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अमेरिका का ग्रीनलैंड पर कब्जे का प्रयास,समूचे विश्व को युद्ध मे झोंकने का प्रबल कयास

ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे युद्ध का बारूद, अमेरिका की विस्तारवादी भूख, रूस-चीन का पलटवार और तीसरे विश्वयुद्ध की आहट

● अमेरिका का ग्रीनलैंड पर कब्जे का प्रयास,समूचे विश्व को युद्ध मे झोंकने का प्रबल कयास

● ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे युद्ध का बारूद

● अमेरिका की विस्तारवादी भूख, रूस-चीन का पलटवार और तीसरे विश्वयुद्ध की आहट

● शांति का मुखौटा, भीतर युद्ध की तैयारी

● ग्रीनलैंड में मिसाइल शील्ड और परमाणु निगरानी से दुनिया युद्ध की ओर

● सहयोगी देशों की संप्रभुता कुचलकर ग्रीनलैंड पर कब्जे की तैयारी नाटो संधि की खुली अवहेलना

● 1968 के रेडियोधर्मी हादसे की भयावहता के बावजूद अमेरिका फिर उसी आग से खेलने को तैयार

● बर्फीले महासागर को सामरिक अखाड़ा बनाकर वैश्विक पर्यावरण और मानवता दोनों को खतरे में डालने की तैयारी

● अमेरिकी वर्चस्व की जिद दुनिया को बहुध्रुवीय यथार्थ से टकराने पर कर रहा मजबूर

● आर्कटिक समुद्री रास्तों पर नियंत्रण के नाम पर वैश्विक व्यापार को बनाया हथियार

● हथियारों की तैनाती और सैन्य दबाव से यूरोपीय देशों की राजनीतिक स्वतंत्रता पर हमला

● तीसरे विश्वयुद्ध की खामोश तैयारी, ग्रीनलैंड को मोहरा बनाकर अमेरिका रख रहा जंग की नींव

 

