अंतरराष्ट्रीयराजनीति

चाइल्ड सेक्स जैसे कुख्यात कुकर्मी एपस्टीन का मोदी से सम्बन्ध, ऐसे रिश्तों से आ रही गन्दी दुर्गंध

मोदी-एपस्टीन कनेक्शन? वैश्विक दलदल में भारतीय सत्ता की गंध की परछाइयों का खुलासा

● चाइल्ड सेक्स जैसे कुख्यात कुकर्मी एपस्टीन का मोदी से सम्बन्ध, ऐसे रिश्तों से आ रही गन्दी दुर्गंध

● मोदी-एपस्टीन कनेक्शन? वैश्विक दलदल में भारतीय सत्ता की गंध की परछाइयों का खुलासा

● चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकर एपस्टीन ने पीएम मोदी से मुलाकात सेट करने का किया दावा हिल गई दुनिया, भारत खामोश

● व्हाइट हाउस के ‘डार्क स्ट्रैटेजिस्ट’ स्टीव बैनन और मोदी एपस्टीन की मेलबॉक्स में यह रिश्ता क्या कर रहा

● 18,000 ईमेल उजागर एपस्टीन ने भारतीय सत्ता और अरबपतियों के साथ गहरे रिश्तों की कही बात

● मोदी के नाम पर बातचीत अस्पष्ट क्या छुपाने की कोशिश हो रही है?

● अनिल अंबानी के ईमेल आईडी से एपस्टीन को संदेश भारत-इजराइल लिंक का काला सच

● एपस्टीन ने लिखा—‘मोदी ऑन बोर्ड’… कौन-सी बोर्डिंग, कौन-सा एजेंडा?

● यूएस कमेटी की रिपोर्ट में खुलासे भारत की सत्ता पहले से भी ज्यादा संदिग्ध!

● सरकार की चुप्पी क्या यह खामोशी किसी बड़े रहस्य की तरफ इशारा

 

◆  पँचशील अमित मौर्य

 

दुनिया के सबसे कुख्यात चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकर जेफरी एपस्टीन की फाइलें एक बार फिर खुली हैं और हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने वैश्विक सत्ता प्रतिष्ठानों की नींव हिलाकर रख दी है। लेकिन इस बार मामला सिर्फ अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस या यूरोप की किसी अभिजात मंडली तक सीमित नहीं है। लीक हुए ईमेल्स की एक नई श्रृंखला ने संकेत दिया है कि एपस्टीन का नेटवर्क, उसकी पहुंच और उसकी संवाद-सूची उन देशों तक भी फैलती दिखती है, जिनके लोकतांत्रिक ढांचे को दुनिया सबसे मजबूत और पारदर्शी मानती आई है और इसी सूची में उभरते हैं कुछ भारतीय नाम।

यह खुलासा कोई हल्की बात नहीं। यह सीधे-सीधे सवाल उठाता है कि आखिर दुनिया के सबसे घृणित अपराधी की मेलबॉक्स में भारतीय सत्ता और भारतीय कॉरपोरेट जगत की आहट क्यों थी? यूएस हाउस ओवर साइट कमेटी द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेज और अंतरराष्ट्रीय खोजी वेबसाइटों की रिपोर्ट्स एक खतरनाक तस्वीर खींचती है। लेकिन भारत में इस तस्वीर पर सन्नाटा पसरा है। अमेरिका में यह मुद्दा राजनीतिक भूकंप बना, यूरोप में यह एक नैतिक संकट बना, लेकिन भारत में? यहां न सरकार की प्रतिक्रिया, न जांच एजेंसियों की जिज्ञासा, न संसद में बहस। जैसे किसी अजनबी अपराधी की फाइलों में देश के संदर्भ मिलना कोई सामान्य प्रशासनिक घटना हो। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि सवाल असुविधाजनक हैं? या इसलिए कि सवाल पूछने वाले को यहां तुरंत देशद्रोही कहने का लाइसेंस जारी हो जाता है? आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि अगर दुनिया की खुफिया एजेंसियों की निगरानी में रहे एक कुख्यात अपराधी की मेलबॉक्स में भारतीय सत्ता का संदर्भ आता है, तो क्या भारत के नागरिकों को भी यह जानने का हक नहीं कि मामला क्या है? भले यह संदर्भ झूठ हो, अतिशयोक्ति हो, गलतफहमी हो फिर भी लोकतंत्र में इससे बड़ा सवाल क्या हो सकता है कि किसी अपराधी का दावा आखिर आया क्यों?

