वाराणसी

उफ़्फ़र पड़े ऐसे रोप-वे, फोप-वे का जंजाल: काशीवासियों के अल्हड़ मिजाजियों को नही भा रहा इसका भौकाल

तुषार मौर्य

● उफ़्फ़र पड़े ऐसे रोप-वे, फोप-वे का जंजाल: काशीवासियों के अल्हड़ मिजाजियों को नही भा रहा इसका भौकाल

● गोदौलिया की सड़कों पर अघोषित आपातकाल, किराया डबल–खतरा भी डबल

● काशी में विकास के नाम पर जनता को जबरन झेलनी पड़ रही है दमघोंटू यातायात व्यवस्था

● गिरजाघर-गोदौलिया मार्ग पर आवाजाही लगभग ठप, आम आदमी का सफर हुआ दुश्वार

● रोप-वे का किराया टोटो-ऑटो से दोगुना, फिर भी बताया जा रहा सस्ता विकल्प

● सड़क हादसे में बचने की गुंजाइश, रोप-वे हादसे में नहीं, काशीवासी बोले यह सुविधा नहीं जोखिम

● नेशनल हाईवे लॉजिस्टिक्स का आयरन स्ट्रक्चर बना जनता के लिए लोहे का जाल

● 18 नवंबर से 18 दिसंबर तक गिरजाघर चौराहा पूरी तरह बंद, पुलिस बेबस या मजबूर

● निर्माण कंपनियों को ‘फुल फ्रीडम’, नागरिकों की ‘नो एंट्री’

● काशी की धड़कन गोदौलिया कैंट मार्ग पर शासन का विकास मॉडल चुप रहो और भुगतो

 

वाराणसी। काशी की भीड़भाड़, उसकी धड़कन, उसका व्यापार, उसकी आध्यात्मिक यात्रा सब कुछ आजकल एक विवादास्पद सवाल में सिमट गया है, क्या विकास जनता की सुविधा का नाम है या जनता पर थोपा गया बोझ? गिरजाघर से गोदौलिया तक फैली सड़कें इस समय किसी आधुनिक शहर की छवि नहीं, बल्कि एक ऐसे नगर की पीड़ा बयान कर रही हैं जिसे विकास के नाम पर बेड़ियों में जकड़ दिया गया है। रोप-वे जी हां यह वही परियोजना जिसे भविष्य का काशी मॉडल बताया जा रहा था, वही आज आम काशीवासी के गुस्से, अव्यवस्था और अघोषित यातायात आपातकाल की वजह बन गया है। जिस शहर में टोटो-ऑटो 20 से 30 रुपये में लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचा देता है, उसी शहर में 40 रुपये से अधिक किराए वाला रोप-वे जनता पर ‘सुविधा’ के नाम पर थोपा जा रहा है। जनता का कहना है कि जब उतना ही समय, उतना ही रास्ता और उससे दोगुना किराया देना पड़े, तो भाड़ में जाए ऐसा रोप-वे!

काशी की सड़कें पिछले एक सप्ताह से ऐसे हांफ रही हैं मानो उन पर किसी ने अचानक भारी भरकम ताम्रधातु का बोझ डाल दिया हो। गिरजाघर चौराहे के पास रोप-वे स्टेशन निर्माण ने पूरे इलाके को एक ऐसे जाल में बदल दिया है जिसमें जनता फंसी हुई है और रास्ते बंद कर दिए गए हैं। सरकार कह रही है यह विकास है, जनता पूछ रही है किसके लिए?

