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आम बजट में आम आदमी को “आम” की तरह चूस रही मोदी सरकार, जनता की दुःखों से इन धोखेबाजो का नही कोई वास्ता-सरोकार

गले तक कर्ज में डूबी मोदी सरकार ने बजट में प्रति व्यक्ति दिए 31 हजार, आम जनता कैसे काटेगी पूरा साल? मिडिल क्लास के लिए कुछ नहीं, गरीबों का बुरा हाल

– न तो दलितों का रखा ध्यान और न ही आदिवासियों का

– शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में आवंटित राशि और कम

– केंद्र पर है कुल 196 लाख का है कर्ज, ब्याज पर जाएंगे 14 लाख करोड़

– राज्यों पर खर्च की जिम्मेदारी देने का नतीजा- विकास हुआ ठप

नई दिल्ली। रविवार एक तारीख को संसद में साल 2026-27 का बजट पेश करने के बाद एक टॉक शो में जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से यह पूछा गया कि इस बार के बजट में मिडिल क्लास के लिए क्या है? तो कुछ समय के लिए उनकी बोलती बंद हो गई। फिर उन्होंने बजट में उच्च शिक्षा के लिए हब बनाने जैसी खोखली बातें कहनी शुरू कर दीं। दरअसल, वित्त मंत्री ने बजट में प्रति व्यक्ति केवल 31 हजार 395 रुपए देकर कन्नी काट ली है। उन्होंने अपने बजट में न तो सामाजिक कल्याण के लिए योजनाओं का विभागवार आवंटन बताया और न ही मूलभूत सुविधाओं- जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि के लिए सरकारी खर्च की जानकारी दी।

क्या छिपा रही है केंद्र की मोदी सरकार

बजट में वित्त मंत्री जो बात छिपा गईं, वह संसद के पटल पर रखे गए बजट प्रस्तावों से सामने आती है। 53.5 लाख करोड़ के भारत के बजट पर विदेशी एजेंसियों से लिया गया 196.70 लाख करोड़ का कर्ज भारी पड़ा है। फिलहाल, इस कर्ज का ब्याज ही भारत सरकार को 14 लाख करोड़ से अधिक का है। यानी एक रुपए की आमदनी पर 25 पैसे ब्याज चुकाना है। केंद्र सरकार का कुल कर्ज 2025-26 के अंत में अनुमानित 197.18 लाख करोड़ रुपये है! 2026-27 के बजट अनुमान के अनुसार, इस कर्ज पर वार्षिक ब्याज भुगतान 14.04 लाख करोड़ रुपये है। 2026-27 के बजट अनुमान के अनुसार, इस कर्ज पर वार्षिक ब्याज भुगतान 14.04 लाख करोड़ रुपये है। 2017 में भारत पर केवल 74 लाख करोड़ रुपए का कर्ज था। लेकिन अपनी खराब वित्तीय नीतियों के कारण केंद्र सरकार लगातार कर्ज लेती गई और साल 2025 में भारत पर कर्ज 168.73 लाख करोड़ रुपए का हो गया। इसीलिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार लोगों का जीवनस्तर सुधारने के लिए अपेक्षित खर्च नहीं कर पा रही है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में विकसित भारत के सुनहरे सपने दिखाते हुए इस बात को बखूबी छिपा लिया है।

20 करोड़ दलितों के लिए 1.96 लाख करोड़

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में आंकड़ों को बड़ा दिखाने के लिए सभी तरह के आवंटनों को जोड़कर पेश किया है। इसे आम जनता की आंखों में धूल झोंकना भी कह सकते हैं। जैसे दलित-आदिवासियों के कल्याण के लिए 3.37 लाख करोड़ के आवंटन का आंकड़ा और कुछ नहीं महज धोखा है। भारत की आबादी में दोनों वर्गों का प्रतिनिधित्व 37 फीसदी का है और भाजपा की चुनावी जीत में दोनों ही वर्गों का अहम योगदान है। फिर भी हमेशा की तरह केंद्र सरकार ने दोनों को एक बार फिर ठेंगा दिखाया है। जहां 20 करोड़ दलितों के लिए केवल 1.96 लाख करोड़ दिए गए हैं, वहीं 10 करोड़ आदिवासियों के कल्याण पर केंद्र ने 1.41 लाख करोड़ की आवंटित किए हैं। वहीं, रक्षा बजट को 15 फीसदी बढ़ाकर 7.85 लाख करोड़ रुपए किया गया है।

 

