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न्याय के कटघरे में अदालत सरकार और न्यायपालिका की खतरनाक जुगलबंदी, आम जनता के अधिकारों की हो गयी हदबंदी

● न्याय के कटघरे में अदालत सरकार और न्यायपालिका की खतरनाक जुगलबंदी, आम जनता के अधिकारों की हो गयी हदबंदी

● आपातकाल की मंशा, लोकतंत्र का वर्तमान यथार्थ

● तारीफों से फैसलों तक न्यायिक निष्पक्षता पर प्रश्न

● रहम दिल अदालत और आर्थिक अपराधी, भगोड़े का याराना पूंजीवाद का न्यायिक कवच

● पर्यावरण कानून अमीरों के लिए अपवाद, गरीबों के लिए सजा

● राज्यपाल, केंद्र और सुप्रीम कोर्ट संघीय ढांचे पर हमला

● उन्नाव कांड जब पीड़िता ने न्यायपालिका पर उंगली उठाई

● विश्वास का संकट क्या न्याय अब सत्ता का औजार बन चुका है?

 

अजय कुमार शुक्ला

भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत दीवार मानी जाने वाली न्यायपालिका आज खुद सवालों के घेरे में है। यह सवाल किसी एक फैसले, किसी एक जज या किसी एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल न्यायपालिका की संस्थागत दिशा, उसकी प्राथमिकताओं और उसकी स्वतंत्रता को लेकर है। बीते कुछ वर्षों में बार-बार ऐसे फैसले आए हैं, जिनसे यह धारणा मजबूत होती चली गई है कि न्यायपालिका अब सत्ता के समानांतर नहीं, बल्कि सत्ता के साथ खड़ी नजर आती है। पांच दशक पहले आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका से प्रतिबद्धता की अपेक्षा जरूर जताई थी, लेकिन तब भी अदालतों के भीतर असहमति की आवाजें थीं। आज हालात इससे कहीं अधिक चिंताजनक हैं। अब प्रतिबद्धता कोई विचार नहीं, बल्कि व्यवहार बनती दिख रही है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीश न सिर्फ खुले मंचों से प्रधानमंत्री और सरकार की तारीफ करते दिखते हैं, बल्कि उनके फैसले भी बार-बार सत्तारूढ़ दल और उसके करीबी हितों के अनुकूल आते हैं। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि यदि कभी सर्वोच्च न्यायालय से सरकार की मंशा के विपरीत कोई फैसला आ जाए, तो सत्ता पक्ष के नेता न्यायाधीशों पर देश विरोधी होने तक के आरोप लगाने से नहीं हिचकते। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना पर लोकसभा में लगाए गए आरोप इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। यह न सिर्फ न्यायपालिका का अपमान है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन को तोड़ने की खुली कोशिश भी है। चिंता की बात यह है कि ऐसे आरोपों और दबावों के बावजूद न्यायपालिका की ओर से कोई ठोस आत्ममंथन या प्रतिरोध दिखाई नहीं देता। उल्टे, कई फैसले यह संकेत देते हैं कि अदालतें सत्ता के असहज होने से बचने की राह चुन रही हैं। चाहे वह आर्थिक अपराधियों को राहत देने का मामला हो, याराना पूंजीवाद को वैधता देने का प्रयास हो, पर्यावरण कानूनों की अनदेखी हो या फिर संघीय ढांचे को कमजोर करने वाली व्याख्याएं न्यायपालिका का रुख बार-बार सवालों में पड़ता है। सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब न्यायपालिका पर से जनता का विश्वास उठने लगे। उन्नाव सामूहिक बलात्कार कांड में उम्रकैद की सजा पाए भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से मिली जमानत के बाद जो दृश्य सामने आए, वे इसी टूटते विश्वास का प्रमाण हैं। पीड़िता का खुलेआम यह कहना कि जजों ने पैसे लेकर फैसला दिया, भले ही कानूनी तौर पर अवमानना हो, लेकिन यह उस गुस्से और हताशा की अभिव्यक्ति है, जो आम नागरिक के मन में घर कर चुकी है।

