अमेरिका इजरायल का ईरान पर संयुक्त वार,आर्थिक मुद्दे पर क्या करेगी मोदी सरकार
ईरान ने छेड़ दिया आर्थिक युद्ध, 14 देशों में लगी आग, कल की नई वैश्विक व्यवस्था में कहां होगा भारत?

* ईरान ने बंद कर दिया हॉर्मूज, कच्चे तेल के दाम 90 डॉलर पर पहुंचे
* अगर ईरान और इजरायल का युद्ध लंबा चला तो पेट्रोल-डीजल की होगी राशनिंग
* भारत का 50 फीसदी तेल हॉर्मूज से होकर आता है, मोदी सरकार ने सबसे दुश्मनी की
* महंगा तेल बढ़ाएगा भारत का व्यापार घाटा, भयानक मंदी का शिकार होने की आशंका

नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने अपनी आग उगलती मिसाइलों की जद में एक नहीं, बल्कि दुनिया के 14 देशों को ला खड़ा किया है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, साइप्रस, कतर, कुवैत, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, इजरायल और अमेरिका पर ईरानी ने न केवल मिसाइलें दागीं, बल्कि ड्रोन से भी हमले किए। उसने सऊदी अरब में अरामको की तेल रिफाइनरी पर हमला किया और कतर में गैस स्टेशन पर भी ड्रोन दागे। असल में ईरान ने इन देशों पर ही नहीं, बल्कि दुनिया के तेल ढांचे पर हमला किया है। इसका नतीजा यह हुआ कि कतर ने जहां एलएनजी गैस की सप्लाई रोक दी, वहीं सऊदी अरब ने अरामको से तेल की सप्लाई बंद कर दुनिया को संदेश दे दिया कि अब पेट्रोल-डीजल की राशनिंग करनी होगी।
ईरान ने मंगलवार को आधिकारिक रूप से हॉर्मूज जलडमरूमध्य को बंद करने का ऐलान किया, जहां से दुनिया के कुल तेल निर्यात का पांचवां हिस्सा गुजरता है। ईरान ने हॉर्मूज के पास 3 तेल टैंकरों पर हमला किया है। इससे वहां करीब 150 टैंकरों का जाम लग चुका है। इससे कच्चे तेल के दाम 90 डॉलर से अधिक हो चुके हैं। दुनियाभर में तेल की सप्लाई लाइन पर असर पड़ा है।