रोप-वे स्टेशन ने गिरजाघर चौराहा किया सील, 18 दिसंबर तक जनता के लिए नो-एंट्री

अपर पुलिस उपायुक्त (यातायात) द्वारा जारी एडवाइजरी के अनुसार 18 नवंबर से 18 दिसंबर तक गिरजाघर चौराहे को आम जनता के वाहनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया है। शहर का सबसे व्यस्त, सबसे जुड़ा, सबसे महत्वपूर्ण मार्ग अचानक शून्य कर दिया गया। रेवड़ी तालाब, बेनियाबाग, गोदौलिया और नई सड़क… चारों दिशाओं से आने वाला ट्रैफिक रोक दिया गया। अब जनता के लिए कौन से रास्ते खुले हैं? रेवड़ी तालाब से चारपहिया वाहन नहीं जाएंगे, उन्हें नीमामाई की ओर घुमाया गया। दोपहिया तीनपहिया केवल विजयवीर हनुमान मंदिर तक जायेंगे। सीता रसोई से वाहन वापस नहीं लौट सकेंगे, उन्हें लक्सा, मजदा पार्किंग की ओर मोड़ा जाएगा। बेनियाबाग से गिरजाघर जाने पर पूर्णतः प्रतिबंध,सीगोदौलिया से सीधा मार्ग बंद, जंगमवाड़ी रोड की ओर मजबूरन मोड़। लक्सा से आने वाली गाड़ियां, मजदा पार्किंग की ओर डायवर्ट। पूरा शहर डायवर्ट है, पर जनता का धैर्य सीधे शब्दों में डायवर्ट नहीं हो पा रहा।

रोप-वे आवश्यकता’ या ‘अनावश्यक खतरा?

काशी के लोगों की सबसे बड़ी आपत्ति सिर्फ किराए पर नहीं है, बल्कि जोखिम पर है। यह बात सड़क के स्तर पर समझी जाए ऑटो, टोटो दुर्घटना में चोट लग सकती है। रोप-वे दुर्घटना में… जान भी जा सकती है। यह जनता का डर नहीं, जनता का तर्क है। क्योंकि भारत में सार्वजनिक परिवहन के रखरखाव और सुरक्षा का रिकॉर्ड कोई ऐसा नहीं कि लोग आंख बंद कर भरोसा कर लें। नेशनल हाईवे लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड द्वारा भारी आयरन स्ट्रक्चर लगाए जा रहे हैं, और जमीन पर निर्माण का दबाव इतना है कि सड़कें सामान्य दिनों में भी जाम से जूझती हैं। यहां तो पूरा मार्ग कट ऑफ कर दिया गया है।

ऑटो, टोटो, रोप-वे किसे चुनें, सरकार का विकल्प या जनता का अनुभव?

ऑटो, टोटो किराया 20 से 30 रुपये उपलब्धता हर गली, हर मोड़ दुर्घटना में बचाव की संभावना उच्च यात्रा समय तय रूट का ट्रैफिक बेस्ट। रोप-वे किराया 40 रुपये से अधिक उपलब्धता स्टेशन पर निर्भर, दुर्घटना में बचाव की संभावना अत्यंत कम, यात्रा समय मौसम और तकनीकी स्थिति पर निर्भर लोग इसलिए कह रहे कि
कौन मूर्ख दोगुना पैसा दे कर दोगुना खतरा लेगा?

रोप-वे पर्यटन को फायदा या नागरिकों को नुकसान

सरकारी तर्क मानें तो विदेशी और देशी पर्यटक तेजी से गोदौलिया पहुंच सकेंगे। ट्रैफिक कम होगा, काशी मॉडर्न बनेगी। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि स्थानीय नागरिकों को रोजमर्रा का सफर दुश्वार। महीनों तक सड़कें ब्लॉक, दुकानदारों की बिक्री आधी, कई क्षेत्रों में पैदल चलना भी कठिन। क्या काशी सिर्फ पर्यटकों के लिए बनाई जा रही है।

गिरजाघर और आसपास के व्यापार का अर्थशास्त्र बिगड़ा

गिरजाघर से गोदौलिया और बेनियाबाग तक के दुकानदारों ने लगातार शिकायत की है कि ग्राहक कम हो गए। माल नहीं पहुंच पा रहा, डिलीवरी बाधित, कामगार देर से पहुंचते हैं। बिक्री 30 से 40 फीसदी तक गिर गई। जिस पर काशी की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था टिकी है वो व्यापार ठहर गया है। सरकार की ओर से न मुआवजा, न राहत, न विकल्प सिर्फ चेतावनी विकल्प मार्गों का उपयोग करें। व्यापारियों का कहना है कि सुविधा का नाम लेकर जो बंदिशें लगाई जा रही हैं, उससे व्यापार चौपट है।

ट्रैफिक पुलिस मजबूर, बेबस या आदेशों की मारी

अपर डीसीपी यातायात ने जितनी लंबी एडवाइजरी जारी की है, उससे कहीं लंबी काशीवासियों की कठिनाइयों की सूची है। ट्रैफिक पुलिस की स्थिति यह है कि लक्सा में जाम, मजदा पार्किंग में जाम, नई सड़क में जाम, जंगमवाड़ी रोड में जाम जहां देखो जाम ही जाम।पुलिस कहती है कि निर्माण कंपनी को जगह चाहिए, हम क्या करें? जनता का कहना है कि हमें भी जीने चलने की जगह चाहिए, हम क्या करें?