सरकार-न्यायपालिका की खतरनाक जुगलबंदी और लोकतंत्र का वर्तमान यथार्थ

भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत और अंतिम दीवार मानी जाने वाली न्यायपालिका आज स्वयं कठघरे में खड़ी दिखाई देती है। यह संकट किसी एक फैसले, किसी एक पीठ या किसी एक न्यायाधीश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की संस्थागत आत्मा, उसकी स्वतंत्रता और उसकी प्राथमिकताओं से जुड़ा हुआ प्रश्न है। बीते कुछ वर्षों में लगातार ऐसे निर्णय, टिप्पणियां और घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे यह धारणा गहराती जा रही है कि न्यायपालिका सत्ता के समांतर खड़ी संस्था नहीं, बल्कि कई मामलों में सत्ता के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि खतरनाक भी है। क्योंकि यदि न्यायपालिका पर जनता का विश्वास डगमगाता है, तो संविधान की पूरी संरचना चरमरा जाती है।

आपातकाल की मंशा और आज का न्यायिक यथार्थ

पांच दशक पहले आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह अपेक्षा जरूर जताई थी कि न्यायपालिका सरकार के प्रति प्रतिबद्ध हो। उस दौर में यह बयान लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी माना गया था। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि उसी दौर में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना जैसे जज खड़े थे, जिन्होंने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से इंकार कर दिया और व्यक्तिगत कीमत चुकाकर भी संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की। आज हालात उससे अधिक जटिल और चिंताजनक हैं। फर्क यह है कि अब प्रतिबद्धता किसी विचार या बयान तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार और फैसलों में दिखाई देती है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीश खुले मंचों से प्रधानमंत्री और सरकार की तारीफ करते नजर आते हैं, जो न्यायिक मर्यादा और निष्पक्षता पर सीधा प्रश्न खड़ा करता है।

तारीफों से फैसलों तक निष्पक्षता पर प्रश्न

न्यायपालिका की ताकत उसके फैसलों से ज्यादा उसकी निष्पक्षता की धारणा में होती है। लेकिन जब न्यायाधीश सार्वजनिक मंचों पर सत्ता की सराहना करते हैं और उसके बाद उन्हीं सत्ता-संरचनाओं के हित में फैसले आते हैं, तो संदेह स्वाभाविक है। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि यदि कभी सर्वोच्च न्यायालय से सरकार की मंशा के विपरीत कोई फैसला आ जाए, तो सत्ता पक्ष के नेता न्यायाधीशों को देशविरोधी तक करार देने से नहीं हिचकते। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना पर संसद में लगाए गए आरोप केवल व्यक्तिगत हमला नहीं थे, बल्कि यह न्यायपालिका को डराने और सीमित करने की राजनीतिक कोशिश थी। चिंता की बात यह है कि ऐसे हमलों के बावजूद न्यायपालिका की ओर से कोई सशक्त संस्थागत प्रतिरोध या आत्ममंथन नजर नहीं आता।

आर्थिक अपराधियों पर न्याय की रहम दिल न्यायपालिका का सबसे विवादास्पद चेहरा तब सामने आता है जब बात आर्थिक अपराधियों की होती है। स्टर्लिंग बायोटेक घोटाले में संदेसरा बंधुओं पर 14,000 करोड़ रुपये से अधिक के आरोप थे, लेकिन महज 5,100 करोड़ रुपये चुकाकर उन्हें राहत मिल जाना यह संकेत देता है कि अब अपराध भी सेटलमेंट का विषय बन चुका है।