एपस्टीन सिर्फ एक अपराधी नहीं था, वह सत्ता और सेक्स के गठजोड़ का सबसे अंधेरा प्रतीक था। राजनेताओं, अरबपतियों, वैज्ञानिकों, खुफिया प्रमुखों सबसे लेकर सेलिब्रिटी तक उसकी संपर्क सूची में मिलते थे। वह एक्सेस बेचता था, इन्फ्लुएंस बेचता था, राज इकट्ठा करता था, और उन्हीं राजों की बदौलत दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों को अपने जाल में फंसा कर रखता था। ऐसे व्यक्ति के ईमेल में किसी लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री का नाम आना अपने आप में नैतिक संकट है भले ही झूठ हो, भले ही गलत समझा गया हो, भले ही सत्यापन योग्य न हो। क्योंकि सवाल सत्य का कम और छाया के अस्तित्व का ज्यादा है। इन ईमेल लीक में जिनके सत्यापन की जिम्मेदारी संबंधित संस्थानों की है। कुछ बातचीत ऐसी दिखाई देती हैं, जिनमें भारत का राजनीतिक संदर्भ, भारतीय उद्योग जगत की कुछ परछाइयां, और अंतरराष्ट्रीय रणनीतियों से जुड़े संकेत झलकते हैं। यह बातचीत हुई या नहीं? इसका आधार क्या था? यह एपस्टीन की डींगें थीं? किसी एजेंडा का हिस्सा थीं? या किसी तीसरे पक्ष की लॉबिंग? दुनिया के कई देशों ने इस पर जांच बिठाई, लेकिन भारत में? यहां खामोशी गहरी होती जा रही है।

लोकतंत्र में जब सत्ता पर सवाल उठते हैं, तब सत्ता का कर्तव्य होता है जवाब देना। इसलिए नहीं कि आरोप सत्य है, बल्कि इसलिए कि पारदर्शिता जनता के विश्वास की नींव है। लेकिन भारत में उल्टा हो रहा है। सवाल पूछना अपराध बन गया है, और चुप्पी सत्ता की ढाल। एपस्टीन फाइलों में जो भी संदर्भ हों अस्पष्ट, अधूरे, हटाए गए या गलत। फिर भी यह भारत के नागरिकों के लिए एक गंभीर चिंतन का बिंदु है कि आखिर वैश्विक अपराध नेटवर्क भारत की सत्ता, भारत के उद्योगपतियों, और भारत की रणनीतिक साझेदारियों का जिक्र क्यों करता है? क्या यह अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग का मसला है? क्या यह कूटनीतिक सलाहकारों के प्रभाव का प्रश्न है?

नाबालिग लड़कियों की सेक्स-ट्रैफिकिंग में का अपराधी पीएम मोदी तक पहुंचने की क्यों कर रहा कोशिश

यूएस हाउस ओवर साइट कमेटी द्वारा जारी नवीनतम दस्तावेजों और ड्रॉप साइट न्यूज के हाथ लगे एपस्टीन के 18,000 ईमेल्स ने दुनिया की कई सरकारों की नींद उड़ा दी है। लेकिन भारत में बेचैनी की कोई लहर नहीं यहां सरकार की तरफ से एक शब्द नहीं। इन्हीं ईमेल्स में वह विस्फोटक दावा सामने आया है जिसने भारतीय राजनीति की जमीन को हिला दिया है कि जेफरी एपस्टीन खुद 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्टीव बैनन की मीटिंग सेट करने का प्रयास कर रहा था। यह वह समय था जब मोदी भारी बहुमत से दोबारा सत्ता में लौटे थे। और ठीक उसी समय एपस्टीन, जो दुनिया भर के पावरफुल लोगों को यौन ब्लैकमेल के जरिए नियंत्रित करने का आरोपी था, भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाकात सेट करने की बात लिख रहा था। एपस्टीन का संदेश मैं सेट कर सकता हूं… तुम्हें मोदी से मिलना चाहिए। ड्रॉप साइट न्यूज की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एपस्टीन ने बैनन को लिखा कि मैं इसे सेट कर सकता हूं… आपको मोदी से मिलना चाहिए। एक अपराधी, जो नाबालिग लड़कियों की सेक्स-ट्रैफिकिंग में पकड़ा गया था, वह आखिर किस अधिकार से भारत के प्रधानमंत्री तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा था। क्या यह सिर्फ एक संयोग है कि यह बातचीत 2019 लोकसभा चुनावों के परिणाम वाले दिन के आसपास हुई? क्या यह संयोग है कि बैनन उसी समय कजाकिस्तान में थे।

मोदी ऑन बोर्ड एपस्टीन का दावा या ब्लैकमेल?

हाउस ओवर साइट कमेटी की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कुछ ही घंटे बाद एपस्टीन ने कथित तौर पर लिखा
मोदी ऑन बोर्ड। यह तीन शब्द भारत की राजनीति के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गए क्योंकि एपस्टीन अतिशयोक्ति कर रहा था? क्या वह ब्लैकमेलिंग टेक्निक का इस्तेमाल कर रहा था, उसका दावा सच था? भारत सरकार ने अब तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।

