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आयुष्मान कार्ड में 10 करोड़ का खेल!योगी सरकार का जीरो टॉलरेंस हो गया फेल

बिना ऑडिट 39 निजी अस्पतालों को फर्जी भुगतान, स्टेट एजेंसी के सिस्टम पर सवाल

  •  बिना मेडिकल ऑडिट भुगतान, एफआईआर दर्ज
  • अधिकारियों के लॉगिन आईडी का गलत दुरुपयोग
  • कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एण्ड इंटीग्रेटेड सर्विसेज जांच के घेरे में
  • साइबर सुरक्षा पर सवाल, गरीब मरीजों के अधिकारों पर संकट


लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गरीबों के मुफ्त इलाज की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना है जो अब खुद गंभीर सवालों के घेरे में है। जिन अस्पतालों में गरीब मरीजों को पांच लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज मिलना था, वहीं से फर्जी क्लेम का ऐसा जाल बुना गया कि करीब 10 करोड़ रुपये का भुगतान बिना समुचित ऑडिट के कर दिया गया। हैरत की बात यह है कि यह भुगतान 39 निजी अस्पतालों के डॉक्टरों के नाम पर हुआ और अब पूरे मामले में एफआईआर दर्ज हो चुकी है।
इस घोटाले की सबसे चिंताजनक परत यह है कि भुगतान की प्रक्रिया में राज्य की अधिकृत एजेंसी कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एण्ड इंटीग्रेटेड सर्विसेज (साचीज) की भूमिका भी जांच के घेरे में है। आरोप है कि अधिकारियों के लॉगिन आईडी का दुरुपयोग कर फर्जी क्लेम पास कराए गए। आयुष्मान योजना के तहत अस्पतालों को हर इलाज के लिए पूर्व निर्धारित पैकेज दरों पर भुगतान किया जाता है। प्रत्येक क्लेम की तकनीकी व मेडिकल ऑडिट अनिवार्य होता है। लेकिन इस मामले में ऑडिट प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे भुगतान कर दिया गया। प्राथमिक जांच में संकेत मिले हैं कि कई क्लेम ऐसे मरीजों के नाम पर डाले गए जिनका या तो वास्तविक उपचार नहीं हुआ या फिर उपचार की श्रेणी को बढ़ाकर अधिक भुगतान लिया गया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि डिजिटल निगरानी तंत्र के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर फर्जी भुगतान कैसे हो गया? यदि लॉगिन आईडी का दुरुपयोग हुआ, तो साइबर सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या संबंधित अधिकारियों ने समय रहते संदिग्ध गतिविधियों की पहचान की?
यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता नहीं है, बल्कि गरीब मरीजों के अधिकारों पर सीधा हमला है। जब सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये फर्जी क्लेम में चले जाते हैं, तो असली मरीजों के इलाज की क्षमता पर भी असर पड़ता है। प्रदेश में पहले ही कई अस्पताल आयुष्मान भुगतान में देरी की शिकायत करते रहे हैं। ऐसे में 10 करोड़ का यह भुगतान पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है। एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हुई हैं।

योजना और दावे

आयुष्मान भारत योजना को गरीब और वंचित परिवारों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा कवच के रूप में पेश किया गया था। योजना के तहत प्रति परिवार प्रति वर्ष पांच लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश में लाखों परिवार इस योजना से जुड़े हैं। राज्य स्तर पर इसके संचालन की जिम्मेदारी कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एण्ड इंटीग्रेटेड सर्विसेज को दी गई है, जो अस्पतालों के पंजीकरण, क्लेम प्रोसेसिंग और भुगतान की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। कागजों में व्यवस्था मजबूत दिखती है अस्पताल इलाज का विवरण पोर्टल पर अपलोड करता है, मेडिकल ऑडिटर उसे सत्यापित करते हैं, और फिर भुगतान की स्वीकृति मिलती है। लेकिन हालिया खुलासे ने साबित किया है कि डिजिटल ढांचा भी मानव लालच के सामने कमजोर पड़ सकता है।

