आयुष हेल्थ केयर के संचालक डॉक्टर ए के सिंह का घिनौना काम,पीड़िता की लाश का लगा दिया दाम
अस्पताल की लापरवाही बनी मौत की वजह, शव देने के लिए पैसे की सौदेबाजी

- पत्रकारों पर मुकदमा, परिजनों पर दबाव चंदौली की शर्मनाक तस्वीर
- इलाज के नाम पर लापरवाही, मौत के बाद पैसों की सौदेबाजी
- गरीब परिवार की बेबसी, बेटी के शव को बनाया गिरवी
- रेफर करने से इनकार, ‘खतरे से बाहर’ बताकर बहलाते रहे डॉक्टर
- पहले ही 35 हजार जमा, फिर भी मौत के बाद मांगे 44 हजार
- पत्रकारों ने खोला अस्पताल का काला सच, उजागर हुए सबूत
- प्रभाव और पैसों के बल पर पुलिस-प्रशासन को मोड़ा अस्पताल संचालक ने
- दो घंटे में पत्रकारों पर मुकदमा, परिजनों से जबरन कराया समझौता
- एसपी-डीएम से न्याय की गुहार, निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
(राजकुमार सोनकर)
चंदौली। चंदौली जिले की यह घटना सिर्फ एक किशोरी की मौत की नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के पतन, निजी अस्पतालों की अमानवीयता और प्रशासनिक मिलीभगत की जीती-जागती तस्वीर है। 17 वर्षीय प्रियांशी कुमारी, जो बिहार के कैमूर जिले के एक गरीब परिवार की बेटी थी, इलाज की आस में आयुष हेल्थ केयर नामक अस्पताल लाई गई। परिवार को विश्वास था कि अस्पताल उनकी बिटिया को बचा लेगा। लेकिन हुआ इसके उलट—इलाज के नाम पर लापरवाही और भरोसे के नाम पर धोखा। बार-बार गुहार लगाने के बावजूद उसे किसी बड़े अस्पताल में रेफर नहीं किया गया। डॉक्टरों ने झूठा दिलासा दिया कि मरीज खतरे से बाहर है। नतीजा यह हुआ कि प्रियांशी की सांसे अस्पताल की उदासीनता के कारण थम गईं। लेकिन त्रासदी यहीं खत्म नहीं हुई। मौत के बाद परिजनों ने जब बेटी का शव मांगा तो अस्पताल प्रबंधन ने नया खेल शुरू किया। उन्होंने शव देने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि पहले 44 हजार रुपये जमा करो, तभी शव मिलेगा। सोचिए, एक पिता जिसके आंसू थम नहीं रहे, एक मां जो अपने बच्चे के शव को गले लगाने के लिए तड़प रही, उनके सामने अस्पताल ने बेटी के शव को भी पैसों की जंजीर में बांध दिया। यह दृश्य न केवल अमानवीय था, बल्कि पूरे समाज की संवेदनाओं के लिए करारा तमाचा था। इस दौरान स्थानीय पत्रकारों ने हिम्मत दिखाई और अस्पताल की करतूत को जनता के सामने रखा। उन्होंने सबूतों के साथ बताया कि परिजन पहले ही 35 हजार रुपये दे चुके हैं। लेकिन जब सच्चाई उजागर हुई तो अस्पताल संचालक ने अपने प्रभाव और पैसों का इस्तेमाल करते हुए पुलिस से मिलकर उन्हीं पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करा दिया। गरीब परिवार पर रातों-रात दबाव बनाकर जबरन लिखवा लिया गया कि उन्हें अस्पताल से कोई शिकायत नहीं है। यह दबाव, यह साजिश और यह अन्याय बताता है कि निजी अस्पतालों के लालच और प्रशासन की मिलीभगत ने आम आदमी को किस कदर असहाय बना दिया है। अब पीड़ित परिवार डीएम-एसपी से न्याय की गुहार लगा रहा है। सवाल उठता है कि आखिर कब तक गरीबों की लाशें भी पैसों की सौदेबाज़ी में फंसाई जाती रहेंगी? कब तक सच उजागर करने वाले पत्रकारों को ही अपराधी बनाया जाएगा? और कब तक प्रशासन अमीरों की ढाल बनकर खड़ा रहेगा, जबकि गरीब न्याय के लिए दर-दर भटकता रहेगा?


