निर्दोष वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को कारागार, चोर, हत्यारो, लुटेरों व बलात्कारीयों पर न्यायालय की कृपा अपरम्पार
आभा शुक्ला

● निर्दोष वैज्ञानिक सोनम वांगचुक को कारागार, चोर, हत्यारो, लुटेरों व बलात्कारीयों पर न्यायालय की कृपा अपरम्पार
● क्योंकि सत्य असुविधाजनक था, इसलिए सोनम वांगचुक जेल में, हम सब आजाद होकर भी ग़ुलाम
● दो महीने से शांत देश क्या डर हमें इंसान होने से रोक रहा है?
● वह न आतंकी, न पाकिस्तानी केवल संस्कृति बचाने की जिद थी अपराध
● घोषणापत्र का वादा पूरा न करो, आवाज उठाओ तो एनएसए लगा दो
● लद्दाख की बर्फीली चोटियों से सत्ता की गरम कुर्सियों तक फैला डर
● जो सच बोले, वह जेल में, जो चुप रहे, वह पुरस्कारों से मालामाल
● ‘छठा शेड्यूल’ मांगना कब से राष्ट्रद्रोह हो गया?
● समाज का सन्नाटा यह सिर्फ खामोशी नहीं, साझेदारी का अपराध
● अगर सोनम गलत है तो हम सब किस श्रेणी के नागरिक
◆ आभा शुक्ला
लगभग दो महीने की जेल और देश की दो सौ करोड़ आंखों की खामोशी यही हमारी समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। लद्दाख के पहाड़ों में पानी बचाने का विज्ञान रचने वाला, युवाओं को पर्यावरण का शिष्टाचार सिखाने वाला, अहिंसा को जीवन का सिद्धांत मानने वाला सोनम वांगचुक आज जेल में बंद है। वह न दंगा भड़काने वाला था, न हथियार उठाने वाला। वह न इस सरकार का आलोचक था और न ही सत्ता पलटने का सपना देखने वाला। उसका ‘अपराध’ सिर्फ इतना था कि उसने वही मांगा, जो सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था। लद्दाख के लिए छठा अनुसूची, और हिमालई संस्कृति की रक्षा। लेकिन इस लोकतंत्र में मांग करना भी जब राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा बना दिया जाए, बिना सुनवाई, बिना जमानत, बिना अदालत सीधे एनएसए लगा दिया जाए, तो दोषी सिर्फ सरकार नहीं…
दोषी हम सब हैं, जो चुप हैं।
दो महीने और देश की खामोशी, सिर्फ मौन नहीं अपराध
दो माह हो गए सोनम वांगचुक जेल में हैं। यह तथ्य उतना ही सरल है, जितना इस देश का सामूहिक पाखंड जटिल। वह शख्स न अपराधी है, न गुंडा, न आतंकी, न किसी संगठन की कठपुतली। वह न मुस्लिम है कि उसे राष्ट्रवाद के नाम पर निशाना बनाकर भीड़ जुटाई जाए। न वह वामपंथी है कि उसे ‘अर्बन नक्सल’ घोषित कर दिया जाए। न वह कांग्रेस, राजद या सपा का नेता है, जिन पर ठप्पा लगाते ही लाखों उंगलियां स्वतः उठ जाती हैं। लेकिन वह जेल में है और देश खामोश है। यह सामान्य बात नहीं है। यह खामोशी उस सामाजिक सड़ांध की तरह है, जिसे हम सूंघ तो रहे हैं, पर स्वीकार नहीं करना चाहते।
सोनम वांगचुक का अपराध अपनी भूमि, अपनी संस्कृति, अपने लोगों की रक्षा
लद्दाख के लोग पिछले पांच साल से लगातार कह रहे हैं कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद उनकी जमीनें, उनकी नौकरियां, उनका पर्यावरण, उनकी पहचान सब जोखिम में है। सोनम वांगचुक ने इसी मुद्दे पर आवाज उठाई। उनकी मांग थी, लद्दाख को छठा अनुसूची दिया जाए। आदिवासी आबादी की संस्कृति, भाषा और पर्वतीय जीवन को बचाया जाए। सरकार अपने वादे पर कायम रहे। यही मांग अब इस देश में अपराध हैं? सिर्फ इसलिए कि इससे सरकार की छवि पर खरोंच आती है।
अगर यह अपराध है तो फिर घोषणापत्र एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि जनता को धोखा देने का लाइसेंस है।
सत्ता की संवेदनहीनता
सोनम के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया गया।
यह वही कानून है, जिसमें कोई अपील नहीं, कोई सुनवाई नहीं, कोई न्यायिक समीक्षा नहीं और महीनों तक बिना आरोप बताए व्यक्ति को जेल में रखा जा सकता है। एक पर्यावरणविद, एक वैज्ञानिक, एक शिक्षक, एक सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है या फिर सोनम का अस्तित्व उन लोगों के लिए खतरा था, जो सच से डरते हैं। देश में खुलेआम नफरत फैलाने वाले, अवैध हथियार रखने वाले, साम्प्रदायिकता बेचकर राजनीति चमकाने वाले, किसानों पर लाठी चलवाने वाले, चरमराते लोकतंत्र पर प्रहार करने वाले सब आजाद घूम रहे हैं। वे संसद में, विधानसभा में, मंत्रालयों में बैठे हैं। एक व्यक्ति जिसने जीवन भर हथियार नहीं उठाया जेल में है। यह कैसी लोकतांत्रिक विडंबना है?
