परमाणु क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी,देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी बड़ी भारी
परमाणु सुरक्षा का निजीकरण शांति विधेयक या कॉरपोरेट के लिए रेडियोधर्मी छूट का लाइसेंस

● परमाणु क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी, देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी बड़ी भारी
● परमाणु सुरक्षा का निजीकरण शांति विधेयक या कॉरपोरेट के लिए रेडियोधर्मी छूट का लाइसेंस
● परमाणु संयंत्र अब कॉरपोरेट के हवाले निजी और विदेशी कंपनियों को निर्माण से संचालन तक खुली छूट
● दुर्घटना में आपूर्तिकर्ता बेदाग दोषपूर्ण उपकरण पर भी जवाबदेही खत्म
● अदालतों के दरवाजे बंद पीड़ितों के लिए सिविल कोर्ट में जाने पर रोक
● भोपाल जैसी त्रासदी का रास्ता साफ मुनाफा निजी, जोखिम जनता का
● अमेरिकी दबाव में बदला भारतीय कानून ट्रंप फैक्टर निर्णायक
● भाजपा का यू-टर्न विपक्ष में विरोध, सत्ता में समर्पण
‘शांति’ नाम, असर विस्फोटक सुरक्षा नहीं, कानूनी ढाल
● परमाणु ऊर्जा नहीं, दायित्व का अपहरण संविधानिक सवाल खड़े
◆ अंशिका मौर्या
नई दिल्ली/वाराणसी: मोदी सरकार द्वारा लोकसभा में पेश नाभकीय ऊर्जा का सतत दोहन एवं उन्नयन विधेयक (शांति), 2025 को अगर सिर्फ ऊर्जा नीति का विस्तार माना जा रहा है, तो यह या तो राजनीतिक भोलेपन का प्रमाण है या फिर जानबूझकर आंख मूंद लेने की कोशिश। असल में यह विधेयक भारत की परमाणु नीति का सबसे खतरनाक मोड़ है, जहां सुरक्षा, जवाबदेही और न्याय तीनों को एक साथ कॉरपोरेट हितों के नीचे कुचल दिया गया है। इस विधेयक के जरिए सरकार ने वह कर दिखाया है, जिसकी मांग अमेरिकी परमाणु लॉबी पिछले डेढ़ दशक से कर रही थी। सप्लायर लायबिलिटी का अंत और निजी कंपनियों के लिए परमाणु क्षेत्र का पूर्ण उद्घाटन। 2010 का परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि उसने भोपाल गैस त्रासदी के सबक को कानून में ढाला था कि अगर तकनीक देने वाला दोषी है, तो वह भी जवाबदेह होगा। अब उसी कानून को ‘शांति’ के नाम पर दफना दिया गया है।
सबसे गंभीर बात यह है कि अब परमाणु संयंत्रों का निर्माण, स्वामित्व, संचालन और यहां तक कि बंद करने का अधिकार भी निजी और विदेशी कंपनियों को देने की तैयारी है। यह वही परमाणु क्षेत्र है, जिसे अब तक राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित के नाम पर सिर्फ न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड जैसे सार्वजनिक उपक्रमों तक सीमित रखा गया था। सरकार अब कह रही है जो चाहे आए, जो चाहे बनाए, जो चाहे चलाए।
लेकिन सवाल यह नहीं कि निजी क्षेत्र आए या नहीं। सवाल यह है कि जब दुर्घटना होगी और परमाणु इतिहास बताता है कि दुर्घटनाएं अपवाद नहीं, संभावना होती हैं, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? जवाब साफ है न आपूर्तिकर्ता की, न निजी कंपनी की। अंततः सरकार और जनता की। ‘शांति’ विधेयक न केवल आपूर्तिकर्ताओं की जिम्मेदारी खत्म करता है, बल्कि पीड़ितों को अदालत जाने के अधिकार से भी वंचित करता है। सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर रोक लगाकर सरकार ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भविष्य में किसी परमाणु हादसे के बाद न्याय कानूनी अधिकार नहीं, सरकारी कृपा बन जाएगा। यह विधेयक ऐसे समय आया है जब डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी ने भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं को नया दबाव दिया है। अमेरिकी कंपनियां भारत में अरबों डॉलर के परमाणु रिएक्टर बेचना चाहती हैं, लेकिन बिना कानूनी जोखिम के। मोदी सरकार ने वही जोखिम अपने नागरिकों पर डालने का फैसला कर लिया है।
