चन्दौली

चन्दौली सांसद वीरेंद्र सिंह के इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल का कातिलों सरीखा किरदार, पूरी तरह जल्लाद की तरह है, यहां के डॉक्टरों का व्यवहार

● चन्दौली सांसद वीरेंद्र सिंह के इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल का कातिलों सरीखा किरदार, पूरी तरह जल्लाद की तरह है, यहां के डॉक्टरों का व्यवहार

● ऑपरेशन के बाद मरीज की मौत, अस्पताल में मचा भयंकर हंगामा

● सांसद परिवार के अस्पताल पर लापरवाही का आरोप, प्रशासन की आंखों में ‘रतौंधी

● अस्पताल प्रशासन बेसमेंट का विधि विरुद्ध तरीके से करता है प्रयोग

● पार्किंग की सुविधा नदारद सड़को पर लगता है जाम आम जनता रहती है परेशान

● आये दिन इस अस्पताल में होता रहता झाम, बेहद घिनौना है यहाँ के डाक्टरों का काम

● पूर्व में अस्पताल का एमडी डॉक्टर अभिषेक विक्रम सिंह ड्रग्स व छमिया में साथ हुआ था गोवा में गिरफ्तार

 

माया रानी अग्रहरि एडवोकेट

वाराणसी। सड़कों पर जाम और अस्पतालों में मौतें दोनों अब प्रशासनिक सामान्यता बन चुके हैं। शहर का स्वास्थ्य तंत्र अब इलाज नहीं, अव्यवस्था, मनमानी और रसूख की खेती बन चुका है। इसका सबसे ताजा उदाहरण कैंट थाना क्षेत्र के भोजूबीर-महावीर मंदिर मार्ग स्थित इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल में सामने आया, जहां हर्निया ऑपरेशन के बाद एक मरीज की मौत ने अस्पताल प्रशासन के दावों और सरकारी निगरानी तंत्र की पोल खोल दी। चोलापुर थाना क्षेत्र के टिसौरा गांव निवासी कमलेश सिंह (47 वर्ष) शुक्रवार 12 दिसंबर 2025 को अस्पताल से हर्निया ऑपरेशन के बाद डिस्चार्ज किए गए थे। लेकिन शनिवार शाम अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। परिजन उन्हें भागते-भागते दोबारा उसी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उन्हें यह कहकर घर भेजा गया था कि सब कुछ ठीक है। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में न तो कोई डॉक्टर समय पर मिला, न इमरजेंसी ने तुरंत रिस्पॉन्ड किया। मरीज तड़पता रहा, लेकिन फॉर्म और फीस का चक्कर पहले निपटाया गया। कुछ ही देर में कमलेश सिंह की मौत हो गई। यह कोई पहली घटना नहीं। इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल का नाम पहले भी रोगियों और परिजनों से दुर्व्यवहार, गलत बिलिंग और स्टाफ की मनमानी को लेकर चर्चा में रहा है। लेकिन चूंकि यह अस्पताल चंदौली के सांसद वीरेंद्र सिंह के परिवार का है और इसे उनका चिकित्सक पुत्र संचालित करता है, इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद हर बार ठंडी पड़ जाती है। वाराणसी के स्वास्थ्य ढांचे की यह विडंबना है कि जहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर मिलना मुश्किल है, वहीं निजी अस्पतालों में ‘डॉक्टर’ पैसे से पहले मरीज को देखते हैं। कमलेश सिंह की मौत सिर्फ एक मेडिकल त्रुटि नहीं, बल्कि उस सत्ता-संरक्षित सिस्टम का परिणाम है जो रोगी की जान को राजनीतिक रिश्ते के नीचे रखता है। हंगामा, चीखें और पुलिस की गाड़ियों की आवाज ने शनिवार रात टैगोर टाउन इलाके को दहला दिया। परिजनों का कहना था कि अगर समय रहते इलाज मिलता तो कमलेश को बचाया जा सकता था। मौके पर पहुंची कैंट थाना पुलिस ने पहले की तरह शांत रहिए, तहरीर दीजिए, जांच होगी का रटा-रटाया वाक्य दोहराया और चली गई। लेकिन क्या इस बार भी जांच का वही नतीजा निकलेगा लापरवाही नहीं पाई गई।

