अवंती बाई लोधी ने मातृभूमि की रक्षा में दी थी अपनी आहुति

शहादत दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि, समाजवादी नेताओं ने याद किया उनका बलिदान
कांच की चूड़ियों के साथ दिया था चेतावनी भरा संदेश

ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर को पराजित कर अंग्रेजों को मंडला छोड़कर भागने पर किया मजबूर
मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति का उदाहरण
रामगढ़ की वीरांगना रानी अवंती बाई लोधी भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की महानायिका थीं। जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। शनिवार को रामपुर कारखाना विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत डुमरी स्थित सपा जनसंपर्क कार्यालय पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में सपा के पूर्व प्रवक्ता चंद्रभूषण सिंह यादव ने कहा कि रानी अवंती बाई लोधी ने नारी शक्ति और साहस का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो सदैव प्रेरणा देता रहेगा। कार्यक्रम में यादव ने विस्तार से बताया कि जब 1857 का संग्राम प्रारंभ हुआ, तब गोंड राजा शंकर शाह की अध्यक्षता में एक विशाल सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी रानी अवंती बाई को सौंपी गई। उन्होंने पड़ोसी राज्यों के राजाओं और जमींदारों को पत्र भेजकर लिखा कि मातृभूमि की रक्षा के लिए कमर कस लो, अन्यथा कांच की चूड़ियां पहनकर घर बैठ जाओ। यह संदेश एक ललकार थी, जिसने दूर-दूर तक देशभक्तों को जागृत किया और सभी राजाओं को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट कर दिया। 1857 के विद्रोह की शुरुआत के बाद रानी ने 4 हजार सैनिकों की सेना संगठित की। 23 नवंबर 1857 को उन्होंने मंडला के पास खैरी गांव में अंग्रेजों के साथ निर्णायक युद्ध लड़ा। इस युद्ध में उन्होंने ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर वाडिंगटन को बुरी तरह पराजित कर अंग्रेजों को मंडला छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। यह जीत केवल एक युद्ध की विजय नहीं थी, बल्कि भारतीय आत्मसम्मान की गूंज थी।
रीवा के राजा से मिली अंग्रेजों को मदद
अंग्रेज इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं थे। अवंती बाई की जीत ने उन्हें अपमानित कर दिया। बदले की भावना से उन्होंने रीवा नरेश की मदद ली और एक बार फिर रामगढ़ पर चढ़ाई की। चारों ओर से घिरी रानी ने हार न मानते हुए पहाड़ियों में जाकर गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। उनकी रणनीति और साहस ने ब्रिटिश सेना को लंबे समय तक छकाए रखा।
मातृभूमि के लिए बलिदान का संकल्प
जब परिस्थितियां विपरीत हो गईं और अंग्रेजों की भारी सेना के सामने जीत असंभव लगने लगी, तब रानी ने एक निर्णय लिया जिसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। 20 मार्च 1858 को उन्होंने अपनी तलवार से स्वयं का वध कर लिया और मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दे दी। उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि गुलामी से बेहतर है मृत्यु।
श्रद्धांजलि सभा में उमड़ा जनसैलाब
डुमरी स्थित जनसंपर्क कार्यालय पर आयोजित कार्यक्रम में रानी अवंती बाई के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। सपा के पूर्व प्रवक्ता चंद्रभूषण सिंह यादव ने कहा कि अवंती बाई लोधी ने यह साबित किया कि स्त्रियां केवल गृहस्थी की संरक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने में भी पीछे नहीं रहतीं। सभा में मौजूद लोगों ने उनके साहस को याद करते हुए मौन श्रद्धांजलि दी।
कार्यक्रम में शामिल रहे जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता
इस मौके पर मुरलीधर, सुरेश नारायण सिंह, दयानंद यादव, अशोक यादव, कृष्णा यादव, अयोध्या वर्मा, संतोष मद्धेशिया, नाजिर अंसारी, नगीना यादव, उत्तिम यादव, श्यामराज कन्नौजिया, अभिषेक गुड्डू गोंड सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि रानी अवंती बाई का बलिदान आज भी नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, साहस और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाता है।
नारी शक्ति का प्रतीक बनीं अवंती बाई
इतिहासकारों का मानना है कि रानी अवंती बाई ने न केवल अंग्रेजों को ललकारा बल्कि उस दौर में समाज में स्त्रियों की सीमित भूमिका की परिभाषा भी बदल दी। जहां एक ओर वे मातृत्व और करुणा की प्रतिमूर्ति थीं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने युद्धभूमि में सिंहनी की तरह नेतृत्व किया। उनकी जीवनगाथा आज भी यह बताती है कि नारी शक्ति केवल प्रेरक नहीं, बल्कि निर्णायक भी है।
नई पीढ़ी के लिए सीख
श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में जब समाज विभाजन और स्वार्थ की राजनीति से जूझ रहा है, तब रानी अवंती बाई की शहादत हमें एकजुट होकर मातृभूमि की रक्षा का संदेश देती है। उनकी स्मृति हमें यह सिखाती है कि सच्चा देशभक्त वह है जो निजी स्वार्थ त्यागकर समाज और राष्ट्र के लिए जीवन अर्पित कर दे। रानी अवंती बाई लोधी का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा है। वे केवल गोंडवाना की वीरांगना नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष की अमर शहीद नारी हैं।उनकी शहादत से गूंजता संदेश आज भी हर भारतीय के हृदय में बसता है कि मातृभूमि की रक्षा सबसे ऊपर है।




