जस्टिस गोगोई न्याय की कुर्सी से सत्ता के दलाल तक का सफर, राज्यसभा में रहे एक नम्बर के “डफर”
सुप्रीम कोर्ट से राज्यसभा तक संयोग या संकेत, न्यायपालिका की निष्पक्षता पर गहराता अविश्वास

- ऐतिहासिक फैसलों की छाया में उठते नए सवाल
- यौन उत्पीड़न आरोप और ‘इन-हाउस’ जांच की पारदर्शिता पर बहस
- अयोध्या फैसले के बाद बढ़ा राजनीतिक विमर्श
- जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से शुरू हुआ असंतोष का दौर
- राज्यसभा में खामोशी जवाबदेही से दूरी
- क्या इतिहास इस अध्याय को विवादों के आईने से देखेगा!
भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत संस्थाओं में गिनी जाने वाली न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल उसके फैसलों से नहीं, बल्कि उन फैसलों के पीछे खड़े व्यक्तित्वों की निष्पक्षता से भी तय होती है। ऐसे में जब देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल के बाद सीधे संसद के उच्च सदन तक पहुंचते हैं और फिर वहां लगभग मौन बने रहते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की यात्रा नहीं रह जाती। यह पूरे सिस्टम पर सवालों की लंबी श्रृंखला खड़ी कर देती है। यह सवाल अचानक नहीं उठा। इसकी जड़ें उस दौर में हैं, जब सुप्रीम कोर्ट के भीतर असंतोष पहली बार सार्वजनिक रूप से फूटा था। के कार्यकाल के दौरान चार वरिष्ठ जजों जिनमें खुद गोगोई भी शामिल थे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर न्यायिक व्यवस्था के भीतर ‘केस अलॉटमेंट’ को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। यह घटना अभूतपूर्व थी और इसने यह संकेत दिया था कि न्यायपालिका के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। जब गोगोई स्वयं मुख्य न्यायाधीश बने, तो एक उम्मीद जगी कि शायद अब पारदर्शिता और संस्थागत मर्यादा को नई दिशा मिलेगी। लेकिन उनका कार्यकाल कई ऐसे विवादों से घिरा रहा, जिन्होंने उस उम्मीद को धीरे-धीरे संशय में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप, और फिर उस मामले की आंतरिक जांच की प्रक्रिया इन सबने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस को और तेज कर दिया। इसी दौरान अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया। को लेकर देशभर में व्यापक चर्चा हुई कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक सभी स्तरों पर फैसले की भाषा और निष्कर्षों के बीच जो विरोधाभास कई विश्लेषकों ने महसूस किया, उसने न्यायिक विवेचना के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता को भी बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। गोगोई के रिटायर होते ही उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया जाना इस पूरी कहानी का सबसे विवादास्पद मोड़ बन गया। जब सरकार की ओर से यह फैसला आया, तो इसे लेकर राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। सवाल सीधा था क्या यह महज एक सम्मान था, या फिर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच उस ‘लक्ष्मण रेखा’ के धुंधले होने का संकेत, जिस पर लोकतंत्र की मजबूती टिकी होती है। राज्यसभा में उनका कार्यकाल भी इन सवालों को शांत नहीं कर पाया। सार्वजनिक आंकड़े और रिपोर्टें बताती हैं कि उन्होंने न तो बहसों में सक्रिय भागीदारी की और न ही कोई उल्लेखनीय हस्तक्षेप किया। यह मौन, उस व्यक्ति के लिए और भी अर्थपूर्ण हो जाता है, जिसने कभी कहा था कि अगर जज जनता के सामने अपनी बात नहीं रखेंगे, तो इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। यही वह बिंदु है, जहां यह सवाल व्यक्तिगत नहीं रह जाता यह संस्थागत बन जाता है। क्या न्यायपालिका के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति का इस तरह राजनीतिक भूमिका में आना उस संस्था की निष्पक्षता पर असर डालता है। क्या इससे जनता के मन में यह धारणा मजबूत होती है कि फैसलों के पीछे कोई अदृश्य समीकरण काम कर रहे हैं। आज जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर लगातार बहस हो रही है, तब गोगोई का यह पूरा अध्याय एक केस स्टडी बन गया है। एक ऐसा उदाहरण, जो आने वाले समय में न्यायपालिका और राजनीति के रिश्तों को समझने के लिए बार-बार उद्धृत किया जाएगा।

न्याय, नैतिकता और सत्ता के त्रिकोण में फंसी एक विरासत
भारतीय न्यायपालिका का इतिहास सिर्फ फैसलों का इतिहास नहीं है, बल्कि विश्वास, नैतिकता व संस्थागत गरिमा का भी इतिहास है। इसी इतिहास के एक बेहद विवादास्पद अध्याय के केंद्र में खड़े हैं रंजन गोगोई एक ऐसा नाम, जो एक दौर में न्यायिक साहस का प्रतीक बना और फिर उसी तीव्रता से सवालों के घेरे में भी आ गया। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में क्या फैसले दिए, बल्कि यह भी है कि उन फैसलों ने न्यायपालिका की आत्मा को किस हद तक प्रभावित किया। और उससे भी बड़ा सवाल क्या इतिहास उन्हें माफ करेगा?