अस्पताल की हकीकत बेसमेंट में इमरजेंसी, सड़क पर पार्किंग

इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि शहर में स्वास्थ्य नियमन की स्थिति क्या है। यहां पार्किंग नहीं, एम्बुलेंस सड़क पर और इमरजेंसी बेसमेंट में संचालित होती है। जो भी स्थानीय व्यक्ति उस इलाके से गुजरता है, उसे रोज जाम का सामना करना पड़ता है। बेसमेंट में इमरजेंसी व जांच सुविधा का संचालन पूरी तरह अवैध है, क्योंकि फायर सेफ्टी, वेंटिलेशन और मरीजों की सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं होती। लेकिन जिला प्रशासन, नगर निगम और वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) तीनों इस अवैधता को ‘अदृश्य’ रूप से स्वीकार किए हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल के संचालक और स्टाफ का रवैया अहंकारी और अभद्र है। किसी बात पर आपत्ति जताने पर मरीजों के परिजनों को धमका दिया जाता है। कुछ कर्मचारियों की शिकायतों पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। यह सांसद का अस्पताल है यह वाक्य ही शिकायत का ‘समाधान’ बन जाता है।

मरीज की मौत के बाद हंगामा और पुलिस का औपचारिक हस्तक्षेप

मौत की खबर फैलते ही परिजनों और ग्रामीणों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा किया। कुछ लोगों ने अस्पताल प्रशासन पर जानबूझकर इलाज में देरी का आरोप लगाया। परिजनों का कहना था कि डॉक्टर को बुलाने के लिए हमें बार-बार काउंटर से मिन्नतें करनी पड़ीं, लेकिन कोई नहीं आया। जब तक डॉक्टर पहुंचे, तब तक सब खत्म हो गया। अस्पताल प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि मरीज की हालत पहले से गंभीर थी। लेकिन सवाल यह उठता है अगर गंभीर थी तो डिस्चार्ज क्यों किया गया। हालांकि कैंट थाना प्रभारी शिवाकांत मिश्रा मौके पर पहुंचे और हंगामा शांत कराया। उन्होंने कहा कि तहरीर मिलने पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। लेकिन यह वही थाना प्रभारी हैं जो कुछ दिन पहले वायरल वीडियो में सड़क किनारे गर्म कपड़े बेचने वाले गरीब दुकानदारों को डंडे से खदेड़ते नजर आए थे। उन्हें सड़क पर बैठा गरीब दुकानदार तो अतिक्रमण दिखता है, पर अस्पताल के सामने रोज का जाम नहीं।

प्रशासन की रतौंधी सत्ता का अस्पताल, जनता का गला

इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि प्रशासनिक तंत्र की आंखें चुनिंदा जगहों पर ही खुलती हैं। अगर गरीब ठेला लगाता है तो बुलडोजर चल पड़ता है, लेकिन सांसद परिवार का अस्पताल सड़क पर जाम फैलाए, बेसमेंट में इमरजेंसी चलाए, तो अधिकारी ‘नियमानुसार जांच’ की आड़ में सो जाते हैं। वाराणसी विकास प्राधिकरण का यह क्षेत्र अधिसूचित क्षेत्र में आता है। प्रश्न यह है कि बिना मानचित्र स्वीकृति के बेसमेंट में मरीज भर्ती की अनुमति कैसे दी गई। नगर निगम ने कितनी बार नोटिस भेजा और जिला प्रशासन ने आखिरी निरीक्षण कब किया। उत्तर किसी के पास नहीं, क्योंकि हर सवाल के पीछे एक नाम है सांसद का अस्पताल का है।

