नोटबंदी का जश्न क्यों नहीं मनाती उत्सवप्रेमी मोदी सरकार, आप के तानाशाही भरे निर्णय से लोग बर्बाद हो गए बरखुदार

● नोटबंदी का जश्न क्यों नहीं मनाती उत्सवप्रेमी मोदी सरकार, आप के तानाशाही भरे निर्णय से लोग बर्बाद हो गए बरखुदार
● नोटबंदी राष्ट्र को लाइन में खड़ा कर खुद पर फूल बरसवाने वाले ‘बहादुर’ आज खामोश क्यों
● उत्सव प्रेमी सरकार का एकमात्र मौन दिवस नोटबंदी की बरसी
● लोकतंत्र पर थोपे गए ‘आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक’ की 9 साल बाद भी नहीं मिली जांच
● काला धन शून्य, जनता का दुख अनंत आरबीआई ने खोला सरकार के झूठ का ताबूत
● नकद अर्थव्यवस्था दोगुनी, डिजिटल का ढोल पीटकर भी कैशलेस सपना धरा रह गया
● नौकरियां गंवाईं, कारोबार मर गए, पर सरकार को उत्सव से नहीं मिली फुर्सत
● विदेशी धरती पर नोटबंदी की ‘कॉमेडी’ और देश में जन-त्रासदी का अपमानजनक खेल
● जीडीपी गिरावट, निर्यात संकट, रुपये की मौत क्या यही था ‘ऐतिहासिक फैसला’
● 50 दिन की मोहलत मांगने वाले 9 वर्ष बाद भी गुम, जिम्मेदारी से पलायन क्यों
जिस सरकार ने दीपावली से लेकर विश्व योग दिवस तक को मेगा-इवेंट बना दिया, जिसने ताली-थाली से लेकर फूल-वर्षा तक को महोत्सव में बदल दिया, जिसने हर सरकारी योजना को अपनी ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’ बताकर रंगारंग कार्यक्रम करवाए। वही सरकार एक फैसले की बरसी पर घोर चुप्पी साध लेती है।
वह फैसला है नोट बंदी एक ऐसा निर्णय जिसने करोड़ों भारतीयों को लाइन में खड़ा कर दिया, हजारों की नौकरी छीन ली, छोटे कारोबारियों को रसातल में पहुंचा दिया और देश की अर्थव्यवस्था को आज तक उबरने नहीं दिया। नौ साल पूरे हो गए, पर जनाब 8 नवंबर आते ही भाजपा से लेकर सरकार तक ऐसे दुबक जाती है जैसे कोई अपराधी वारदात की तिथि से भागता है।
जिस ‘ऐतिहासिक कदम’ पर फूल बरसाने की नौटंकी विदेशों में की गई थी, उसे याद करने की हिम्मत अब किसी में नहीं है।
नौ साल देश भूला नहीं, अपराधी खामोश
8 नवंबर, 2016 रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को टीवी पर आकर बताया कि आज आधी रात से 500 और 1000 के नोट बंद हो जाएंगे। सरकार के अनुसार यह काला धन खत्म करने, आतंकवाद की फंडिंग रोकने और नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए लिया गया ‘साहसिक कदम’ था। लेकिन नौ साल बाद तस्वीर पूरी तरह उलट है, न काला धन खत्म हुआ, न नकली नोट रुके, न आतंकवाद थमा। खत्म हुआ तो सिर्फ जनता का विश्वास, कारोबार, रोजगार और करोड़ों लोगों का भविष्य। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि उत्सव प्रेमी मोदी सरकार नोट बंदी को याद करने से डरती क्यों है।
आरबीआई ने खोली सरकार की पोल
सरकार का दावा था कि काले धन के मालिक नोट बदलवा नहीं पाएंगे। लेकिन अगस्त 2018 की आरबीआई रिपोर्ट ने पूरे देश को हिला दिया कि बंद किए गए नोटों का 99.3 फीसदी वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आया। तो काला धन गया कहां, या फिर था ही नहीं? निर्णय तोड़-फोड़ करने वाला था, पर काले धन पर किसी तरह की चोट नहीं पहुंची। सच तो यह था कि काले धन का बड़ा हिस्सा नकदी में नहीं, बल्कि सोना, जमीन, विदेशों में जमा संपत्ति, हवाला और शेल कंपनियों में था। जहां नोटबंदी का कोई असर पड़ने वाला था ही नहीं। अर्थशास्त्रियों ने पहले ही चेताया था, पर सरकार ने कान बंद कर लिए, नतीजा देश भुगतता रहा। नौ साल बाद भी नकदी का इस्तेमाल दोगुना नोट बंदी का घोषित उद्देश्य कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाना था।
लेकिन आरबीआई के ताजा आंकड़े हैरत में डालते हैं।
