मोकामाबिहार

ऊपर से फिट-फाट, भीतर मोकामा घाट: औद्योगिक नगरी से ‘बाहुबल’ की राजधानी बन चुका मोकामा, रोजगार की जगह अब पंडे और पिस्तौल

 

● रबी जैसी जमीन, रबी जैसा मिजाज पर अब सूख चुकी है उम्मीद की फसल

● जहां कभी उद्योगों की धुआं उड़ती थी, वहां अब गूंजती हैं गोलियां

● नेहरू के ‘उद्योग मंदिर’ से सत्ता के ‘धार्मिक मंदिरों’ तक की यात्रा

● मोकामा टाल से मोकामा ताल पानी में डूबता इलाका, विकास में डूबा सपना

● राजेंद्र सेतु की छाया में मर गया औद्योगिक बिहार

● जहां दिनकर लिखते थे, वहां अब ‘दुलार बनाम अनंत’ की चलती हैं गोलियां

● सरकारों का नया विकास मॉडल पंडे-पुरोहितों के लिए रोजगार, मजदूरों के लिए मौनव्रत

● जात-पात के कोढ़ में धर्म का खाज और मोकामा के आत्मा की हत्या

 

प्रेम कुमार मणि

 

पटना। कभी औद्योगिक चमक से जगमगाने वाला मोकामा आज अपनी ही राख में झुलस रहा है। यह वही इलाका है, जो कभी बिहार की औद्योगिक चेतना का धड़कता दिल था। गंगा के किनारे कारखानों की भट्ठियां जलती थीं, ट्रक-ट्रालियों की आवाजें मजदूरों की सुबह जगाती थी और डॉकयार्ड पर जहाजों के सीटी बजते थे। पर अब वही इलाका, जहां मशीनों की खनक सुनाई देती थी, वहां गोलियों की आवाज गूंजती है। ऊपर से चमकदार सड़कों, मंदिरों और घोषणाओं के शोर से भले मोकामा फिट-फाट लगे पर भीतर से यह इलाका न केवल आर्थिक रूप से ढह चुका है, बल्कि सामाजिक और नैतिक रूप से भी खोखला हो गया है। आज मोकामा उस त्रासदी का नाम है, जहां उद्योगों की जगह अपराधियों ने फैक्ट्री लगा ली, और मजदूरों की जगह बाहुबली और पुजारी भर्ती हो गए। जहां नेहरू के ‘उद्योग मंदिर’ की परिकल्पना थी, वहां अब तिरुपति जैसा मंदिर बनाने की योजना है। मशीनों की जगह मूर्तियां और रोजगार की जगह भक्ति का कारोबार।
गंगा के किनारे बसा यह इलाका एक समय बेगूसराय, मोकामा और हाथीदह की औद्योगिक तिकड़ी में अपनी पहचान रखता था। आज यह बिहार की विफल औद्योगिक नीति, राजनीतिक अपराधीकरण और धार्मिक ठेकेदारी का जीता-जागता प्रतीक है। मोकामा अब भूगोल नहीं, एक प्रतीक बन चुका है। उस बिहार का प्रतीक जो कभी उद्योगों का केंद्र था और आज बाहुबल, जाति और धर्म की राजनीति का चरम उदाहरण है। यह वही धरती है जहां कभी दिनकर ने ‘संघर्ष’ का काव्य रचा, श्रीकृष्ण सिंह ने औद्योगिक बिहार की नींव रखी, और तारकेश्वरी सिन्हा जैसी महिला ने राजनीति में चेतना का स्वर उठाया। पर आज उसी धरती पर राजनीति का स्वरूप इतना बदल चुका है कि यहां विचार नहीं, हथियार बोलते हैं।

रबी जैसी जमीन, रबी जैसा मिजाज सूख चुकी है उम्मीद की फसल

पटना जिले का पूरबी छोर गंगा किनारे बसा वह इलाका, जिसे लोग मोकामा टाल कहते हैं। यह टाल, यानी विशाल जलभराव क्षेत्र, जो हर साल बरसात में गंगा के साथ मिलकर गांवों को जलमग्न कर देता है। हाथीदह जैसे इलाकों की कहावत है यहां हाथी भी डूब सकता है। ऐसी जमीन में खरीफ की फसल की कल्पना बेमानी है, पर रबी में धरती जान लेती है। लोगों का मिजाज भी कुछ वैसा ही रहा कठिन, पर मेहनती। यहां की मिट्टी में संघर्ष है, पर यह संघर्ष अब विकास नहीं, जीवित रहने की जद्दोजहद में बदल चुका है। एक समय था जब मोकामा बिहार के औद्योगिक नक्शे पर चमकता नाम था। यहां जलमार्ग से माल आता था, डॉक पर जहाज ठहरते थे। बाटा शू फैक्ट्री, ब्रिटानिया, भारत बैगन, मैकडोनाल्ड ये सब मोकामा की पहचान हुआ करते थे। बगल में नाजरेथ हॉस्पिटल मिशनरी सेवा का प्रतीक था। आसपास का बेगूसराय बिहार का मास्को कहलाता था। आज इन नामों की जगह अपराधी सरगनाओं के नाम गूंजते हैं। वही इलाका जो कभी दिनकर, श्रीकृष्ण सिंह और तारकेश्वरी सिन्हा जैसी विभूतियों की धरती था, अब बाहुबलियों की दहशत से थर्राता है।