फर्जी क्लेम का तरीका

प्रारंभिक जांच के अनुसार, 39 निजी अस्पतालों से जुड़े डॉक्टरों के नाम पर बड़ी संख्या में क्लेम अपलोड किए गए। इन क्लेम में कई मरीजों के दस्तावेज संदिग्ध पाए गए। कुछ मामलों में एक ही मरीज के नाम पर अलग-अलग तारीखों में कई महंगे पैकेज दर्शाए गए।
जांच में यह भी सामने आया कि अधिकारियों के लॉगिन आईडी का उपयोग कर क्लेम पास किए गए। यह संकेत देता है कि या तो पासवर्ड साझा किए गए थे या सिस्टम में अंदरूनी पहुंच रखने वाले किसी व्यक्ति ने तकनीकी खामी का फायदा उठाया।

ऑडिट प्रक्रिया कैसे हुई दरकिनार?

आयुष्मान योजना में तीन स्तरीय जांच व्यवस्था होती है:
अस्पताल स्तर पर दस्तावेज का सत्यापन, राज्य एजेंसी द्वारा मेडिकल ऑडिट, भौतिक सत्यापन किया जाता है। आरोप है कि मेडिकल ऑडिट के बिना ही भुगतान कर दिया गया। यदि यह सच है तो यह सीधा-सीधा वित्तीय नियमों का उल्लंघन है।

कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एण्ड इंटीग्रेटेड सर्विसेज पर सवाल

कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ एण्ड इंटीग्रेटेड सर्विसेज जो राज्य की अधिकृत एजेंसी है, अब खुद जांच के घेरे में है। अधिकारियों के लॉगिन आईडी का गलत इस्तेमाल कैसे हुआ? क्या साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं हुआ? यदि किसी कर्मचारी ने जानबूझकर सिस्टम एक्सेस दिया, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक साजिश मानी जाएगी।

एफआईआर और जांच

प्रकरण सामने आने के बाद एफआईआर दर्ज की गई है। जांच एजेंसियां डिजिटल लॉग, आईपी एड्रेस और भुगतान की ट्रेल खंगाल रही हैं। संभावना है कि साइबर फॉरेंसिक टीम की मदद ली जाएगी। परन्तु इसका सबसे बड़ा नुकसान उन मरीजों का है जो वास्तव में इलाज के हकदार हैं। यदि फर्जी क्लेम से बजट प्रभावित होता है तो वास्तविक मरीजों के क्लेम अटक सकते हैं। कई जिलों में पहले ही भुगतान लंबित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। गरीबों के इलाज की योजना यदि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ेगी तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, सामाजिक अन्याय भी होगा। 10 करोड़ का यह मामला सिर्फ शुरुआत हो सकता है। जरूरत है कि जांच निष्पक्ष और व्यापक हो ताकि स्वास्थ्य सुरक्षा योजना में जनता का भरोसा बहाल हो सके।
क्या यह संगठित रैकेट है? 39 अस्पतालों का नाम आना संयोग नहीं हो सकता। यदि सभी मामलों में एक जैसा पैटर्न है तो यह संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करता है। जिन अधिकारियों के लॉगिन से भुगतान हुआ, उनकी जिम्मेदारी तय होगी या नहीं? क्या अस्पतालों का पंजीकरण रद्द होगा? क्या वसूली की प्रक्रिया शुरू होगी? हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने जांच का आश्वासन दिया है। लेकिन जनता जानना चाहती है कि क्या केवल निलंबन तक कार्रवाई सीमित रहेगी या बड़े स्तर पर सुधार किए जाएंगे।

* आयुष्मान योजना की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न
* डिजिटल सिस्टम के बावजूद फर्जीवाड़ा
* राज्य एजेंसी की भूमिका संदिग्ध
* संगठित नेटवर्क की आशंका
* जवाबदेही तय करने की मांग

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