आखिर कब खत्म होगी यह जंग?
फिलहाल यह सवाल सभी जेहन में है। यह सवाल शनिवार सुबह ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले में सुप्रीम धार्मिक लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के मारे जाने और उसके कुछ ही देर बाद ईरान के एक साथ कई देशों पर मिसाइल हमले के बाद से उठ खड़ा हुआ है। एक ओर जहां चार-पांच दिन की जंग की कल्पना किए अमेरिका ने बाद में कहा कि यह युद्ध चार हफ्तों, यानी मार्च के पूरे महीने चल सकता है। वहीं ईरान ने यह कहकर अमेरिका और इजरायल की नींद उड़ा दी है कि वह जंग को तीन महीने तक भी खींच सकता है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर ईरान जल्दी युद्ध खत्म करने की बात नहीं मानता है तो क्या होगा ? कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर से ऊपर जा सकते हैं और इस पर निर्भर यूरोप और एशिया में भयानक मंदी देखने को मिल सकती है। जरूरी चीजों के दाम में बेहिसाब वृद्धि भारत जैसे विकासशील देशों को मंदी के कगार पर धकेल सकती है, जहां व्यापार घाटा बढ़ने समूची अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी।
कितना बुरा असर पड़ेगा भारत पर?
भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत तेल विदेशों से मंगाता है। भारत का 50 फीसदी तेल उसी समुद्री रास्ते से आता है, जिस हॉर्मूज को ईरान ने बंद कर रखा है। भारत के पास वैसे तो तीन महीने का स्टॉक रहता है, लेकिन रोजाना 5 मिलियन डॉलर तेल की खपत करने वाले भारत के लिए एक महीने में स्टॉक खाली हो जाता है। भारत के लिए इराक और सऊदी अरब सबसे प्रमुख तेल निर्यातक देश हैं। इसके अलावा अमेरिका के कहने पर भारत ने वेनेजुएला से भी तेल खरीदना शुरू किया है, जो कि बहुत ज्यादा महंगा है। इसके अलावा भारत अपनी सरकारी और कुछ गैर सरकारी रिफायनरीज और तेल कंपनियों को सालाना 30 हजार करोड़ रुपए की सब्सिडी देता है। इस लिहाज से अगर कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 100 डॉलर से अधिक हुए तो भारत का सब्सिडी बिल ज्यादा होगा और यह देश के व्यापार घाटे को और बढ़ाएगा। केपलर के एक्सपर्ट रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिए कच्चे तेल के मुकाबले प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बड़ा संकट है। भारत अपनी जरूरत की 80-85 फीसदी एलपीजी आयात करता है, जिसमें ज्यादातर खाड़ी देशों से होर्मुज स्ट्रेट के जरिये आता है। कच्चे तेल के मुकाबले एलपीजी का उतना बड़ा रणनीतिक भंडार भारत के पास नहीं है। ऐसे में गैस आपूर्ति ज्यादा जोखिम वाला मामला है।
ईरान बदल रहा है वैश्विक व्यवस्था
ईरान ने दुनिया के ऊर्जा नेटवर्क पर हमला कर वैश्विक व्यवस्था को ही बदलने की कोशिश की है और इसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहा है। पश्चिम एशिया दुनिया का एनर्जी मार्केट है और वहीं ईरान ने आग लगाई है। भारत ने अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या के बावजूद न तो इजरायल की निंदा की है और न ही अमेरिका की। इसके बजाय भारत सरकार ने मध्य-पूर्व और इजरायल-अमेरिका गठबंधन का साथ दिया है। इसे देखकर यह लगता है कि भारत ने ईरान का साथ लगभग छोड़ दिया है। इससे पहले भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश को अमेरिका की धमकी के बाद वापस ले लिया था। अब भारत के इस कदम से केवल ईरान ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब और यूएई के साथ भी भारत के रिश्ते खराब हो सकते हैं। खासकर तब, अगर ईरानी हमलो के बाद अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचकर बातचीत की मेज पर आना पड़ता है। ईरान ने इजरायल के साथ अमेरिका को जो चुनौती दी है, उसी स्थापित वैश्विक व्यवस्था को भारत 2014 से मानता आ रहा है, जो कि डॉलर केंद्रित है। ईरान को छोड़कर मिडिल ईस्ट के तमाम देश उसी वैश्विक व्यवस्था को मान रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का कदम पीछे खींचना भारत को मुश्किल में डाल सकता है। इस बात के आसार ज्यादा हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी नवंबर में होने वाली मध्यावधि चुनाव में हार जाएं और उनके बाद आने वाले अमेरिका के नए राष्ट्रपति की नीतियां अलग हों। इन्हीं के बीच युक्रेन और ताईवान का मसला भी फंसा है और इन दोनों मसलों पर भारत की स्थिति अमेरिका को समर्थन करने वाले देश की रही है, जो रूस और चीन दोनों को नाराज करने के लिए काफी है।
वैश्विक स्तर पर भारत के सामने विकल्प क्या हैं ?
भारत ने अपनी वैश्विक नीति में 2014 के बाद से बड़े बदलाव किए हैं। नरेंद्र मोदी के पीएम रहते हुए इस दौर में भारत ने दुनिया के अहम देशों के साथ व्यापारिक संबंध जरूर बनाए, लेकिन साथ में उनकी शर्तें भी मानीं और समझौते किए। इससे भारत दुनिया के सबसे बड़े बाजार के रूप में एक डंपिंग ग्राउंड बन गया। चीन से भारत का आयात 100 बिलियन डॉलर का है। यही कारण है कि भारत के हर छोटे-बड़े बाजार में हमें चीन का सस्ता सामान दिखता है। यही हाल अमेरिका के साथ ट्रेड डील करने के बाद होने वाला है और यूरोपीय संघ के साथ ट्रेड डील करने पर भी, जहां भारत से भेजे जाने वाले सामानों पर टैरिफ लगेगा, लेकिन इन देशों से भारत आने वाले सामानों को निशुल्क एंट्री मिलेगी। विदेश नीति की बात करें तो भारत की दक्षिण एशियाई देशों की छवि खराब है। क्वाड में अमेरिकी दादागीरी है और ब्रिक्स, एससीओ में भारत की चलती नहीं है। भारत इस साल ब्रिक्स का अध्यक्ष भी है, लेकिन डॉलर के बदले स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने पर भी भारत ने रजामंदी नहीं दी है। इन हालात में ईरान युद्ध के बाद भारत नई वैश्विवक व्यवस्था में अपनी भूमिका को अहम तरीके से रखने में नाकाम होगा। दुनिया भारत को अमेरिका का पिछलग्गू देश मान चुकी है, जहां राष्री ाय हितों की जगह व्यापारिक हितों को अहमियत दी जाती है।