नेहरू के ‘उद्योग मंदिर’ से सत्ता के मंदिरों तक की यात्रा

1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था। हमारे कारखाने ही हमारे आधुनिक मंदिर होंगे। उनका सपना था कि उद्योगों से समाज समृद्ध होगा, मजदूरों से लोकतंत्र मजबूत होगा। आज की राजनीति ने इस सोच को उलट दिया है। सरकारें अब कारखाने नहीं, मंदिर बनवाने में गर्व महसूस करती हैं। मोकामा में अब तिरुपति बालाजी जैसा मंदिर बनाने की योजना स्वीकृत की जा चुकी है। यानी जहां पहले लोगों को रोजगार मिलता था, वहां अब श्रद्धालु ‘दानपात्र’ में नोट डालेंगे और सरकार इसे विकास कहेगी।

मोकामा टाल से मोकामा ताल पानी में डूबता इलाका

हर साल की बाढ़ इस इलाके के जीवन को निगलती रही, पर सरकारें कभी स्थाई समाधान नहीं दे पाईं।
औद्योगिक इकाइयां बंद हुई, खेत पानी में डूबे, पर नए अवसर नहीं बने। जो लोग कभी मशीनें चलाते थे, आज या तो प्रवासी मजदूर हैं या अपराधी गिरोहों के लिए काम करते हैं। मोकामा टाल की तरह यहां की आत्मा भी डूब चुकी है।

राजेंद्र सेतु की छाया में मर गया औद्योगिक बिहार

गंगा पर बना राजेंद्र सेतु बिहार की औद्योगिक प्रगति का प्रतीक था। इस पुल ने बेगूसराय, मोकामा और उत्तर बिहार को जोड़ा था। अब यह पुल भी प्रतीक मात्र रह गया है। पुल के नीचे से अब मजदूरों की नहीं, अपराधियों की नाव गुजरती है। बेगूसराय के सिमरिया से लेकर मोकामा तक कभी जो इलाका समाजवादी और वाम विचारधारा से सराबोर था, आज वहां सांप्रदायिकता और बाहुबल के गठजोड़ का बोलबाला है।

साहित्य और विचार की भूमि अब बंदूक और बदले की भूमि बन चुकी

कल तक यह इलाका तार्किकता, वाद-विवाद और नेतृत्व का केंद्र था। आज यहां का सबसे चर्चित संवाद है कौन किसे मारा? विगत दिनों मोकामा के बाहुबली दुलारचंद यादव की हत्या उसी इलाके के बाहुबली अनंत सिंह के लोगों ने कर दी। यह कोई पहला या आखिरी प्रकरण नहीं बल्कि मोकामा के नए यथार्थ की पहचान है। हत्या के बाद मोकामा की जनता कुछ दिनों तक सन्नाटे में रहेगी, फिर सब सामान्य हो जाएगा।
क्योंकि मौत अब खबर नहीं, दिनचर्या बन चुकी है।

पंडे-पुरोहितों के लिए रोजगार, मजदूरों के लिए मौनव्रत

राज्य सरकारें अब रोजगार नहीं, भक्ति बांट रही हैं। जहां फैक्ट्री बंद हुई वहां मंदिर खुल रहे हैं। मजदूरों को हटाया गया, पुजारियों की भर्ती हो रही है। कहा जा रहा है कि सिमरिया घाट को बनारस की तरह धार्मिक नगरी में बदला जा रहा है। इस सांस्कृतिक अभियान के पीछे कौन-सी अर्थव्यवस्था है। जिसमें पंडे-पुरोहितों के रोजगार का सृजन होता है, और मजदूरों के हिस्से में विस्थापन आता है। राजनेता और पंडित दोनों का रोजगार सुरक्षित है, जनता का नहीं।

मोकामा के आत्मा की हत्या

मोकामा की राजनीति जात-पात और धर्म के मेल का विषैला मिश्रण बन चुकी है। एक ओर जाति आधारित बाहुबली राजनीति है, वहीं दूसरी ओर धर्म आधारित भावनात्मक उन्माद। इस खेल में जनता का विवेक मारा जा चुका है। वोटरों के लिए अब पांच किलो राशन काफी है। मीडिया भी वही बजा रहा है जो सत्ता सुनना चाहती है जय श्रीराम या हर हर गंगे। इस बीच मोकामा घाट की मिट्टी रो रही है, क्योंकि उसे याद है वह दौर जब विचार पलते थे, न कि हथियार।

* मोकामा और बेगूसराय क्षेत्र कभी औद्योगिक और राजनीतिक चेतना का केंद्र रहा।
* बाटा, ब्रिटानिया, भारत बैगन जैसी फैक्ट्रियां बंद होने के बाद इलाका बेरोजगारी और अपराध का गढ़ बन गया।
* सरकार अब उद्योगों की जगह मंदिर निर्माण पर ध्यान दे रही है हाल में तिरुपति बालाजी जैसा मंदिर प्रस्तावित।
* बाहुबली राजनीति ने जनता की लोकतांत्रिक चेतना को कुचल दिया है।
* ऊपर से फिट-फाट, भीतर मोकामा घाट यह कहावत अब सामाजिक सत्य बन चुकी है।
* बाहुबली दुलारचंद यादव की हत्या, अनंत सिंह गुट पर आरोप।
* मोकामा की सामाजिक संरचना में अब जाति, धर्म और अपराध तीनों का घाल मेल शासन कर रहा।

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