रोप-वे अभी शुरू भी नहीं हुआ, सवाल पहले ही खड़े

काशी में कोई भी विकास परियोजना चर्चा के बिना नहीं चलती, यह शहर सवाल पूछने की परंपरा रखता है।
पर रोप-वे पर सवाल कुछ ज्यादा हैं।

1. सुरक्षा पहले या पर्यटन?
2. क्या काशी के लोगों से राय ली गई?
3. किराया दोगुना क्यों?
4. पूरा इलाका महीनों तक बंद क्यों?
5. सड़कें रोप-वे के बाद क्या और भी संकरी बनेंगी?
6. काशी की पहचान उसका मार्ग, उसका रास्ता, उसकी खुली उपलब्धता है क्या यह खत्म की जा रही है?

विकास का मॉडल सवालों के घेरे में

काशी में पिछले कुछ वर्षों में कॉरिडोर, पुल, फ्लाईओवर, चौड़ीकरण, स्मार्ट सड़कें सब कुछ तेजी से बना। हर बार जनता ने यही सवाल किया कि ये सुविधाएं हमारे लिए हैं या हमसे छीनकर बनाई जा रही हैं। रोप-वे के साथ भी यही सवाल उठ रहा है।

जनता की आवाज

1. दुकानदार रामचंद्र का कहना है कि साहब, जबसे यह लोहे का जंगल लगा है, ग्राहक आधे हो गए। हम विकास नहीं रोक रहे, पर हमारा पेट भी भरना चाहिए।
2. बेनियाबाग निवासी माया देवी का कहना है कि
स्कूल जाने में 20 मिनट लगता था, अब 50 मिनट लगते हैं। यह कौन सा विकास है?
3. ऑटो चालकों का कहना है कि रोप-वे शुरू होगा तो हमारी रोजी पर असर पड़ेगा। सरकार कहती है पर्यटक बढ़ेंगे हमारे लिए क्या बढ़ेगा?
4. एक यात्री ने कहा कि ऊपर से गिरा तो कौन गारंटी लेगा, सड़क का एक्सीडेंट में आदमी बच भी जाता है। रोप-वे गिरा तो पूरा काशी रोएगा।

सार्वजनिक सुरक्षा की चिंता नजरअंदाज क्यों?

दुनिया भर में रोप-वे दुर्घटनाओं का रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं है। मौसम बिगड़ा, तकनीकी खराबी, केबल ढीली, बिजली फेल ये सभी सामान्य घटनाएं हैं। काशी जैसे धार्मिक और घनी आबादी वाले शहर में यह खतरा कई गुना अधिक है। फिर भी सुरक्षा पर कोई सार्वजनिक रिपोर्ट नहीं सिर्फ आश्वासन, महज कागजी बयानों में सुरक्षा। काशीवासी विकास के खिलाफ नहीं हैं, वे सिर्फ यह पूछ रहे हैं कि विकास किसकी कीमत पर? एक महीने तक चौराहा बंद, व्यवसाय चौपट, काशी की धड़कन ठप, दोगुना किराया, दोगुना जोखिम और समस्या का ठीकरा जनता के सिर पर। यह सब कुछ देखकर जनता कह रही है कि भाड़ में जाए ऐसा रोप-वे!क्योंकि विकास वह है जो जीवन को सरल बनाता है, और वर्तमान में काशी की हालत है सड़कें बंद, तनाव बढ़ा, तकलीफें बढ़ीं और सवालों का पहाड़ खड़ा।

क्या रोप-वे कभी राहत देगा या हमेशा बोझ ही बना रहेगा? जब तक जवाब नहीं मिलता, काशी का दिल यही कहेगारोप-वे नहीं चाहिए, सहज रास्ता चाहिए।

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