खाती हुई। समाचार की भाषा कहती है कि आरोपी 45 साल से फरार था और 90 किलोमीटर दूर छिपा हुआ था, मानो कोई अंतरराष्ट्रीय आतंकी हो। जैसे वह हिटलर की सेना का कोई जनरल रहा हो, जो युद्ध अपराध के बाद भूमिगत हो गया हो। सच यह है कि भारत में छोटे मामलों में फरार कम, व्यवस्था ज्यादा फरार रहती है।
यह कोई अकेली कहानी नहीं है। हाल ही में गुजरात में 20 रुपये रिश्वत लेने के आरोप में फंसे एक सिपाही को 28 साल बाद बरी किया गया। फैसला आया, आदमी ने कहा मैं निर्दोष था और अगले ही दिन उसकी मौत हो गई। क्या यह न्याय था? या यह भी एक तरह की धीमी हत्या थी? भारत में अदालतों पर मुकदमों का बोझ किसी हिमालय से कम नहीं है। जिला अदालतों में तारीख पर तारीख की परंपरा अब संस्कृति बन चुकी है। आरोपी पेशी में बूढ़ा हो जाता है, गवाह मर जाता है, शिकायतकर्ता समझौता कर लेता है, और जज ट्रांसफर हो जाते हैं। लेकिन फाइल चलती रहती है कभी रेंगते हुए, कभी ठिठक कर। 2023 में लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने वादा किया कि तीन साल तक की सजा वाले मामलों में समरी ट्रायल होगा। यानी तेज सुनवाई, कम बहस, सीमित अपील। सुनने में अच्छा लगता है। पर सवाल यह है क्या यह सुविधा उन 45 साल पुराने मामलों को मिलेगी या वे अपनी किस्मत पर रोते रहेंगे।
दुनिया के कई देशों में अदालत के बाहर समझौते का प्रावधान है। अमेरिका में प्ली-बार्गेनिंग आम है। खाड़ी देशों में ब्लड-मनी का सिस्टम है। भारत में भी छोटे मामलों में समझौते की बात हो रही है। लेकिन हमारी अदालतें अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रही हैं। न्याय सिर्फ सजा देना है या पीड़ित को राहत देना भी है? अगर सौ रुपये के गेहूं की चोरी पर 45 साल बाद गिरफ्तारी होती है, तो यह न्याय की जीत नहीं, न्याय की पराजय है।

45 साल बाद गिरफ्तारी उपलब्धि या विडंबना?

मध्यप्रदेश के खरगोन जिले की घटना ने न्याय व्यवस्था की पोल खोल दी है। 1980 में दर्ज एक मामूली चोरी के मामले में आरोपी की 2025-26 में गिरफ्तारी यह उपलब्धि कम और विडंबना ज्यादा है। सवाल यह नहीं कि गिरफ्तारी क्यों हुई, सवाल यह है कि इतने साल मामला लटका क्यों रहा?

‘फरार’ का खेल

कानूनी भाषा में आरोपी ‘फरार वारंटी’ था। लेकिन क्या वास्तव में वह 45 साल तक भूमिगत रहा? या फिर पुलिस-प्रशासन की फाइलें ही सोती रहीं? भारत में हजारों वारंट वर्षों तक निष्पादित नहीं होते। जब कभी समीक्षा होती है, तो अचानक पुरानी फाइलें खुलती हैं।

अदालतों पर मुकदमों का पहाड़

देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। जिला अदालतों में छोटे-छोटे आपराधिक मुकदमे वर्षों तक खिंचते हैं। तारीख़ बढ़ाने की संस्कृति ने न्याय को प्रक्रिया में बदल दिया है। न्याय एक परिणाम होना चाहिए, पर यहां वह एक अंतहीन यात्रा है।

बीएनएसएस और समरी ट्रायल उम्मीद या भ्रम

2023 में लागू नई प्रक्रिया ने छोटे मामलों के लिए समरी ट्रायल का प्रावधान किया है। इससे भविष्य के मामलों में राहत मिल सकती है। पर पुराने मामलों का क्या? वे नई व्यवस्था के दायरे में नहीं आते। यानी 25-50 साल पुराने मामूली मुकदमे अभी भी अदालतों में लटके रहेंगे।

समझौते की संस्कृति और पीड़ित का अधिकार

दुनिया के कई देशों में अदालत के बाहर समझौते होते हैं। भारत में भी छोटे अपराधों में समझौते की अनुमति है। लेकिन यह प्रक्रिया अब भी सीमित और जटिल है। अगर किसी गरीब परिवार को मुआवजा मिल सके, तो यह सिर्फ सजा से बेहतर विकल्प हो सकता है।

प्ली-बार्गेनिंग भारतीय संदर्भ में संभावना

अमेरिका में प्ली-बार्गेनिंग से अदालतों का बोझ घटा है। भारत में भी इसका प्रावधान है, पर उपयोग कम होता है। कारण सामाजिक अविश्वास और कानूनी जटिलता। अगर इसे पारदर्शी बनाया जाए, तो छोटे मामलों में तेजी लाई जा सकती है।

न्यायपालिका बनाम ‘अन्यायपालिका’

जब एक व्यक्ति 45 साल तक एक मामूली मामले में आरोपी बना रहता है, तो यह सिर्फ उसकी नहीं, व्यवस्था की विफलता है। अदालतें अगर समय पर फैसला न दें, तो वे न्यायपालिका नहीं, ‘अन्यायपालिका’ बन जाती हैं। पुराने छोटे मामलों की विशेष समीक्षा, समरी ट्रायल का आक्रामक क्रियान्वयन, प्ली-बार्गेनिंग को पारदर्शी बनाना, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना, डिजिटल प्रक्रिया को अनिवार्य करना जरूरी है। सौ रुपये के गेहूं की चोरी पर 45 साल बाद गिरफ्तारी यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था का आईना है। अगर अदालतें छोटे मामलों में भी समय पर फैसला नहीं दे पातीं, तो जनता का भरोसा कैसे बचेगा? नए कानून स्वागत योग्य है, पर पुराने जख्मों का इलाज भी जरूरी है। जब तक अदालतें तारीखों के जंगल से बाहर नहीं निकलेंगी, तब तक न्यायपालिका पर ‘अन्यायपालिका’ का व्यंग्य चलता रहेगा।

* 1980 की सौ रुपये गेहूं चोरी का मामला, 45 साल बाद गिरफ्तारी
* छोटे मामलों में वर्षों की देरी, न्याय व्यवस्था पर सवाल
* 2023 के नए कानून से भविष्य में राहत की उम्मीद
* पुराने मामलों के समाधान पर कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं
* प्ली-बार्गेनिंग और समझौते की संस्कृति पर बहस
* अदालतों में तारीख़ संस्कृति से आम जनता त्रस्त

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