अपने ही वादे को अपराध बना रहे
2019 और 2024 के चुनावों में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से लिखा था कि लद्दाख को छठा अनुसूची दिया जाएगा। लेकिन सत्ता में आते ही यह वादा ऐसे गायब हो गया जैसे लद्दाख के ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। जो इस वादे की याद दिलाए वह जेल में यह वही राजनीति है जिसमें वादे करना आसान, लेकिन सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह।
लद्दाख की समस्या सिर्फ हिमालय नहीं, लोकतंत्र भी पिघल रहा, लद्दाख कोई साधारण पहाड़ी इलाका नहीं। यह चीन से सटी सीमा का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है, भारतीय सेना का रणनीतिक केंद्र, संस्कृति और प्रकृति का विरल संगम। यहां की आबादी बेहद कम, पर्यावरण नाजुक और संसाधन सीमित हैं। सोनम शुरू से चेताते रहे कि अनियोजित परियोजनाएं और अनियंत्रित पर्यटन इस संपूर्ण पारिस्थितिकी क्षेत्र को बर्बाद कर देगा। वह कहते थे कि लद्दाख की रक्षा सिर्फ सेना नहीं करेगी, लोगों को अधिकार देकर ही यह इलाका सुरक्षित रह सकता है। लेकिन आज वही लोग सत्ता की आंख की किरकिरी बन गए हैं। क्योंकि जो इंसान अपनी जमीन के लिए लड़ता है वह बिकता नहीं। जो बिकता नहीं, वह सत्ता को पसंद नहीं आता।
मीडिया की चुप्पी टीआरपी की चकाचौंध में गायब इंसानियत
दो महीने हो गए लेकिन मुख्यधारा मीडिया में सोनम का नाम तक नहीं आया। क्योंकि सोनम न हिंदू-मुस्लिम की उन्मादी बहस देते हैं, न किसी दल के चश्मा पहने प्रवक्ता हैं, न किसी कॉर्पोरेट के लिए विज्ञापन मूल्य रखते हैं। पत्रकार जो लोकतंत्र की आत्मा कहे जाते हैं सोनम के प्रश्नों पर मौन हैं। एक वैज्ञानिक की जेल में बंदी पर कोई ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नहीं, न कोई डिबेट, न कोई एक घंटे का ‘सुपर प्राइम टाइम’। ऐसा लगता है मानो मीडिया का गला रेत दिया गया है और अब वह सिर्फ वही बोलता है जिसके लिए उसे अनुमति है।
एक्टिविस्ट, वकील, लेखक, कवि सब गायब
देश में हर मुद्दे पर सोशल मीडिया पर नारे लगाने वाली समाज की सेल्फी-जनरेशन सोनम पर चुप क्यों है?
क्या इसलिए कि सोनम ने किसी दल की आलोचना नहीं की, सिर्फ सत्य बोला या इसलिए कि सोनम के साथ खड़े होने में जोखिम है या इसलिए कि हम सभी अंदर से डरे हुए लोग बन चुके हैं? सच यह है कि हमारी खामोशी ही सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति है। जैसे गुलामी के दौर में अंग्रेजों को कोई विरोध नहीं मिला, वैसे ही आज सत्ता को जनता की खामोशी से सबसे ज्यादा साहस मिलता है।
समाज के लिए आईना
सोनम का मामला सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं।
यह इस देश की आत्मा पर लगा प्रश्नचिन्ह है। अगर सत्य बोलना, वादा याद दिलाना, पर्यावरण बचाना, अपनी संस्कृति की रक्षा करना, जनता की चिंता करना अपराध माना जाएगा…तो फिर इस देश में कौन निर्दोष बचेगा? सच तो यह है कि सोनम एक आईना हैं और हम उस आईने में अपना चेहरा देखने से डरे हुए लोग हैं। क्योंकि उस आईने में हमारी कायरता, हमारा स्वार्थ, हमारी चुप्पी साफ दिखाई देती है। सोनम वांगचुक जेल में हैं। लेकिन असली कैदी वह नहीं हम हैं। हमारी अंतरात्मा, हमारा साहस, हमारा लोकतांत्रिक अधिकार सब कैद है। सरकार को सोनम से डर इसलिए है क्योंकि वह सच बोलता है। लेकिन देश को अपने आप से डर इसलिए है क्योंकि हम सुनने की ताकत खो चुके हैं। अगर दो महीने बाद भी देश की आवाज न उठी तो याद रखिए, अगला सोनम कोई और नहीं, आप हो सकते हैं।
* सोनम वांगचुक दो महीने से जेल में बंद। न कोई हिंसा, न नफरत, न राजनीतिक लाभ सिर्फ छठा अनुसूची की शांतिपूर्ण मांग।
* यह वही वादा, जिसे भाजपा ने चुनाव घोषणापत्र में लिखा था।
* सरकार का डर कि लद्दाख में अधिकार देने से कॉर्पोरेट परियोजनाओं को विरोध झेलना पड़ेगा।
* मीडिया की संपूर्ण चुप्पी टीआरपी को सोनम में स्पाइस नहीं मिला।
* एक्टिविस्ट, कवि, लेखक, वकील, पत्रकार सब सोशल मीडिया की चकाचौंध में खो गए।
* सोनम का जेल में रहना और देश का चुप रहना दोनों ही लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत।
* यह मामला लद्दाख की पहचान, पर्यावरण और मूल निवासियों के अस्तित्व का है।
* अगर आज सोनम को चुप कराया जा सकता है तो कल किसी भी नागरिक को किया जा सकता है।




