चंदौली में स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त, घूसखोर सीएमओ वाइ के राय घुस लेने व्यस्त
चकिया में ‘डायग्नोस्टिक माफिया’ का खुला खेल सीएमओ की छत्रछाया में पनपता फर्जी अस्पताल

● चंदौली में स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त,घूसखोर सीएमओ वाइ के राय घुस लेने व्यस्त
● चकिया में ‘डायग्नोस्टिक माफिया’ का खुला खेल
सीएमओ की छत्रछाया में पनपता फर्जी अस्पताल
● बिना डॉक्टर, बिना लाइसेंस, खुलेआम रिपोर्ट का कारोबार
● पीएचसी के सामने ही कानून की धज्जियां, स्वास्थ्य विभाग बना मूकदर्शक
● रिपोर्ट पर डॉक्टर का नाम, सेंटर पर डॉक्टर गायब
● पीसीपीएनडीटी एक्ट की खुलेआम अवहेलना, भ्रूण जांच का गुप्त धंधा
● बिना पंजीकरण, बिना मानक, बिना जवाबदेही चल रहा ‘केयर डायग्नोस्टिक’
● स्वास्थ्य अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल नामुमकिन
● गरीब मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़, गलत रिपोर्ट = गलत इलाज
● शिकायतें ढेरों, कार्रवाई शून्य क्यों चुप है चंदौली प्रशासन
● नशामुक्ति और स्वास्थ्य सुधार के नारों के बीच मेडिकल माफिया बेलगाम
चंदौली। प्रदेश सरकार एक ओर स्वास्थ्य सुधार, मातृ-शिशु सुरक्षा और ‘नशा मुक्त प्रदेश’ जैसे अभियानों का ढोल पीट रही है, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रही है। चंदौली जनपद के चकिया क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, वह न सिर्फ सरकारी दावों की पोल खोलता है, बल्कि यह भी बताता है कि स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे माफिया, दलाल और अफसरशाही की मिलीभगत का अड्डा बन चुकी है।
चकिया में कथित तौर पर फर्जी अस्पतालों, अवैध डायग्नोस्टिक सेंटरों और बिना लाइसेंस चल रहे क्लिनिकों का ऐसा मकड़जाल फैला है, जिसमें हर दिन सैकड़ों मरीज उलझाए जा रहे हैं। जांच होती है, रिपोर्ट बनती है, पैसा वसूला जाता है लेकिन कानून, मानक और चिकित्सा नैतिकता कहीं नजर नहीं आती।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि यह पूरा कथित अवैध मेडिकल कारोबार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चकिया के ठीक सामने फल-फूल रहा है। यानी जहां सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की उपस्थिति सबसे ज्यादा होनी चाहिए, वहीं कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मुख्य
चिकित्साधिकारी बे-ईमान वाई के राय धृतराष्ट्र बन कर बैठा हुआ है,सब जगह से महीना लेकर कथरी ओढ़ के घी पी रहा है।
स्थानीय लोगों, मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों के आरोप अगर सही है और परिस्थितियां उन्हीं की ओर इशारा कर रही हैं तो यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि संगठित मेडिकल रैकेट का बन जाता है।
‘केयर डायग्नोस्टिक सेंटर’ इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा है। आरोप हैं कि यहां न तो कोई योग्य डॉक्टर स्थायी रूप से मौजूद रहता है, न ही मशीनों और जांच की वैधता स्पष्ट है। लेकिन जांच रिपोर्टों पर डॉक्टर के नाम और हस्ताक्षर धड़ल्ले से लगाए जा रहे हैं। यह सवाल अब टलने वाला नहीं है कि क्या चकिया में इलाज नहीं, सिर्फ रिपोर्टों का कारोबार चल रहा है और अगर हां, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
बिना पंजीकरण के चल रहे डायग्नोस्टिक सेंटर
चकिया क्षेत्र में कथित तौर पर संचालित दर्जनों डायग्नोस्टिक सेंटर बिना पंजीकरण, बिना लाइसेंस और बिना योग्य डॉक्टरों के काम कर रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि कई सेंटर सिर्फ नाम के लिए पंजीकृत हैं, जबकि हकीकत में न तो नियमों का पालन होता है, न ही निरीक्षण। चकिया क्षेत्र में कथित रूप से संचालित फर्जी डायग्नोस्टिक सेंटरों का मामला अब सिर्फ अनियमितता या लापरवाही तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक सुनियोजित, संरक्षित और मुनाफाखोर मेडिकल रैकेट का रूप ले चुका है, जो सीधे तौर पर गरीब, ग्रामीण और अशिक्षित मरीजों की जिंदगी से खेल रहा है। सीएमओ वाई के राय ने जनपद में स्वास्थ्य सेवाओं का मजाक बना दिया है।इसे बस एक ही काम आता है बस घुस लेना।
इलाज नहीं, डर और रिपोर्ट का कारोबार
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि चकिया में कई डायग्नोस्टिक सेंटर बीमारी के इलाज का नहीं, बल्कि डर पैदा कर रिपोर्ट बेचने का धंधा कर रहे हैं। मामूली जांचों में गंभीर बीमारियों की आशंका लिख दी जाती है, ताकि मरीज बार-बार जांच कराए, अनावश्यक दवाएं खरीदे और निजी क्लिनिकों व अस्पतालों के चक्कर लगाए। इस पूरे खेल में डायग्नोस्टिक सेंटर, कथित डॉक्टर, दवा दुकानदार और कुछ निजी अस्पताल एक ही श्रृंखला की कड़ियां माने जा रहे हैं।सीएमओ वाई के राय डाक्टर नही लोग डकैत भी कहने लगे है।
