परमाणु सुरक्षा पर नई नीति हो रही पास, मोदी जी देश सुरक्षा व्यवस्था का कर रहे सत्यानाश

● परमाणु सुरक्षा पर नई नीति हो रही पास, मोदी जी देश सुरक्षा व्यवस्था का कर रहे सत्यानाश
● परमाणु सुरक्षा की बलि पर कॉरपोरेट एंट्री, मोदी सरकार का ‘शांति’ विधेयक या पीड़ितों के अधिकारों का अंत
● दुर्घटना हुई तो आपूर्तिकर्ता बरी! नए विधेयक में परमाणु उपकरण देने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी शून्य
● पीड़ितों के मुकदमे पर ताला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर सीधी रोक
● 2010 के कानून की आत्मा खत्म धारा 17(ख) और 46 को किया दफन
● निजी कंपनियों के लिए रेड कार्पेट, सार्वजनिक सुरक्षा पीछे
● अमेरिकी परमाणु लॉबी का दबाव रंग लाया भारत का कानून बदला
● मोदी सरकार का दोहरा चरित्र विपक्ष में विरोध, सत्ता में समर्पण
● भोपाल की छाया फिर मंडराई जिम्मेदारी बिना जवाबदेही
नई दिल्ली/लखनऊ: मोदी सरकार ने एक बार फिर ऐसा विधायी दांव चला है, जो कागज पर ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी उन्नयन की भाषा में लिपटा है, लेकिन उसकी असल आत्मा में कॉरपोरेट सुरक्षा और पीड़ितों की चुप्पी लिखी हुई है। 15 दिसंबर को लोकसभा में पेश किया गया नाभकीय ऊर्जा का सतत दोहन एवं उन्नयन विधेयक (शांति), 2025 भारत के परमाणु इतिहास में एक ऐसा मोड़ है, जहां से सुरक्षा की बजाय समझौते, जवाबदेही की बजाय छूट और जनहित की बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सुविधा को प्राथमिकता दी गई है।
यह विधेयक न सिर्फ परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 (सीएलएनडीए) को अप्रासंगिक करता है, बल्कि उस सख्त कानूनी ढांचे को भी तोड़ता है, जिसे भोपाल गैस त्रासदी जैसी घटनाओं से सबक लेकर बनाया गया था। 2010 का कानून इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि उसने पहली बार परमाणु आपूर्तिकर्ताओं को भी जिम्मेदारी के दायरे में खड़ा किया था। यही बात अमेरिकी परमाणु लॉबी को चुभती रही और अब वही चुभन भारत के कानून में स्थायी बदलाव बनकर दर्ज हो गई है। विडंबना यह है कि जिस भाजपा ने 2010 में विपक्ष में रहते हुए वाम दलों के साथ मिलकर धारा 17(ख) और 46 से किसी भी तरह की छेड़छाड़ का विरोध किया था, वही भाजपा आज सत्ता में आकर उन धाराओं को ही मिटाने पर उतारू है। तब तर्क था कि पीड़ितों के अधिकार सर्वोपरि हैं। आज तर्क है निवेश और ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है। सवाल यह है कि क्या निवेश की कीमत जनता की जान और न्याय के अधिकार से चुकाई जाएगी। ‘शांति’ विधेयक का नाम जितना सौम्य है, उसका प्रभाव उतना ही भयावह। यह विधेयक परमाणु दुर्घटना की स्थिति में न सिर्फ आपूर्तिकर्ताओं को दोषमुक्त करता है, बल्कि पीड़ितों को अदालत तक जाने के अधिकार से भी वंचित करता है। यानी दुर्घटना होगी तो फैसला सरकार द्वारा नियुक्त निकाय करेंगे, अदालतें नहीं। यह व्यवस्था न्याय नहीं, नियंत्रित न्याय की ओर कदम है। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय आया है जब अमेरिका के साथ व्यापारिक वार्ताएं फिर से तेज हैं और डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने अमेरिकी निगमों के लिए भारत में अनुकूल माहौल बनाने का दबाव बढ़ा दिया है। परमाणु क्षेत्र खोलना उसी दबाव की एक कड़ी है। सवाल यह नहीं कि निजी कंपनियां आएं या नहीं, सवाल यह है कि अगर उनका उपकरण फेल हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी होगी। मोदी सरकार जवाब नहीं देती। वह विधेयक के उद्देश्य और कारण में सुरक्षा और दायित्व का हवाला तो देती है, लेकिन असल धाराओं में दायित्व को गायब कर देती है। यह वही राजनीतिक चालाकी है, जिसमें विवादास्पद फैसलों को तकनीकी भाषा में छिपा दिया जाता है ताकि संसद और जनता दोनों को भ्रम में रखा जा सके।