स्वास्थ्य मानक और कानूनी उल्लंघन

भारत में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के तहत किसी भी अस्पताल को निम्न मानकों का पालन करना अनिवार्य है। अलग एम्बुलेंस पार्किंग और इमरजेंसी गेट, ऑक्सीजन, वेंटिलेशन और इमरजेंसी बैकअप की वैध सुविधा। फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट, नगर निगम और विकास प्राधिकरण से निर्माण अनुमति। योग्य चिकित्सकों की ड्यूटी चार्ट और 24×7 ऑन-कॉल सुविधा। सूत्रों की मानें तो इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल में इनमें से अधिकांश मानक कागजों पर पूरे किए गए हैं।
बेसमेंट में चल रही जांच इकाई और इमरजेंसी के पास फायर एग्जिट नहीं है। फायर डिपार्टमेंट से लाइसेंस की स्थिति संदिग्ध है। सीएमओ कार्यालय, जो ऐसे मामलों में निरीक्षण और निलंबन की शक्ति रखता है, वह भी मौन है। कारण सीधा है सांसद के परिवार का नाम आने पर सिस्टम ‘समाधान मोड’ में चला जाता है।

अस्पताल के बाहर जाम जनता के धैर्य की मौत

टैगोर टाउन कालोनी के निवासी बताते हैं कि सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक इस अस्पताल के सामने जाम लगा रहता है। गाड़ियां दोनों पटरी पर खड़ी रहती हैं, और एम्बुलेंस बीच सड़क में रुकी रहती हैं। अस्पताल ने अब तक कोई वैकल्पिक पार्किंग या ट्रैफिक प्लान नहीं बनाया। वहीं नगर निगम ने इसे देखने की कभी जहमत नहीं उठाई। एम्बुलेंस और वाहनों के कारण बच्चों और बुजुर्गों को परेशानी होती है। कई बार एंबुलेंस भी जाम में फंस जाती है। लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी हर बार किसी और पर टाल दी जाती है। यह न सिर्फ ट्रैफिक का सवाल है, बल्कि जनसुरक्षा का प्रश्न है। वाराणसी प्रशासन के लिए जनता का धैर्य शायद फाइलों जितना ही बेकार है।

रसूख की दीवार कानून की ताकत

भली-भांति लोग यह जानते हैं कि कानून और नियम किसके लिए हैं। अगर कोई गरीब रेहड़ी वाला सड़क पर बैठ जाए तो पुलिस और नगर निगम की गाड़ियां तुरंत पहुंचती हैं। लेकिन जब सांसद परिवार का अस्पताल नियमों की धज्जियां उड़ाता है, तो अधिकारियों की आंखों पर कानूनी पट्टी बंध जाती है।

परिजनों की मांग निष्पक्ष जांच और कार्रवाई

कमलेश सिंह के परिजनों ने अब निष्पक्ष जांच और अस्पताल प्रशासन के खिलाफ हत्या की धारा 304 ए आईपीसी में मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। कहा कि जब तक अस्पताल प्रबंधन पर कार्रवाई नहीं होती,
वे अस्पताल के बाहर धरना देंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाराणसी पुलिस इस मामले में उतनी ही तत्परता दिखाएगी जितनी गरीबों के खिलाफ दिखाती है, या यह मामला भी जांच जारी है के हवाले दफन कर दिया जाएगा।

मौत का ठिकाना या इलाज का केंद्र

इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल का यह मामला किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम का आईना है जिसमें रसूखदार सुरक्षित हैं, अधिकारी मौन हैं और जनता असहाय है। वाराणसी की धरती पर जहां हर दूसरे दिन स्मार्ट सिटी के दावे किए जाते हैं, वहीं एक आम नागरिक की मौत सिर्फ अस्पताल की गलती नहीं, बल्कि शासन की विफलता बन चुकी है। जब तक प्रशासन यह स्वीकार नहीं करता कि रसूख से ऊपर कानून होना चाहिए, तब तक हर कमलेश सिंह की मौत राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक निष्क्रियता की सामूहिक साजिश बनी रहेगी।