केयर डायग्नोस्टिक सिस्टम की नाक के नीचे चल रहा खेल
सबसे ज्यादा आरोप प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चकिया के ठीक सामने स्थित केयर डायग्नोस्टिक सेंटर पर लगे हैं। सवाल यह नहीं है कि यह सेंटर नियमों का पालन कर रहा है या नहीं, सवाल यह है कि अगर सब कुछ वैध है, तो डॉक्टर मौके पर क्यों नहीं मिलते? स्थानीय लोगों का कहना है कि सेंटर खुला रहता है, जांचें होती हैं, रिपोर्टें बांटी जाती हैं, लेकिन डॉक्टर कभी दिखाई नहीं देते। रिपोर्ट पर जिस डॉक्टर का नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर छपा होता है, वह जमीनी हकीकत में नदारद रहता है।
टेक्नीशियन चला रहे मशीन, डॉक्टर चला रहे मुहर
सूत्रों के अनुसार, कई बार अल्ट्रासाउंड और अन्य संवेदनशील जांचें सिर्फ टेक्नीशियन के भरोसे कराई जाती हैं। डॉक्टर की भूमिका सिर्फ नाम देने की, रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने की और महीने के अंत में हिस्सा लेने की रह जाती है। यह न केवल मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन है, बल्कि सीधे-सीधे आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है।
पीसीपीएनडीटी एक्ट कागजों में सख्ती, जमीन पर मजाक
भारत में पीसीपीएनडीटी एक्ट को भ्रूण लिंग जांच रोकने के लिए सबसे सख्त कानूनों में गिना जाता है। लेकिन चकिया में यह कानून कागजों तक सीमित नजर आता है। शिकायतें हैं कि कुछ सेंटरों पर अवैध सोनोग्राफी होती है, संकेतों में भ्रूण से जुड़ी जानकारी दी जाती है, और इसके लिए मोटी रकम ली जाती है। अगर यह सच है, तो सवाल उठता है कि पीसीपीएनडीटी की जिला स्तरीय निगरानी समिति क्या कर रही है।
सीएमओ कार्यालय की जिम्मेदारी आखिर किसने तय की
स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि निरीक्षण की सूचना पहले से दे दी जाती है, निरीक्षण के दिन डॉक्टर अचानक प्रकट हो जाते हैं, रजिस्टर अपडेट कर दिए जाते हैं और टीम के जाते ही सब कुछ पहले जैसा। यानी निरीक्षण नहीं, औपचारिकता निभाई जाती है।
कमीशन और संरक्षण का आरोप
सूत्रों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर अवैध काम बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव ही नहीं। हर सेंटर से तय रकम ऊपर तक जाती है, शिकायत करने वालों को डराया जाता है और कई बार झूठे मुकदमों की धमकी दी जाती है। यही वजह है कि ग्रामीण और गरीब मरीज आवाज़ उठाने से डरते हैं।
गलत रिपोर्ट, गलत इलाज, जान का खतरा
विशेषज्ञ चिकित्सकों का कहना है कि गलत अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट गर्भवती महिला के लिए जानलेवा हो सकती है,
कैंसर, टीबी, हार्ट डिजीज जैसी बीमारियों में गलत जांच रिपोर्ट मौत को न्योता देती है। यह सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
सीएमओ की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल
सबसे गंभीर सवाल मुख्य चिकित्सा अधिकारी चंदौली की भूमिका को लेकर उठ रहा है। क्या सीएमओ कार्यालय को इन सेंटरों की जानकारी नहीं, क्या पंजीकरण की सूची सार्वजनिक है। कितने सेंटर वैध हैं, कितने अवैध इसका जवाब क्यों नहीं। यदि जानकारी है और फिर भी कार्रवाई नहीं हो रही, तो यह मिलीभगत का संकेत है। अगर जानकारी नहीं है, तो यह घोर प्रशासनिक विफलता है।
सरकारी अस्पताल के सामने निजी लूट
विडंबना देखिए कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता और लंबी कतारें हैं, जबकि सामने अवैध निजी सेंटर तेजी से फल-फूल रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है, ताकि निजी मुनाफाखोर मजबूत हों।
प्रशासन की चुप्पी, सवालों के घेरे में
कोई संयुक्त छापा नहीं, कोई सेंटर सील नहीं, कोई सार्वजनिक जांच रिपोर्ट नहीं। अगर आरोप झूठे हैं, तो प्रशासन जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं करता और अगर सही हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं होती। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने साफ कहा है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे जन आंदोलन और न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता अपनाएंगे। यह मामला अब सिर्फ चकिया का नहीं, बल्कि पूरे चंदौली जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की साख से जुड़ गया है।
* चकिया में अवैध डायग्नोस्टिक सेंटरों का संगठित नेटवर्क
* पीएचसी के सामने खुलेआम फर्जीवाड़ा
डॉक्टर सिर्फ कागजों पर, जांच टेक्नीशियन के भरोसे
* पीसीपीएनडीटी एक्ट का संभावित उल्लंघन
* स्वास्थ्य विभाग और सीएमओ की भूमिका संदिग्ध
* शिकायतों के बावजूद कार्रवाई शून्य
* गरीब मरीज सबसे ज्यादा शिकार
* जिला स्तरीय जांच की तत्काल जरूरत