सौमित्र रॉय

नई दिल्ली। दुनिया के नक्शे पर ग्रीनलैंड एक ऐसा नाम है, जिसे अब तक आम तौर पर बर्फ, वीरानी और प्राकृतिक सौंदर्य से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि यही बर्फीला द्वीप आने वाले समय में वैश्विक तबाही का सबसे खतरनाक केंद्र बन सकता है। अमेरिका जिस बेचैनी के साथ ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए बैठा है, वह केवल रणनीतिक चिंता नहीं, बल्कि उसकी उस पुरानी साम्राज्यवादी मानसिकता का विस्तार है, जिसमें हर उस भूभाग पर कब्जा जरूरी हो जाता है, जहां से दुनिया पर निगरानी और नियंत्रण संभव हो।
ग्रीनलैंड के नाम में ‘ग्रीन’ भले ही हो, लेकिन यहां की जमीन दस महीने बर्फ से ढकी रहती है, तापमान जानलेवा है और इंसानी आबादी गिनी-चुनी है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका इस वीरान द्वीप में क्यों दिलचस्पी ले रहा है, बल्कि सवाल यह है कि अमेरिका यहां आकर क्या छीनना और क्या नष्ट करना चाहता है। जवाब साफ है रूस और चीन की संयुक्त सामरिक बढ़त। आज की दुनिया में युद्ध सिर्फ जमीन पर नहीं लड़े जाते, वे मिसाइल ट्रैजेक्टरी, उपग्रह निगरानी, समुद्री मार्गों और परमाणु संतुलन के जरिए लड़े जाते हैं। ग्रीनलैंड इन चारों का केंद्र है। यही कारण है कि अमेरिका इसे तीसरे विश्वयुद्ध का संभावित थिएटर मानता है। पेंटागन के रणनीतिक दस्तावेजों में ग्रीनलैंड को रूस-चीन गठजोड़ की नस कहा गया है, जिसे काटना अमेरिका के लिए जरूरी बताया जा रहा है। अमेरिका यह अच्छी तरह जानता है कि रूस की अंतरमहाद्वीपीय परमाणु मिसाइलों का सबसे छोटा और प्रभावी रास्ता ग्रीनलैंड के ऊपर से होकर गुजरता है। रूस का कोला प्रायद्वीप जो फिनलैंड के पास स्थित है। आज दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु हथियार भंडार बन चुका है। यहीं से रूस की मिसाइलें, परमाणु पनडुब्बियां और लंबी दूरी के बमवर्षक ऑपरेट करते हैं। इन मिसाइलों की उड़ान रेखा सीधे ग्रीनलैंड के ऊपर से अमेरिका के 48 राज्यों तक जाती है। यही नहीं आर्कटिक महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और उसकी रहस्यमय परमाणु पनडुब्बियां अमेरिका की नींद उड़ाए हुए हैं। चीन और रूस मिलकर उस समुद्री मार्ग को मजबूत कर रहे हैं, जो यूरोप को एशिया से सबसे कम समय में जोड़ता है, और जिस पर अमेरिका की कोई सीधी निगरानी नहीं है। यह वही रास्ता है, जिसे अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा कर बंद करना चाहता है। अमेरिका की मंशा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक भी है। चीन को यूरोप से अलग करना, रूस को आर्कटिक में घेरना और नाटो देशों को डराकर अपनी शर्तों पर चलाना ग्रीनलैंड इस पूरी रणनीति का केंद्र है। यही कारण है कि अमेरिका अपनी ही नाटो संधि को तोड़ने से भी नहीं हिचक रहा।
इतिहास गवाह है कि अमेरिका इससे पहले भी ग्रीनलैंड को सैन्य छावनी बनाने की कोशिश कर चुका है। शीत युद्ध के दौरान यहां हाइड्रोजन बमों से लैस विमानों की तैनाती की गई थी। लेकिन 1968 में हुए एक भीषण परमाणु हादसे ने अमेरिका के इस सपने पर अस्थायी ब्रेक लगा दिया। अब वही अमेरिका इस बार कहीं ज्यादा आक्रामक रूप में वही सोच और वही खतरा के साथ दोबारा लौट रहा है।

ग्रीनलैंड बर्फ नहीं, बारूद का द्वीप

ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से भले ही डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र हो, लेकिन सामरिक दृष्टि से यह पूरी दुनिया की चाबी बन चुका है। उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित यह द्वीप रूस, यूरोप और अमेरिका तीनों के बीच शक्ति संतुलन तय करता है।
अमेरिका की नजर में ग्रीनलैंड कोई द्वीप नहीं, बल्कि एक मिसाइल शील्ड है। यहां से वह रूसी मिसाइलों को उड़ान के बीच में ही मार गिराना चाहता है। पेंटागन का मानना है कि अगर ग्रीनलैंड हाथ से निकल गया, तो अमेरिका की परमाणु सुरक्षा प्रणाली अधूरी रह जाएगी।

कोला प्रायद्वीप रूस का परमाणु किला

फिनलैंड के पास स्थित कोला प्रायद्वीप रूस की सैन्य ताकत की रीढ़ है। यहीं रूस की अधिकतर इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल तैनात हैं। परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां यहीं से गश्त पर निकलती हैं। लंबी दूरी के बमवर्षक विमान यहीं से अमेरिका और यूरोप को निशाना बना सकते हैं। इन सभी हथियारों की उड़ान रेखा ग्रीनलैंड के ऊपर से गुजरती है। यही कारण है कि अमेरिका वहां बैठकर रूस की हर परमाणु हरकत पर नजर रखना चाहता है।