पर्यावरण कानून अमीरों के लिए अपवाद, गरीबों के लिए सजा

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में न्यायपालिका का रुख और भी चिंताजनक रहा है। बिना पर्यावरण मंजूरी शुरू की गई परियोजनाओं को बाद में वैध ठहराने की अनुमति देना कानून की आत्मा की हत्या के समान है। दो जजों की बेंच द्वारा दिए गए सख्त फैसलों को तीन जजों की बेंच द्वारा पलट देना यह साबित करता है कि पर्यावरण न्याय अब प्रकृति और आम नागरिक के लिए नहीं, बल्कि कॉरपोरेट सुविधा का औजार बनता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा वही गरीब और आदिवासी समुदाय भुगतते हैं, जिनकी जमीन, पानी और जीवन इन परियोजनाओं की बलि चढ़ा दी जाती है।

संघीय ढांचे पर न्यायिक प्रहार

संविधान का संघीय ढांचा केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन पर आधारित है। लेकिन राज्यपालों की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट के बदले हुए रुख ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। अप्रैल में गैर-एनडीए शासित राज्यों के पक्ष में आया फैसला संघीय ढांचे के लिए उम्मीद की किरण था, लेकिन राष्ट्रपति रेफरेंस के जरिए उसे निष्प्रभावी कर देना यह दर्शाता है कि संविधान की व्याख्या भी सत्ता की सुविधा के अनुसार बदली जा सकती है। यह न केवल राज्यों की स्वायत्तता पर हमला है, बल्कि लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के मूल विचार के खिलाफ भी है।

उन्नाव कांड न्यायपालिका की नैतिक हार

उन्नाव सामूहिक बलात्कार कांड में उम्रकैद की सजा पाए भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से मिली जमानत न्यायपालिका की संवेदनहीनता का प्रतीक बन गई। यह महज एक कानूनी निर्णय नहीं था, बल्कि पीड़िता और समाज के प्रति नैतिक असंवेदनशीलता का उदाहरण था।

पीड़िता का यह कहना कि जजों ने पैसे लेकर फैसला दिया भले ही कानूनी तौर पर अवमानना हो, लेकिन यह उस गहरे आक्रोश और टूटते विश्वास की अभिव्यक्ति है, जो आम नागरिक के मन में पल रहा है। यदि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप न करना पड़ता, तो यह फैसला न्याय व्यवस्था पर स्थायी धब्बा बन जाता।

विश्वास का संकट क्या न्याय सत्ता का औजार बन चुका!

सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब जनता का भरोसा न्यायपालिका से उठने लगे। लोकतंत्र में सरकारें बदल सकती हैं, नीतियां बदल सकती हैं, लेकिन न्यायपालिका पर भरोसा टूटना पूरे सिस्टम को खोखला कर देता है। आज सवाल यह नहीं है कि कोई एक फैसला सही था या गलत। सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका अपनी संवैधानिक भूमिका निभा पा रही है? क्या वह सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती है? या फिर वह सत्ता के असहज होने से बचने की राह चुन रही है? न्यायपालिका की स्वतंत्रता गंभीर संकट में है

सत्ता और अदालत के बीच बढ़ती नजदीकी लोकतंत्र को कमजोर कर रही है आर्थिक अपराधियों के लिए नरमी और गरीबों के लिए सख्ती न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। याराना पूंजीवाद को न्यायिक संरक्षण मिल रहा है, पर्यावरण कानूनों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। संघीय ढांचे को कमजोर करने वाली व्याख्याएं सामने आ रही हैं।

* न्यायपालिका की स्वतंत्रता गंभीर संकट में
* सत्ता और अदालत के बीच बढ़ती नजदीकी
* आर्थिक अपराधियों के लिए नरमी
* याराना पूंजीवाद को न्यायिक संरक्षण
* पर्यावरण कानूनों की खुली अवहेलना
* संघीय ढांचे को कमजोर करने वाले फैसले
* बलात्कार जैसे मामलों में भी न्यायिक संवेदनहीनता
* जनता का टूटता विश्वास लोकतंत्र के लिए खतरा

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