2010 का कानून क्यों चुभता था अमेरिका को
परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 दुनिया के उन गिने-चुने कानूनों में था, जो सप्लायर लायबिलिटी को मान्यता देता था। धारा 17(ख) अगर दुर्घटना दोषपूर्ण उपकरण, घटिया सामग्री या लापरवाही तो संचालक मुआवजा देने के बाद आपूर्तिकर्ता से वसूली कर सकता था। धारा 46 पीड़ितों को यह अधिकार कि वे संचालक के खिलाफ दीवानी मुकदमा कर सकें। अमेरिकी कंपनियां चाहती थीं कि भारत भी अंतरराष्ट्रीय प्रथा की तरह केवल ऑपरेटर लायबिलिटी अपनाए। यानी कंपनी मुनाफा कमाए, लेकिन गलती हुई तो जिम्मेदारी उसकी नहीं। परमाणु नीति नहीं, कॉरपोरेट सुरक्षा का दस्तावेज ‘शांति’ विधेयक को अगर सिर्फ एक तकनीकी सुधार या ऊर्जा नीति का हिस्सा मान लिया जाए, तो यह सबसे बड़ी भूल होगी। यह विधेयक दरअसल परमाणु क्षेत्र में जवाबदेही की अवधारणा को ही उलट देने वाला कानून है। जहां पहले दुर्घटना के बाद सवाल पूछा जा सकता था गलती किसकी थी? वहीं अब सरकार ने सवाल पूछने के रास्ते ही बंद कर दिए हैं। परमाणु ऊर्जा ऐसा क्षेत्र है जहां एक छोटी चूक भी पीढ़ियों तक असर छोड़ती है। विकिरण का दुष्प्रभाव सीमाओं, सरकारों और समय को नहीं मानता। ऐसे में यदि उपकरण दोषपूर्ण हों, तकनीक अधूरी हो या आपूर्ति में लापरवाही हो, तो उसकी कीमत सिर्फ आज नहीं, आने वाली पीढ़ियां चुकाती हैं। इसके बावजूद मोदी सरकार ने आपूर्तिकर्ताओं को कानूनी ढाल दे दी है।
संसद से बाहर जनता, कानून के भीतर कॉरपोरेट
इस विधेयक का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को विधायी चतुराई से निष्क्रिय करता है। धारा 81 के जरिए सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को समाप्त करना सीधा संदेश है कि आप न्याय नहीं मांग सकते, सरकार तय करेगी कि आपको कितना और कब मिलेगा। यह व्यवस्था न्याय नहीं, प्रशासनिक दया है। पीड़ित अब नागरिक नहीं, याचक बन जाएंगे। यह संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 की आत्मा के भी विपरीत है, क्योंकि जब दीवानी अदालतों के रास्ते बंद होते हैं, तो न्याय का दायरा सिमटता है।
निजी कंपनियों को परमाणु चाबी सौंपने की हड़बड़ी क्यों?
सरकार का तर्क है कि भारत को 2047 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य हासिल करना है, ऊर्जा की मांग बढ़ रही है, इसलिए निजी निवेश जरूरी है। सवाल यह नहीं कि निजी निवेश आए या नहीं। सवाल यह है कि बिना जवाबदेही के क्यों? अगर निजी कंपनियां इतनी ही सक्षम और विश्वसनीय हैं, तो वे दायित्व से क्यों डरती हैं, अगर उनका उपकरण सुरक्षित है, तो कानूनी जिम्मेदारी से बचने की इतनी बेचैनी क्यों है। इसका सीधा उत्तर है मुनाफा निजी, जोखिम सार्वजनिक।
अमेरिकी दबाव नाम बदला, नीति वही
2010 से लेकर अब तक एक बात साफ रही है कि अमेरिकी परमाणु लॉबी भारत के कानून को अपने हिसाब से ढालना चाहती थी। पहले ओबामा प्रशासन