* मरीज कमलेश सिंह की हर्निया ऑपरेशन के बाद 24 घंटे में मौत
* इमरजेंसी में समय पर इलाज न मिलने का आरोप
* अस्पताल का संचालन सांसद परिवार के चिकित्सक पुत्र द्वारा
* बेसमेंट में अवैध इमरजेंसी और जांच केंद्र
* पार्किंग व्यवस्था शून्य, सड़क पर रोज का जाम
* प्रशासन, वीडीए और नगर निगम की चुप्पी गरीब पर कार्रवाई, रसूखदार पर मेहरबानी
* परिजनों की निष्पक्ष जांच और हत्या की धारा में मुकदमे की मांग
* स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल

यह मौत नहीं, हत्या

कमलेश सिंह जैसे अनगिनत लोग अब आंकड़े बनते जा रहे हैं। इंफिनिटी केयर जैसे अस्पतालों में इलाज नहीं होता है कि यहां जीवित शरीरों से वसूली और मृत देह से माफी का धंधा चलता है। जब तक प्रशासन रसूख के आगे नतमस्तक रहेगा, तब तक वाराणसी में मरीज नहीं
मौतें डिस्चार्ज होती रहेंगी।

सीएमओ कार्यालय निरीक्षण की फाइलों में ‘सब ठीक’ जमीन पर मौत

अगर किसी निजी अस्पताल में मरीज की मौत होती है, तो सबसे पहला सवाल डॉक्टर से नहीं, सीएमओ कार्यालय से पूछा जाना चाहिए। क्योंकि निजी अस्पतालों को चलाने, निरीक्षण करने, लाइसेंस देने और जरूरत पड़ने पर सील करने की वैधानिक जिम्मेदारी मुख्य चिकित्साधिकारी की होती है। लेकिन इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल का मामला बताता है कि सीएमओ कार्यालय अब स्वास्थ्य का नहीं, समझौते का विभाग बन चुका है।

अस्पताल का लाइसेंस किस आधार पर

इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल को किस श्रेणी में लाइसेंस मिला है नर्सिंग होम, मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, डे-केयर सर्जरी सेंटर यह जानकारी सार्वजनिक नहीं है।
सीएमओ कार्यालय की वेबसाइट पर अस्पतालों की जो सूची है, उसमें इमरजेंसी सुविधा, आईसीयू, वेंटिलेटर, सर्जरी यूनिट जैसी सेवाओं का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।

बेसमेंट में इमरजेंसी की अनुमति किसने दी

स्वास्थ्य नियमों के अनुसार बेसमेंट में आईपीडी, इमरजेंसी या आईसीयू की अनुमति नहीं होती। फायर सेफ्टी, वेंटिलेशन और आपात निकास अनिवार्य होते हैं। इसके बावजूद इंफिनिटी केयर हॉस्पिटल में बेसमेंट को इमरजेंसी और जांच केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या इस बेसमेंट का कभी भौतिक निरीक्षण हुआ, फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट कब और किस आधार पर जारी हुआ, क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों में हुआ। स्वास्थ्य विभाग की मानें तो निजी अस्पतालों के निरीक्षण में अक्सर फोन पर बात हो जाती है, फाइल पास हो जाती है। मरीज की मौत के बाद मेडिकल ऑडिट क्यों नहीं? किसी भी ऑपरेशन के बाद यदि 48 घंटे के भीतर मरीज की मौत हो जाए और परिजन लापरवाही का आरोप लगाएं, पुलिस पहुंचे तो नियमों के अनुसार मेडिकल ऑडिट कमेटी का गठन अनिवार्य होता है।

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