जाति का भ्रम, सत्ता का खेल, बहुजन आंदोलन हर बार क्यो हो जा रहा फेल?

● जाति का भ्रम, सत्ता का खेल, बहुजन आंदोलन हर बार क्यो हो जा रहा फेल?
● आंदोलन की हार जाति उन्मूलन के नाम पर जनता बार-बार क्यों ठगी जाती?
● जाति उन्मूलन नहीं, जाति प्रबंधन बन गया है राजनीति का हथियार
● आरक्षण की आड़ में शोषक वर्ग ने वर्ग संघर्ष को कुचल दिया
● सुधारवाद के हर प्रयास से पैदा हुआ एक नया पंथ, पर जाति बची रही
● बहुजन आंदोलन ने कम्युनिस्ट राजनीति को कमजोर क्यों किया?
● 15 बनाम 85 का नारा सत्ता का शॉर्टकट, समाधान का नहीं
● धर्म परिवर्तन से जाति क्यों नहीं टूटी?
● जातीय गौरव या वैचारिक पराजय?
● मार्क्स को छोड़ा, नतीजा आंदोलन विरोधी में बदल गया
◆ सुशीम संघप्रिय
भारत में जाति पर बहस अब बौद्धिक ईमानदारी की नहीं, बल्कि राजनीतिक धूर्तता की शिकार हो चुकी है। जाति उन्मूलन के नाम पर जो कुछ पिछले सौ वर्षों में हुआ, वह जाति के खिलाफ संघर्ष नहीं बल्कि जाति को सत्ता, लाभ और पहचान में बदल देने का इतिहास है। आज जाति न केवल जीवित है, बल्कि पहले से अधिक संगठित, आक्रामक और गर्वोन्मत्त रूप में खड़ी है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि योजनाबद्ध राजनीतिक और आर्थिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसे समझने से जान बूझकर बचा गया। कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले चेतावनी दी थी कि पूंजीवादी साम्राज्यवाद भारत की जड़ सामाजिक संरचनाओं को तोड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि जो आंदोलन अपने ही जन्म, विकास और उद्देश्य का भौतिकवादी विश्लेषण नहीं करता, वह अंततः अपने विरोधी में बदल जाता है। भारत में जातीय आंदोलनों की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। उन्होंने शोषण के खिलाफ संघर्ष का दावा किया, लेकिन शोषण की जड़ों को छूने का साहस नहीं दिखाया। नतीजा यह हुआ कि जाति उन्मूलन का आंदोलन, जाति को ही राजनीतिक मुद्रा बना बैठा। यह एक कड़वा सत्य है कि पूंजीवादी ने जहां मुनाफा देखा, वहां जाति को बेरहमी से कुचल दिया। होटल, अस्पताल, स्कूल, रेल, बस, हवाई जहाज, बाजार यहां कोई जाति नहीं पूछी जाती, केवल जेब देखी जाती है। लेकिन वही पूंजीवादी सत्ता राजनीति में जाति को जिंदा रखती है, क्योंकि विभाजित समाज शासित करना आसान होता है। बाजार में जाति खत्म, राजनीति में जाति जिंदा यही शोषक वर्ग का असली चेहरा है। आरक्षण जिसे उत्पीड़ित वर्गों के लिए एक ऐतिहासिक औजार होना चाहिए था, उसे भी शोषक वर्ग ने साजिश में बदल दिया। एक तरफ सरकारी नौकरियां योजनाबद्ध तरीके से खत्म की गईं, दूसरी तरफ उन्हीं घटती नौकरियों में आरक्षण को लेकर समाज को आपस में लड़ाया गया। दलित बनाम पिछड़ा, पिछड़ा बनाम सवर्ण यह संघर्ष जनता का नहीं, शोषक सत्ता का रचा हुआ युद्ध है। आरक्षण को अधिकार से ज्यादा, टकराव का हथियार बना दिया गया। इतिहास गवाह है कि सुधारवाद से कभी कोई शोषणकारी व्यवस्था नहीं टूटी। बुद्ध, कबीर, रैदास, बसवन्ना सबने जाति पर हमला किया, लेकिन वर्ग सत्ता को नहीं छुआ। परिणाम यह हुआ कि हर विद्रोह एक नए पंथ में बदल गया और जाति जस की तस खड़ी रही। डॉ. आंबेडकर ने भी जब यह समझ लिया कि मनु ने जाति नहीं बनाई, तब भी समाधान धर्म परिवर्तन तक सीमित रहा। लेकिन इतिहास ने यह भी साबित कर दिया कि धर्म बदलने से जाति नहीं टूटती। बौद्ध, सिख, ईसाई, मुसलमान सबके भीतर जातियां जिंदा हैं, कहीं नाम बदलकर, कहीं रूप बदलकर। आज तथाकथित बहुजन राजनीति की सबसे बड़ी विफलता यही है कि उसने जाति उन्मूलन की जगह जाति गौरव को बेच दिया। जिसकी जितनी संख्या भारी का नारा सत्ता तक पहुंचाने का सीढ़ी तो बना, लेकिन व्यवस्था बदलने का औजार नहीं। सत्ता की मलाई कुछ नेताओं ने खाई, बलिदान जनता ने दिया और फायदा अंततः उसी शोषक वर्ग को मिला, जिसने इस विभाजन को जन्म दिया था। इसी दौर में कम्युनिस्ट आंदोलन कमजोर पड़ा और दक्षिणपंथी ताकतें मज़बूत होती चली गईं। यह कोई ऐतिहासिक दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधा राजनीतिक परिणाम है। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि जाति के खिलाफ लड़ने की बजाय, लोग जाति पर गर्व करने लगे हैं। दि ग्रेट चमार, छोरा चमार का ये नारे प्रतिरोध नहीं, वैचारिक आत्मसमर्पण हैं। यह उस क्षण की घोषणा है जब उत्पीड़ित वर्ग व्यवस्था से लड़ने की बजाय, उसी व्यवस्था की पहचान को गले लगा लेता है। यह अम्बेडकर वाद नहीं, यह उसकी कब्र पर लिखा गया नारा है। लेख का उद्देश्य किसी जाति, समुदाय या व्यक्ति पर हमला करना नहीं, बल्कि उस झूठे नैरेटिव को ध्वस्त करना है, जिसने जनता को यह विश्वास दिला दिया कि जाति अजर-अमर है। जाति न तो सदा थी, न सदा रहेगी। यह एक ऐतिहासिक उत्पाद है और हर ऐतिहासिक उत्पाद की तरह इसका अंत भी निश्चित है। लेकिन यह अंत न तो भाषणों से आएगा, न पंथों से, न पहचान की राजनीति से। यह आएगा केवल वर्ग चेतना से, वर्ग संघर्ष से और शोषक राजसत्ता को उखाड़ फेंकने से। मार्क्सवाद कोई धर्म नहीं, बल्कि औजार है समाज को समझने और बदलने का औजार। और जब तक इस औजार को हाथ में लेकर, बिना किसी मसीहा के इंतजार में पड़े, मेहनतकश खुद मैदान में नहीं उतरते तब तक जाति उन्मूलन एक नारा बना रहेगा हकीकत नहीं।
मार्क्स की भविष्यवाणी और भारतीय यथार्थ
मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवादी विकास भारत की जड़ सामाजिक संरचनाओं को तोड़ेगा। यह आंशिक रूप से सही साबित हुआ। जातिगत पेशे टूटे, लेकिन जातीय चेतना बनी रही। आर्थिक आधार बदला, लेकिन सत्ता संरचना नहीं बदली।
जाति ब्राह्मणों की रचना या ऐतिहासिक प्रक्रिया?
मार्क्सवाद स्पष्ट करता है कि जाति का निर्माण औजार, श्रम और पीढ़ीगत पेशों से जुड़ा है। ब्राह्मण चाहें या न चाहें यदि ये शर्तें पूरी हों तो जाति बनेगी। और यदि न हों, तो कोई जाति नहीं बना सकता।
‘एशियाटिक मोड ऑफ प्रोडक्शन’ और जातियों का विस्तार
ग्रामीण आत्मनिर्भरता, सीमित आवागमन और स्थानीय उत्पादन ने एक ही पेशे को अलग-अलग जातीय पहचान दी। शोषक वर्ग ने इन्हीं भिन्नताओं को स्थायी विभाजन में बदला।
सुधारवाद की ऐतिहासिक असफलता
हर सुधारवादी प्रयास ने जाति पर हमला किया, लेकिन वर्ग सत्ता को नहीं छुआ। नतीजा नया पंथ, नई पहचान, पुरानी जाति। आंबेडकर ने जाति की उत्पत्ति पर गहरी बात कही, लेकिन समाधान के रूप में धर्म परिवर्तन सुझाया जो भौतिक आधार को नहीं छूता।
बहुजन आंदोलन अवसर या चूक?
‘जिसकी जितनी संख्या भारी’ ने सत्ता दिलाई, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। उलटे, कम्युनिस्ट आंदोलन कमजोर हुआ और दक्षिणपंथ मजबूत।
जातीय गौरव प्रतिरोध या आत्मसमर्पण?
‘दि ग्रेट चमार’ जैसे नारे शोषण के खिलाफ विद्रोह नहीं, बल्कि जाति की स्थायित्व स्वीकृति हैं। मार्क्सवादी रास्ता कठिन लेकिन एकमात्र जाति विचार है। उसे वर्ग चेतना से ही बदला जा सकता है। इसके लिए वर्ग संघर्ष, समाजवादी अर्थव्यवस्था और शोषक राज्य का अंत अनिवार्य है।
* जाति का मूल धर्म नहीं, अर्थव्यवस्था है
* सुधारवाद से जाति नहीं टूटी
* धर्म परिवर्तन भी समाधान नहीं
* आरक्षण का दुरुपयोग शोषक वर्ग की रणनीति
* बहुजन राजनीति ने वर्ग राजनीति को कमजोर किया
* जातीय गौरव, जाति उन्मूलन नहीं वर्ग चेतना ही विकल्प
* मार्क्सवाद के बिना जाति उन्मूलन असंभव