निजी कंपनियों और विदेशी निवेशकों के लिए परमाणु दरवाके पूरी तरह खुले
‘शांति’ विधेयक का सबसे दूरगामी और विवादास्पद प्रावधान यह है कि अब कोई भी सरकारी विभाग, सार्वजनिक उपक्रम, संयुक्त उद्यम या निजी कंपनी परमाणु ऊर्जा संयंत्र या रिएक्टर का निर्माण, स्वामित्व, संचालन और बंद कर सकेगी। यह बदलाव मामूली नहीं है। अब तक यह अधिकार केवल एनपीसीआईएल के पास था, ताकि परमाणु गतिविधियां सीधे राज्य के नियंत्रण में रहें। विधेयक पारित होने के बाद निजी कंपनियों को न सिर्फ संयंत्र चलाने, बल्कि परमाणु ईंधन निर्माण, यूरेनियम-235 का रूपांतरण, शोधन और संवर्धन, प्रयुक्त ईंधन का परिवहन और भंडारण, परमाणु तकनीक, उपकरण और सॉफ्टवेयर का आयात-निर्यात जैसी गतिविधियों के लिए भी लाइसेंस दिए जाएंगे। यानी परमाणु ऊर्जा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय नहीं, कारोबारी अवसर बन जाएगी।
सरकार खुद भी उलझन में
विधेयक में एक विरोधाभास भी छिपा है। एक ओर निजी कंपनियों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं, दूसरी ओर यह कहा गया है कि रेडियोधर्मी पदार्थ का संवर्धन, प्रयुक्त ईंधन का पुनर्संसाधन और उच्च स्तरीय अपशिष्ट का प्रबंधन केवल केंद्र सरकार ही करेगी। जब तक कि सरकार यू-235 को ‘निर्धारित पदार्थ’ न माने। यह अस्पष्टता बताती है कि सरकार खुद भी जानती है कि वह कितनी खतरनाक जमीन पर कदम रख रही है। दायित्व और क्षतिपूर्ति: सुरक्षा नहीं, सीमा निर्धारण ‘शांति’ विधेयक कहता है कि परमाणु दुर्घटना के लिए ऑपरेटर जिम्मेदार होगा, लेकिन दायित्व की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है—300 मिलियन एसडीआर। यह राशि किसी बड़े परमाणु हादसे में होने वाले पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और सामाजिक नुकसान के सामने नगण्य है।
सबसे गंभीर बात यह है कि सीएलएनडीए की धारा 5(2) को हटा दिया गया है, जो यह सुनिश्चित करती थी कि मुआवजा देने के बाद भी अन्य कानूनों के तहत पर्यावरणीय या अपकृत्य दावे किए जा सकें। अब ऑपरेटर उस मुआवजे को कानूनी ढाल की तरह इस्तेमाल कर सकेगा।
सप्लायर लायबिलिटी का अंतिम संस्कार
धारा 17(ख) और 46—दोनों का सफाया कर दिया गया है। अब आपूर्तिकर्ता से वसूली का अधिकार नहीं पीड़ितों को अदालत में मुकदमा करने का अधिकार नहीं
यह वही मांग थी, जिसे अमेरिकी कंपनियां 2010 से उठाती आ रही थीं।
विपक्ष की आपत्ति, सरकार की बेरुखी
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इसे राज्य के सार्वजनिक विश्वास दायित्वों का हनन बताया। उन्होंने कहा कि लाभ निजी और जोखिम सार्वजनिक करना संविधान की भावना के खिलाफ है। सरकार का वही पुराना जवाब चर्चा बाद में जबकि इतिहास बताता है कि जब ऐसे कानून एक बार पारित हो जाते हैं, तो चर्चा सिर्फ किताबों में रह जाती है।
* परमाणु क्षेत्र निजी और विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया
* एनपीसीआईएल का एकाधिकार समाप्त
* आपूर्तिकर्ताओं की जवाबदेही लगभग खत्म
* पीड़ितों के लिए अदालत का रास्ता बंद
* दायित्व की सीमा तय, नुकसान असीम
* अमेरिकी दबाव में कानून परिवर्तन
* भाजपा का 2010 से उलटा रुख
* परमाणु सुरक्षा से बड़ा कॉरपोरेट हित