इलाज के नाम पर छलावा, मौत
23 अगस्त को बिहार के कैमूर जिले के एक गरीब परिवार की 17 वर्षीय बेटी प्रियांशी कुमारी की तबीयत बिगड़ी। आर्थिक तंगी के बावजूद परिजनों ने उसे पास के चंदौली जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र स्थित आयुष हेल्थ केयर में भर्ती कराया। परिवार को उम्मीद थी कि बेटी ठीक हो जाएगी, लेकिन अस्पताल की कहानी ही अलग थी। इलाज की शुरुआत से ही परिजनों को संदेह हुआ कि गंभीर बीमार बच्ची की देखभाल लापरवाही से हो रही है। न तो विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद थे, न ही आधुनिक सुविधाएं। बार-बार कहने पर भी अस्पताल प्रबंधन ने मरीज को किसी बड़े सरकारी या निजी अस्पताल में रेफर करने से इंकार कर दिया। डॉक्टर और प्रबंधन लगातार यही कहते रहे कि मरीज खतरे से बाहर है, चिंता की कोई बात नहीं। यह आश्वासन दरअसल बहलावा था। प्रियांशी की हालत धीरे-धीरे बिगड़ती रही और आखिरकार अस्पताल की लापरवाही ने उसकी जान ले ली।
शव के बदले पैसों की मांग
किसी भी अस्पताल की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी होती है कि मरीज की मौत के बाद शव को परिजनों को सम्मानपूर्वक सौंपा जाए। लेकिन आयुष हेल्थ केयर ने मानवीय संवेदनाओं की सारी हदें पार कर दीं। मौत के बाद शव देने के बजाय अस्पताल संचालक ए.के. सिंह ने 44 हजार रुपये की बकाया रकम की मांग करते हुए शव को रोक लिया। गरीब और असहाय परिजनों ने पहले ही इलाज के दौरान 35 हजार रुपये जमा कर दिए थे। लेकिन बेटी की लाश पाने के लिए भी पैसे का सौदा करना पड़ा। यह दृश्य स्वास्थ्य सेवाओं की उस गिरी हुई हालत को बयान करता है, जहाँ इंसानियत की जगह लालच हावी हो गया है।
पत्रकारों का हस्तक्षेप और पर्दाफाश
जब अस्पताल ने शव रोककर परिजनों को परेशान करना शुरू किया तो स्थानीय पत्रकारों ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने पीड़ित परिवार की कहानी को उजागर किया और अस्पताल की करतूतों को जनता के सामने लाया। पत्रकारों ने न केवल परिजनों के बयान दर्ज किए बल्कि उन रसीदों और डिजिटल लेन-देन के सबूतों को भी सार्वजनिक किया, जिनसे साफ हो गया कि परिवार ने पहले ही 35 हजार रुपये जमा कर दिए थे। यानी अस्पताल द्वारा शव रोकना सीधा-सीधा उत्पीड़न और वसूली थी।
अस्पताल प्रशासन का प्रभाव और पैसों से बना दबाव
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। अस्पताल प्रबंधन ने अपने प्रभाव और पैसों का इस्तेमाल करते हुए हालात को पलट दिया। आरोप है कि स्थानीय पुलिस और कुछ कथित पत्रकारों की मदद से गरीब परिवार को दबाव में लिया गया। रातों-रात परिजनों से जबरन लिखित समझौता कराया गया। उस समझौते में परिवार को यह लिखना पड़ा कि अस्पताल का 44 हजार रुपये बकाया माफ हो गया है और हमें अस्पताल से कोई शिकायत नहीं है। यह समझौता अस्पताल को बचाने का जरिया था, जिसमें गरीब परिजनों को दबाव और डर के कारण मजबूरन हस्ताक्षर करने पड़े।
पत्रकारों पर मुकदमा सच्चाई दबाने की साजिश
अस्पताल संचालक ए.के. सिंह यहीं नहीं रुके। उन्होंने 27 अगस्त को अलीनगर थाने में पत्रकारों पर ही झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि आम तौर पर किसी गंभीर मामले में एफआईआर दर्ज करने में पुलिस को कई दिन लग जाते हैं। लेकिन यहाँ संचालक की तहरीर पर बिना किसी साक्ष्य और जांच के सिर्फ़ दो घंटे में पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या पुलिस भी अस्पताल प्रबंधन की जेब में है? क्या गरीब की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों को ही अपराधी बना दिया जाएगा?
हताश और निराश परिवार अब प्रशासन के दरवाजे पर
1 सितम्बर को मृतका प्रियांशी कुमारी के परिजनों ने जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक चंदौली से मिलकर एक लिखित शिकायती पत्र सौंपा। उन्होंने आयुष हेल्थ केयर प्रबंधन और संचालक ए.के. सिंह सहित अन्य लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। परिजनों ने कहा कि पत्रकारों पर दर्ज झूठा मुकदमा तत्काल खत्म हो। अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो। दोषी संचालक और डॉक्टरों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो।
स्वास्थ्य सेवाओं की शर्मनाक तस्वीर
यह पूरा मामला स्वास्थ्य सेवाओं की शर्मनाक तस्वीर पेश करता है। जहां एक ओर गरीब मरीजों को इलाज के नाम पर ठगा जाता है, वहीं मौत के बाद शव तक को पैसों की जकड़ में कैद कर लिया जाता है। अस्पताल और पुलिस की मिलीभगत से न्याय की उम्मीद और भी कठिन हो जाती है।
जनप्रतिनिधियों और जनता की नाराज़गी
पत्रकारों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस प्रकरण पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना है कि अगर गरीबों की आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों को ही झूठे मुकदमों में फंसाया जाएगा, तो आम जनता की आवाज कौन बनेगा?
* 23 अगस्त को प्रियांशी कुमारी को आयुष हेल्थ केयर में भर्ती किया गया।
* इलाज के दौरान लापरवाही, रेफर करने से इनकार।
* परिजनों ने 35 हजार पहले ही जमा किए थे।
* मौत के बाद शव रोककर 44 हजार की मांग।
* पत्रकारों ने सबूत उजागर किए, प्रबंधन की पोल खुली।
* रातों-रात परिजनों से दबाव में समझौता कराया गया।
* 27 अगस्त को पत्रकारों पर झूठा मुकदमा दर्ज।
* पुलिस ने 2 घंटे में मुकदमा दर्ज कर दिखाई ‘फुर्ती’।
* 1 सितम्बर को परिजनों ने डीएम-एसपी को शिकायत दी।
* अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग।