आर्कटिक महासागर में चीन का डेरा

अमेरिका लंबे समय तक चीन को केवल एशिया-प्रशांत तक सीमित समझता रहा। लेकिन बीते पांच वर्षों में चीन ने आर्कटिक महासागर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर अमेरिका की रणनीति को ध्वस्त कर दिया है। चीनी परमाणु पनडुब्बियां आर्कटिक में गश्त कर रही हैं।
रूस के सहयोग से चीन को आइस-ब्रेकिंग जहाजों का समर्थन मिल रहा है। 2024 में खुले नए आर्कटिक समुद्री मार्ग से चीन-यूरोप व्यापार में जबरदस्त तेजी आई है। यह रास्ता स्वेज नहर से भी छोटा है और अमेरिका की पकड़ से बाहर है। ग्रीनलैंड पर कब्जा कर अमेरिका इस रास्ते को नियंत्रित करना चाहता है। अमेरिका की नवंबर में जारी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति 2025 में ग्रीनलैंड को लेकर जो लिखा गया, वह किसी युद्ध घोषणा से कम नहीं है।

लैटिन अमेरिका में परोक्ष कब्जे की बात

नाटो देशों को दरकिनार कर ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाना
रूस और चीन को आर्कटिक में रोकने की खुली रणनीति। 38 पन्नों के इस दस्तावेज ने यह साफ कर दिया कि अमेरिका अब सहयोग नहीं, नियंत्रण चाहता है।

नाटो को भी नहीं बख्शेगा अमेरिका

ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का सदस्य। नाटो संधि के अनुच्छेद 2 के अनुसार, किसी नाटो देश की जमीन पर कब्जा संधि उल्लंघन है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने यह बात अमेरिका को साफ शब्दों में याद दिलाई। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका इस चेतावनी को नजरअंदाज कर रहा है। वेनेजुएला पर हमले के 36 घंटे के भीतर यूरोप में सी-17 ए विमानों से हथियारों की खेप भेजना इसी आक्रामक नीति का हिस्सा है। यूरोप को डराने और विरोध को कुचलने की तैयारी।

1968 का परमाणु हादसा वह दाग जो आज भी जिंदा

21 जनवरी 1968 ग्रीनलैंड के आसमान में उड़ रहा अमेरिकी बी-52 बमवर्षक, जिसमें चार हाइड्रोजन बम थे, दुर्घटनाग्रस्त हो गया, पूरे इलाके में रेडियोधर्मी विकिरण फैल गया। स्थानीय आबादी और जीव-जंतुओं की जान खतरे में पड़ गई। डेनमार्क और यूरोप में अमेरिका के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूटा।
इस हादसे ने अमेरिका के ग्रीनलैंड सैन्यकरण के सपने को तोड़ दिया। लेकिन अब वही अमेरिका उस गलती को दोहराने पर आमादा है।

रूस और चीन का साफ संदेश

अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश की, तो यह सिर्फ डेनमार्क या नाटो से टकराव नहीं होगा। यह सीधे रूस और चीन के साथ टकराव होगा। रूस की मिसाइलें पहले से ही ग्रीनलैंड को कवर करती हैं।
चीन की पनडुब्बियां आर्कटिक में मौजूद हैं। दोनों देश मिलकर अमेरिका को यह बताने के लिए तैयार हैं कि अब दुनिया एक ध्रुवीय नहीं रही। ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का टुकड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का विस्फोटक केंद्र है। अमेरिका अगर यहां आगे बढ़ा, तो यह सिर्फ एक और सैन्य अड्डा नहीं होगा। यह दुनिया को युद्ध की आग में झोंकने वाला कदम होगा।

* ग्रीनलैंड तीसरे विश्वयुद्ध का संभावित केंद्र
* रूस की परमाणु मिसाइलों का रास्ता ग्रीनलैंड से होकर
* कोला प्रायद्वीप में रूस का सबसे बड़ा परमाणु जखीरा
* आर्कटिक महासागर में चीन की पनडुब्बी मौजूदगी
* अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति 2025 में ग्रीनलैंड पर कब्जे का संकेत
* नाटो संधि तोड़ने को तैयार अमेरिका
* 1968 का परमाणु हादसा आज भी यूरोप के जेहन में
ग्रीनलैंड पर कब्जा रूस-चीन से सीधी जंग

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