प्रति दलित 980 और हर आदिवासी के हिस्से में 1410 रुपए आएंगे

अगर हम इस साल के बजट में प्रति व्यक्ति आवंटन को तौलें तो पता चलेगा कि एक दलित के हिस्से में केवल 980 रुपए आएंगे, जो उसके विकास पर खर्च होंगे, जबकि प्रत्येक आदिवासी के हिस्से में 1410 रुपए का आवंटन बजट में किया गया है। इससे उलट रक्षा सेनाओं के प्रत्यक जवान के हिस्से में 5500 रुपए आ रहे हैं। हालांकि, केंद्र से यह रकम व्यक्तिगत रूप से ट्रांसफर नहीं होगी। यह राशि दोनों कमजोर वर्गों के विकास में खर्च की जाएगी। मिसाल के लिए शिक्षा मंत्रालय के लिए वित्त मंत्री ने 2.28 लाख करोड़ रुपए का आवंटन बजट में दिखाया है, लेकिन इस राशि में पोषण अभियान- यानी मध्यान्ह भोजन और आंगनवाड़ी के माध्यम से पांच साल तक के बच्चों, गर्भवती और धात्री माताओं को दी जाने वाली पोषण सामग्री का खर्च भी चतुराई से जोड़कर आंकड़ों को बड़ा दिखाया गया है। इसी में पीएश्री स्कूलों का खर्च भी जोड़ दिया गया है।

 

शिक्षा पर भारत का सबसे कम खर्च

दुनिया के तकरीबन सभी विकसित और विकासशील देशों में भारत का शिक्षा पर खर्च सबसे कम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी देशों से शिक्षा पर 4 % से ज्यादा खर्च करने की सिफारिश की है, लेकिन भारत अपनी जीडीपी का केवल 2.7% ही खर्च कर रहा है, जो कि 2020 के 2.9% से भी कम है। इसका मतलब है कि केंद्र के खर्च किए जाने वाले 100 रुपए में केवल 27 पैसे शिक्षा के हिस्से में आते हैं। केंद्र सरकार ने संसद के बजट सत्र में ही इस बात को माना है कि बीते साल भारत में 18 हजार सरकारी स्कूल बंद किए गए, जबकि उससे डेढ़ गुना ज्यादा प्राइवेट स्कूल खुल गए। यानी केंद्र की मोदी सरकार का पूरा ध्यान शिक्षा के निजीकरण की तरफ है। ऐसे में गरीब परिवारों के लाखों बच्चे फीस न भर पाने के कारण पढ़ाई से दूर हो रहे हैं।

देश शिक्षा पर खर्च (जीडीपी )

दक्षिण अफ्रीका 6%

ब्राजील 5.6%

चीन 4%

बेहद गरीब देश 3-4%

होना चाहिए 4-6% खर्च

 

स्वास्थ्य पर बजट 2% से भी कम

वित्त मंत्री ने कर्ज में गले तक डूबे भारत के साल 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य पर वास्तविक आवंटन केवल 1.05 लाख करोड़ रुपए किया है, लेकिन बजट प्रस्तावों में यह 1.45 लाख करोड़ दिखा रहा है, क्योंकि इसी में साफ पेयजल और स्वच्छता के बजट की राशि भी जुड़ी हुई है। यह आवंटन जीडीपी का केवल 1.8% है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया के सभी देशों को स्वास्थ्य पर 5% से कम खर्च करना ही नहीं चाहिए। यहां तक कि इसी नरेंद्र मोदी सरकार में बनीं राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी स्वास्थ्य पर जीडीपी का 2.5% खर्च करने की सिफारिश की गई है। लेकिन, मोदी सरकार ने अपनी ही नीति को कूड़े में डाल दिया है, क्यों कि उसे आम लोगों की सेहत से कोई मतलब नहीं है।

देश स्वास्थ्य पर खर्च (जीडीपी )

दक्षिण अफ्रीका 8.3%

ब्राजील 9.9%

चीन 5.4%

ओईसीडी के देश 8-10%

भारत 1.8%

दुनिया के गरीब देश 3.6%

 

संविधान का घोर उल्लंघन

नरेंद्र मोदी सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य को बजट में लगातार अनदेखा कर भारत के संविधान के अनुच्छेद 46 का लगातार घोर उल्लंघन कर रही है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि सरकार को दलितों और आदिवासियों के हितों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार ने यह काम अब राज्यों पर थोप दिया है, जो पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं और केंद्र से सहायता राशि के मोहताज बने हुए हैं। बीते कुछ सालों से केंद्र ने सामाजिक क्षेत्र के बजट आवंटन की 60% रकम राज्यों के हवाले कर रखी है। खासकर स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में राज्यों को 65 से 80% रकम खुद खर्च करनी पड़ रही है। केंद्र का तर्क है कि चूंकि दोनों ही क्षेत्रों में राज्यों को ही योजनाओं का क्रियान्वयन करना है, इसलिए खर्च भी वही करें। अगर हम 2025-26 का बजट अनुमान देखें तो केंद्र सरकार ने दोनों ही मदों में आवंटित रकम 14.8 लाख करोड़ से बढ़ाकर 25.7 लाख करोड़ की है। लेकिन इस राशि में राज्यों का हिस्सा 2024-25 के संशोधित अनुमानों में 26.5 लाख करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है।

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