विचार/मुद्दा

दलितों पिछड़ो के मसीहा के रूप में स्मृतियों में अजर -अमर रहेंगे वीपी मंडल

मंडल साहब ने जलाई सामाजिक न्याय की मशाल, जिसने लोकतंत्र को नई दिशा दी

भारतीय लोकतंत्र का आधार समानता और न्याय है। लेकिन लंबे समय तक यह आदर्श केवल संविधान की किताबों और भाषणों में सीमित रहा। देश की एक बड़ी आबादी शिक्षा, रोजगार और सत्ता के अवसरों से वंचित रही। जातीय ढांचे ने असमानता की खाई और गहरी कर दी थी। ऐसे समय में बिहार के मधेपुरा के एक साधारण किसान परिवार से निकले बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने वह मशाल जलाई, जिसने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास को नई दिशा दी। मंडल आयोग केवल एक प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक न्याय का घोषणापत्र था जिसने भारतीय राजनीति, समाज और आने वाली पीढ़ियों को गहराई से प्रभावित किया।

ग्रामीण पृष्ठभूमि से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का सफर

बी.पी.मंडल का जन्म 25 अगस्त 1918 को बिहार के मधेपुरा जिले के एक किसान परिवार में हुआ। उस दौर में ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और अवसर बेहद सीमित थे, लेकिन मंडल बचपन से ही नेतृत्व और संगठन की क्षमता रखते थे। उनके पिता साधारण कृषक थे। मंडल का बचपन गांव की कठिनाइयों और अभावों में बीता। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने शिक्षा हासिल की और समाज के हालात को करीब से समझा। धीरे-धीरे मंडल ने स्थानीय स्तर पर सामाजिक कार्यों से शुरुआत की और फिर राजनीति में प्रवेश किया। वे विधायक, सांसद और 1968 में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने बी.पी. मंडल की खासियत यह थी कि वे सत्ता को साधन मानते थे, साध्य नहीं। उनका असली उद्देश्य समाज में बराबरी और न्याय स्थापित करना था।

 

नेतृत्व का सामाजिक दृष्टिकोण

मंडल का राजनीतिक सफर केवल पद और प्रतिष्ठा हासिल करने तक सीमित नहीं रहा। वे हर कदम पर इस बात को लेकर सजग थे कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता पाना नहीं, बल्कि समाज को बदलना होना चाहिए। उस समय राजनीति में उच्च जातियों का वर्चस्व था। पिछड़े वर्ग को न तो शिक्षा में प्रतिनिधित्व था और न ही सत्ता में। मंडल मानते थे कि जब तक शिक्षा और रोजगार में बराबरी नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा। उन्होंने सामाजिक न्याय को राजनीति की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। मंडल का नेतृत्व बताता है कि लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि वंचितों को बराबरी दिलाने में है।

1979 मंडल आयोग की ऐतिहासिक नियुक्ति हुई

1979 में जब चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने बी.पी. मंडल को अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया। इतिहास ने इसी को मंडल आयोग नाम दिया। जिसका उद्देश्य यह पता लगाना कि कौन-से वर्ग सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हैं। आयोग ने देशभर में सर्वेक्षण किया, आंकड़े जुटाए, गांव-गांव जाकर अध्ययन किया। यह पहला मौका था जब सरकारी स्तर पर पिछड़े वर्ग की पहचान और उनके लिए ठोस नीतियों की चर्चा हो रही थी। बी.पी. मंडल का चयन इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि वे स्वयं ग्रामीण और पिछड़े समाज से आए थे, इसलिए उनकी दृष्टि अंदर से जुड़ी हुई थी।

सामाजिक न्याय का घोषणापत्र

दो वर्षों की मेहनत और सर्वेक्षण के बाद 1980 में आयोग ने अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी। जिसमें देश की आबादी का लगभग 52 फीसदी हिस्सा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा पाया गया। आयोग की रिपोर्ट पर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण व पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए विशेष योजनाओं के साथ अवसर की समानता सुनिश्चित करना था। जो यह दिखाता है कि यह रिपोर्ट केवल आंकड़े नहीं थी, बल्कि यह वंचित समाज के संघर्ष और पीड़ा का प्रतिबिंब थी। मंडल आयोग की रिपोर्ट ने यह स्थापित किया कि जब तक अवसरों में बराबरी नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र केवल कागजी होगा।

ठंडे बस्ते से लागू होने तक

1980 में रिपोर्ट तो सरकार को सौंप दी गई, लेकिन तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। एक दशक की प्रतीक्षा के बाद भी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने हिम्मत दिखाई और इसकी सिफारिशों को लागू करने की घोषणा कर दी।

देशव्यापी विरोध

उच्च जातियों में नाराजगी, आत्मदाह और हिंसक प्रदर्शन। पिछड़े वर्ग में आत्मविश्वास की लहर। पहली बार लगा कि लोकतंत्र में उनकी भी हिस्सेदारी है। यह वही पल था जब भारतीय राजनीति में “मंडल बनाम कमंडल की बहस शुरू हुई।

भारतीय राजनीति का नया अध्याय

मंडल आयोग के लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा ध्रुवीकरण देखा गया। मंडल सामाजिक न्याय और आरक्षण का प्रतीक बना व कमंडल धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल जैसे दल मंडल राजनीति की उपज थे। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार जैसे नेता राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत हुए। मंडल बनाम कमंडल की यह बहस भारतीय लोकतंत्र को आज भी प्रभावित करती है।

समानता का अधूरा सपना

बी.पी.मंडल का योगदान सिर्फ एक आयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय की। हर बार आरक्षण की बहस में मंडल आयोग का जिक्र होता है। शिक्षा और रोजगार में पिछड़े वर्ग की स्थिति अब भी कमजोर। आरक्षण को लेकर सामाजिक और राजनीतिक खींचतान जारी है। मंडल ने रास्ता दिखाया, लेकिन मंजिल अब भी दूर है। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि बिना सामाजिक न्याय के लोकतंत्र अधूरा है।

मंडल का संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए

बी.पी.मंडल का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने लोकतंत्र को सिर्फ चुनावी राजनीति से ऊपर उठाकर सामाजिक न्याय का आधार दिया। यह बताया कि लोकतंत्र का असली अर्थ केवल वोट देना नहीं, बल्कि सबको समान अवसर मिलना। मंडल की सोच आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक है। चाहे राजनीति का स्वरूप बदल जाए, लेकिन सामाजिक न्याय का एजेंडा हमेशा जिंदा रहेगा। बी.पी.मंडल केवल एक नेता नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति के प्रणेता थे।

* 25 अगस्त 1918 बी.पी. मंडल का बिहार के मधेपुरा में जन्म हुआ
* साधारण किसान परिवार से राजनीति की ऊंचाइयों तक का सफर।
* वर्ष 1979 में मंडल आयोग का गठन।
* वर्ष 1980 रिपोर्ट सौंपी 52 फीसदी आबादी पिछड़ा वर्ग, 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश।
* वर्ष 1990 वी.पी.सिंह सरकार ने मंडल कमीशन लागू किया, देशभर में आंदोलन।
* मंडल बनाम कमंडल बहस ने राजनीति को नया रूप दिया।
* पिछड़ों, दलितों और वंचितों में आत्मविश्वास और राजनीतिक चेतना आई।
* लोकतंत्र के लिए संदेश बिना सामाजिक न्याय के लोकतंत्र अधूरा है।

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