फिर ट्रंप। हर दौर में दबाव एक ही रहा सप्लायर लायबिलिटी खत्म करो। मोदी सरकार ने पहले अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न के जरिए रास्ता बनाया, अब पूरे कानून को बदल दिया। यह कोई संयोग नहीं कि यह विधेयक ऐसे समय आया है जब भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता फिर गरम है और रक्षा, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सौदे तय हो रहे हैं। परमाणु कानून को कमजोर करना उसी सौदेबाज़ी की कीमत है।
भाजपा का वैचारिक पतन यह विधेयक सिर्फ नीति परिवर्तन नहीं, राजनीतिक पाखंड का प्रमाण भी है।
2010 में भाजपा ने संसद में कहा था कि भोपाल की पुनरावृत्ति नहीं होने देंगे। आज वही भाजपा कह रही है कि निवेश के लिए कानून लचीला होना चाहिए। तब पीड़ितों के साथ खड़ी पार्टी, आज कॉरपोरेट के साथ खड़ी है। तब संसद में हंगामा, आज चुप्पी। यह बदलाव विचारधारा का नहीं, सत्ता का असर है। ‘शांति’ नाम का छल और सबसे बड़ा धोखा इस विधेयक का नाम है। परमाणु इतिहास बताता है कि जहां जवाबदेही नहीं होती, वहां शांति नहीं, त्रासदी जन्म लेती है चेर्नोबिल, फुकुशिमा, थ्री माइल आइलैंड इन सभी हादसों ने एक बात सिखाई सुरक्षा नियम और कानूनी जवाबदेही ही असली ढाल है। भारत अब उसी ढाल को खुद उतार रहा है। भविष्य की अदालतों में सवाल नहीं, सिर्फ अफसोस बचेगा जब अगली परमाणु दुर्घटना होगी, इतिहास बताता है कि दुर्घटनाएं अगर नहीं, कब का सवाल होती हैं। तब न आपूर्तिकर्ता कटघरे में होगा, न कंपनी, न अदालत। कटघरे में होगा सिर्फ पीड़ित, जो पूछेगा कि मेरी गलती क्या थी और सरकार जवाब देगी कानून यही कहता है।
मोदी सरकार का यू-टर्न
2015 में ओबामा की भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्रालय द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न पहला संकेत था कि सरकार कानून को कमजोर करना चाहती है। सार्वजनिक रूप से संशोधन नहीं हुआ, लेकिन व्याख्या के जरिए धाराओं को सीमित कर दिया गया। अब ‘शांति’ विधेयक उसी प्रक्रिया का अंतिम चरण है व्याख्या नहीं, सीधा उन्मूलन। धारा 17 और 46 का सफाया, शांति विधेयक की धारा 16 में आपूर्तिकर्ता दायित्व से जुड़ा पूरा खंड गायब, धारा 81 के जरिए सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र समाप्त। यानी अब परमाणु दुर्घटना हुई तो पीड़ित अदालत नहीं जाएंगे, बल्कि सरकारी ढांचे के भीतर ही निपटारा होगा।
निजी कंपनियों की एंट्री किस कीमत पर?
सरकार कहती है कि निजी क्षेत्र आएगा तो निवेश बढ़ेगा, तकनीक आएगी। लेकिन सवाल यह है कि
क्या सुरक्षा मानकों पर कोई अतिरिक्त सख्ती है।
क्या आपूर्तिकर्ता की गलती साबित होने पर भी वह बरी रहेगा। उत्तर साफ है हां, वह बरी रहेगा।
भोपाल गैस त्रासदी की याद
भोपाल में यूनियन कार्बाइड ने यही किया था कानूनी छेद, सरकार की ढील और अंततः पीड़ितों को अधूरा न्याय। ‘शांति’ विधेयक उसी इतिहास को दोहराने का खतरा पैदा करता है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव परमाणु तकनीक का है। राजनीतिक चुप्पी और संसदीय औपचारिकता विधेयक पेश हुआ, लेकिन न तो व्यापक बहस, न सार्वजनिक विमर्श। सरकार जानती है कि सीधे तौर पर दायित्व खत्म कहने से राजनीतिक नुकसान होगा, इसलिए इसे ऊर्जा नीति की भाषा में लपेटा गया।
* नया ‘शांति’ विधेयक 2010 के दायित्व कानून को खत्म करता है
* आपूर्तिकर्ताओं की जिम्मेदारी लगभग समाप्त
पीड़ितों के सिविल मुकदमे का अधिकार छीना गया
* निजी कंपनियों के लिए परमाणु क्षेत्र खोला गया
अमेरिकी दबाव और व्यापारिक सौदे पृष्ठभूमि में
* भाजपा का 2010 के रुख से पूर्ण यू-टर्न
सुरक्षा से ज्यादा कॉरपोरेट सुविधा पर जोर
* भविष्य में बड़े हादसों का कानूनी रास्ता साफ