प्रेस कॉन्फ्रेंस से शुरू हुई क्रांति
जनवरी 2018 भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का वह दिन, जब चार वरिष्ठतम जज रंजन गोगोई, जे.चेलमेश्वर, मदन बी.लोकुर और कुरियन जोसेफ सुप्रीम कोर्ट परिसर से बाहर आए और एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर आरोप लगाया कि वे संवेदनशील मामलों को चुने हुए बेंच को सौंप रहे हैं। यह आरोप सिर्फ प्रशासनिक नहीं था। यह न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सीधा हमला था। उस दिन गोगोई ने कहा था कि अगर हम नहीं बोले, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। विडंबना देखिए, आज वही इतिहास उनसे सवाल पूछ रहा है।
उम्मीदों का शिखर
अक्टूबर 2018 में जब रंजन गोगोई भारत के मुख्य न्यायाधीश बने, तो देश में एक उम्मीद जगी। यह उम्मीद थी कि अब सुप्रीम कोर्ट की साख बहाल होगी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता मजबूत होगी और बेंच फिक्सिंग जैसे आरोपों पर विराम लगेगा। लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिन टिक नहीं सकी।
यौन उत्पीड़न का आरोप न्यायपालिका की नैतिक परीक्षा
2019 में सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ आरोप नहीं था यह पूरी न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया।
सबसे गंभीर सवाल यह था कि इस मामले की जांच उसी संस्था के भीतर हुई, जिसके मुखिया खुद आरोपी थे। न कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी, न पारदर्शिता। महिला कर्मचारी को निलंबित किया गया, फिर बाद में बहाल कर दिया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका की नैतिकता पर गहरे प्रश्नचिह्न लगा दिए।
राम जन्मभूमि फैसला न्याय या समझौता?
नवंबर 2019 सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ, जिसकी अध्यक्षता रंजन गोगोई कर रहे थे, ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। फैसले में कहा गया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर होने के पुख्ता सबूत नहीं हैं फिर भी विवादित जमीन हिंदू पक्ष को दी जाती है। मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन दी जाएगी
यह फैसला कानूनी से ज्यादा संतुलनकारी लगा। आलोचकों ने इसे न्यायिक विवेक से ज्यादा राजनीतिक यथार्थ का प्रतिबिंब बताया।
फैसले से पहले की जानकारी?
इस फैसले को लेकर सबसे गंभीर आरोप यह लगा कि सत्ताधारी दल को पहले से फैसले की जानकारी थी। बुकलेट छपना, नैरेटिव तैयार होना ये सब संकेत देते थे कि कहीं न कहीं न्यायिक प्रक्रिया की गोपनीयता भंग हुई। हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुआ, लेकिन संदेह की यह परछाईं आज भी कायम है।
रिटायरमेंट और राज्यसभा नैतिकता का पतन
नवंबर 2019 में रिटायर होने के महज चार महीने बाद, मार्च 2020 में रंजन गोगोई को राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया गया। यह नियुक्ति भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्ते पर एक बड़ा सवाल बन गई। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह इनाम है, तो उनका जवाब था कि अगर भ्रष्टाचार करना होता, तो क्या इतनी छोटी चीज लेता? यह बयान खुद में एक और विवाद बन गया। इस पूरी कहानी को अगर एक धागे में पिरोया जाए, तो सवाल उठते हैं कि
क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस का विद्रोह वास्तविक था या सत्ता के साथ किसी भविष्य की डील का हिस्सा? क्या यौन उत्पीड़न मामले में न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष थी। क्या राम जन्मभूमि का फैसला पूरी तरह न्यायिक था। क्या राज्यसभा की सदस्यता महज एक संवैधानिक प्रावधान थी या एक इनाम।
न्यायपालिका की साख पर असर
गोगोई के कार्यकाल के बाद एक अजीब धारणा समाज में घर कर गई कि अगर कोर्ट सख्त टिप्पणी करे, तो फैसला उल्टा आएगा अगर संविधान की बात हो, तो समझिए उसका उल्लंघन होने वाला है अगर एजेंसियों को फटकार लगे, तो राहत नहीं मिलेगी। यह धारणा खतरनाक है, क्योंकि यह न्यायपालिका में जनता के विश्वास को खत्म करती है।
डी.वाई. चंद्रचूड़ का बयान और ईश्वरीय प्रेरणा
मुख्य न्यायाधीश बने डी.वाई. चंद्रचूड़ ने एक इंटरव्यू में कहा कि राम जन्मभूमि मामले में उन्हें ईश्वरीय प्रेरणा मिली। यह बयान न्यायिक तर्क के बजाय आस्था को प्राथमिकता देता हुआ प्रतीत हुआ। सवाल यह उठा क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले अब संविधान से ज्यादा आस्था से प्रभावित होंगे। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने खुलकर आरोप लगाए कि जजों को ब्लैकमेल करने का एक तंत्र मौजूद है। वहीं कुछ दक्षिणपंथी वक्ताओं ने यह तक दावा किया कि नरेंद्र मोदी खुद जजों से मिले। इन दावों की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इनका सार्वजनिक होना ही न्यायपालिका की साख के लिए एक बड़ा झटका था। इतिहास का न्याय अदालत के न्याय से अलग होता है। अदालत सबूतों पर फैसला देती है, इतिहास नैतिकता पर।
रंजन गोगोई के मामले में इतिहास निम्नलिखित सवालों के जवाब खोजेगा
क्या उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत किया या कमजोर। उन्होंने सत्ता से दूरी बनाए रखी या उसके करीब गए। उनके फैसले न्याय के सिद्धांतों पर आधारित थे।
* गोगोई का कार्यकाल विवादों से घिरा
* प्रेस कॉन्फ्रेंस से शुरू हुआ असंतोष
* यौन उत्पीड़न आरोपों ने बढ़ाए सवाल
* अयोध्या फैसले पर बहस जारी
* राज्यसभा नामांकन बना विवाद का केंद्र
* संसद में निष्क्रिय भूमिका
* न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल
* इतिहास के कठघरे में खड़ा एक अध्याय