2016 में चलन में नकदी 17.97 लाख करोड़, 2025 में चलन में नकदी 38.10 लाख करोड़ यानी नकदी दोगुने से ज्यादा बढ़ गई। तो नोट बंदी का फायदा किसको हुआ? जनता को तो नहीं। बैंकों का अस्थायी जमा बढ़ा, पर जनता की कमर टूट गई।
छोटे और मंझोले कारोबार तबाह
सबसे ज्यादा मार छोटे दुकानदारों, कारीगरों, दिहाड़ी मजदूरों, और मंझोले उद्योगों पर पड़ी। उनका कारोबार नकदी आधारित था। नोटबंदी ने महीनों तक उनके काम-धंधे को ठप कर दिया। कई उद्योग आज तक मजबूती से खड़े नहीं हो पाए। अनेक व्यापारियों ने कर्ज, घाटा और बेरोजगारी के कारण आत्महत्या कर ली।सरकार की नजर में यह ‘कोलेट्रल डैमेज’ था, यानि कमीनेपन की भाषा में साइड इफेक्ट।
बेरोजगारी ऐतिहासिक स्तर पर
नोटबंदी के बाद लाखों लोग नीचे गिरते गए।अनौपचारिक और असंगठित सेक्टर, जिसमें देश का सबसे बड़ा रोजगार ढांचा खड़ा है, टूटकर बिखर गया। आज बेरोजगारी दर आजाद भारत के इतिहास में उच्चतम स्तरों में है। नोटबंदी इसके मुख्य कारणों में से एक है। सरकार का जवाब सब अच्छा है।
अर्थव्यवस्था को झटका, जीडीपी रसातल में
नोटबंदी वह गोली थी जिसने एक तेज गति से दौड़ती अर्थव्यवस्था के टायरों में छेद कर दिया। जीडीपी कई तिमाहियों तक लड़खड़ाती रही। अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने इसे सही ही कहा कि यह दौड़ती कार के टायर में गोली मार देने जैसा था। नोटबंदी के बाद रुपये की कीमत गिरती गई, निर्यात कम हुआ, विदेशी निवेश घटा, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई, सरकार को आरबीआई का रिजर्व तोड़ने की नौबत आ गई। अगर यह ‘आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक’ थी, तो दर्द जनता को क्यों सहना पड़ा?
विदेशी धरती पर ठहाकों का अपमान
जहां देश की जनता बैंक की लाइन में दम तोड़ रही थी,
जहां शादियां टूट रही थीं, जहां मरीज इलाज के बिना मर रहे थे। उसी दौरान प्रधानमंत्री विदेशों में चुटकुले मारते हुए कहते थे कि घर में मां बीमार है, शादी है, लेकिन जेब में पैसे नहीं…और वहां बैठे लोग तालियां पीट रहे थे। यह दृश्य किसी त्रासदी का मजाक उड़ाने से कम नहीं था।
आतंकवाद और नकली नोट दोनों जस के तस
सरकार ने दावा किया था कि नकली नोट खत्म होंगे और आतंकवाद की फंडिंग रुक जाएगी लेकिन रुकी नहीं। बाजार में 2000 और 500 के नकली नोट मिलने लगे। आतंक की वारदातें कम नहीं हुईं। यानी नोटबंदी ने इन दोनों मोर्चों पर भी असफलता ही हासिल की।
‘50 दिन’ की धमकियां और 9 साल की खामोशी
नोटबंदी के पांच दिन बाद मोदी ने गोवा में कहा था कि
50 दिन दे दीजिए, उसके बाद जनता जो सजा देगी, मंजूर है। 50 दिन तो कब के बीत गए। अब 9 साल गुजर चुके हैं पर साहब आज तक उस फैसले का नाम लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। क्यों जवाब साफ है
नोटबंदी एक संगठित लूट थी, जिसे अब छुपाने के अलावा सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा।
* नोटबंदी की 9वीं बरसी पर सरकार और भाजपा का पूरा मौन, कोई कार्यक्रम नहीं।
* आरबीआई की रिपोर्ट 99.3 फीसदी नोट वापस लौटे, काले धन की कहानी फेल।
* डिजिटल लेनदेन बढ़ा, पर कैश सर्कुलेशन दोगुना कैशलेस का सपना ध्वस्त।
* छोटे व्यापार, कारीगर, दिहाड़ी मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित, कई आत्महत्याएं।
* बेरोजगारी ऐतिहासिक स्तर पर, नोटबंदी बड़ी वजह।
* जीडीपी को गहरा झटका, निर्यात, रुपया और निवेश पर नकारात्मक प्रभाव।
* आतंकवाद और नकली नोटों पर कोई असर नहीं, सरकार के सभी दावे झूठे सिद्ध।
* 50 दिन का समय मांगने वाले पीएम आज 9 साल बाद भी जवाब देने से बचते हैं।