एपस्टीन-इंडिया कनेक्शन यह सिर्फ मोदी ही नहीं… और भी नाम हैं

रिपोर्ट के अनुसार, एपस्टीन केवल प्रधानमंत्री तक पहुंच की बात नहीं कर रहा था। ईमेल्स दिखाते हैं कि वह कई हाई प्रोफाइल भारतीय बिजनेस मैनों से भी संपर्क में था। इसमें सबसे बड़ा नाम सामने आया अनिल अंबानी का। ड्रॉप साइट न्यूज ने एक ईमेल का जिक्र किया है कि
अनिल अंबानी से जुड़े एक ईमेल आईडी से एपस्टीन को लिखा गया प्रिय जेफरी, सूचना बीआर, अनिल एपस्टीन ने जवाब दिया भारत-इजराइल… ईमेल के लिए नहीं। यह वाक्य इतना भारी है कि दुनिया का कोई भी लोकतांत्रिक देश इसका स्पष्टीकरण मांगेगा।

ईमेल के लिए नहीं यानी इतना संवेदनशील, इतना गोपनीय मामला कि इसे ईमेल में नहीं लिखा जा सकता।
यह क्या था? डिफेन्स डील, इजरायल की गोपनीय रणनीति या कुछ और अंधेरा? गौरतलब है कि इसी समय इजरायल और भारत की मित्रता नई ऊंचाइयों पर जा रही थी। मोदी इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। उसी समय रिलायंस डिफेंस इजरायली कंपनी राफेल के साथ भारी भरकम डील कर रहा था। क्या यह सिर्फ संयोग है?

मोदी की वाशिंगटन यात्रा और एपस्टीन का स्वयंघोषित क्लोज़ ट्रैक

2017 के एक ईमेल में, जब मोदी पहली बार ट्रंप से मिलने यूएस जा रहे थे, एपस्टीन से एक भारतीय बिजनेसमैन ने पूछा किप्रधानमंत्री मोदी की डीसी यात्रा… तिथियां एपस्टीन ने जवाब दिया कि यह इजरायल की रणनीति का हिस्सा है… पेरिस के बाद और अधिक। एपस्टीन ऐसे बात कर रहा था मानो भारतीय विदेश नीति उसकी मुट्ठी में। क्या यह सिर्फ दिखावा था या एपस्टीन वाकई भारतीय सत्ता तक पहुंच रखता था?

भारत की सरकार खामोश क्यों?

दुनिया भर के नेता इन दस्तावेजों के बाहर आते ही बचाव में उतर आए। यूएस, यूके, फ्रांस सभी ने अपनी-अपनी सफाई दी। लेकिन भारत पूरी तरह चुप।
क्या सरकार को डर है कि सफाई देने से और सवाल उठेंगे? क्या यह डर है कि यह मामला इजरायल, अंबानी और स्टीव बैनन के गलियारों से टकरा जाएगा, या यह डर है कि कहीं सत्ता की चमक एपस्टीन की गुफा से निकली रोशनी में फीकी न पड़ जाए?

एपस्टीन का मोदी-बैनन चैट का सबसे तेज चुभता हिस्सा

एपस्टीन ने बैनन से कहा कि देखो अपने अंडरवियर पर या तो मेड इन चाइना या मेड इन इंडिया होगा… तुम लोग कैसे एक ही गोल नहीं समझते। यह सिर्फ बिजनेस की बात नहीं थी। यह सत्ता के ग्लोबल एजेंडा की बात थी जहां राष्ट्राध्यक्ष सिर्फ मोहरे बन जाते हैं और हम यह न भूलें कि एपस्टीन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था।
वह दुनिया के सबसे पावरफुल लोगों को फंसाकर, ब्लैकमेल करकर, अपनी जेब में रखने वाला व्यक्ति था। अगर वह भारतीय प्रधानमंत्री के नाम से खेल रहा था तो भारत को जवाब मांगना चाहिए, लेकिन भारत चुप है। भारत का लोकतंत्र किसी अपराधी की ईमेल फाइलों में पड़ी रहने वाली एक वस्तु नहीं है। अगर एपस्टीन जैसा घृणित सेक्स-ट्रैफिकर भारत के प्रधानमंत्री के नाम का उपयोग कर रहा था, तो यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय शर्म नहीं यह इस देश के सत्ता तंत्र की नैतिक विफलता का संकेत है। सवाल सिर्फ मोदी का नहीं सवाल है भारत के लोकतंत्र का। लेकिन सवाल पूछने पर यहां आपको देशद्रोही कहा जाता है। फिर भी सवाल पूछा जाएगा क्योंकि यह जनता का हक है, और सत्ता की जवाबदेही।

* एपस्टीन के ईमेल में मोदी और बैनन की कथित मीटिंग सेट करने की बात।
* मोदी आन बोर्ड का दावा सबसे बड़ा राजनीतिक विस्फोट।
* अनिल अंबानी से जुड़े ईमेल आईडी का एपस्टीन को संदेश इजरायल लिंक की छाया।
* इजरायल स्ट्रैटेजी, डिफेन्स डील और मोदी की यात्राओं पर एपस्टीन की चर्चा।
* भारत सरकार की पूर्ण चुप्पी सबसे बड़ा सवाल।
* क्या यह सिर्फ एपस्टीन की डींगें थीं या भारतीय सत्ता के कुछ अंधेरे कमरे सचमुच खुले थे?
* यूएस में फाइलें डी-क्लासिफाई, भारत में फाइलें सीलबंद—क्यों?

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