
-क्या अब हरदीप पुरी पर गिरेगी इस्तीफे की गाज?
– बजट सत्र का दूसरा हिस्सा 9 मार्च को, भाजपा के पास एक महीना
– इस एक महीने में हरदीप पुरी की हो सकती है सरकार से विदाई
– संसद का फ्लोर मैनेजमेंट गड़बड़ाया, विपक्ष के हमले से झुकी सरकार
– अब इधर कुआं, उधर खाई की नौबत- दो खेमों में बंट गई भाजपा

नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र में जनरल नरवणे की किताब पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोकने के मामले पर उठा बवाल अभी थमा भी नहीं था कि पहले भारत-अमेरिका ट्रेड डील और अब एप्सटीन फाइल्स में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी का नाम आने से सत्र का आधा हिस्सा हंगामे और विवादों की भेंट चढ़ चुका है।
बजट सत्र का शुक्रवार को आखिरी दिन था। अब सत्र का दूसरा हिस्सा 9 मार्च से शुरू होगा। लेकिन पहले हिस्से में उठे विवादों के बीच भाजपा सांसदों के ही सेल्फ गोल ने पार्टी को दो खेमों में बांट दिया है। इसी का नतीजा यह बताया जाता है कि भाजपा राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार का प्रस्ताव नही ला सकी। सरकार की जमकर छीछालदार हुई और इस पूरे मामले ने पार्टी की छवि को कमजोर किया।



पहला गोल रिजिजू ने किया
वित्त मंत्री के बजट भाषण के दौरान जब विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी पर अमेरिका से ट्रेड डील के मामले में समझौता करने का आरोप लगाया तो सत्ता पक्ष में खलबली मच गई। राहुल गांधी ने अपने 52 मिनट के भाषण में अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए ट्रेड डील का खासतौर पर जिक्र करते हुए कहा कि इस डील में बांग्लादेश को भारत की तुलना में बढ़त मिली हुई है। अब बांग्लादेश अमेरिका से कपास खरीदकर अपने यहां रेडिमेड कपड़े बनाकर शून्य फीसदी टैरिफ पर अमेरिका में बेचेगा। लेकिन भारत अगर अमेरिका से कपास खरीदकर अपने कपड़े अमेरिका में बेचेगा तो उसे 18 फीसदी शुल्क चुकाना होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत ने अमेरिका से ट्रेड डील में अपने कपास उत्पादक किसानों के हितों का ख्याल नहीं रखा। राहुल के अनुसार, इसी का नतीजा है कि तिरुपुर, कोयंबटूर, सूरत और लुधियाना जैसे टेक्सटाइल हब जल्दी ही तबाह हो जाएंगे और इसका असर उन 4.5 करोड़ कामगारों पर पड़ेगा, जिनकी नौकरी जा सकती है। राहुल ने दो-टूक शब्दों में कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के किसानों का हक अमेरिका को बेच दिया है, क्योंकि अब अमेरिका अपने यहां से दालों का भी भारत में शून्य प्रतिशत शुल्क पर भारत में निर्यात का दबाव डाल रहा है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने एप्सटीन फाइल के जारी होने के बाद अमेरिका के आगे घुटने टेक दिए हैं, क्योंकि उनकी सरकार के एक मंत्री का नाम इसमें आया है। राहुल के इन आरोपों पर संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने सभी आरोपों को साबित करने की मांग की तो राहुल ने भी जोरदार पलटवार करते हुए कहा कि वे आरोपों को अभी साबित करने को तैयार हैं। हालांकि, इस नोंक-झोंक के बीच लोकसभा में स्पीकर की भूमिका निभा रहे जगदंबिका पाल ने बीच-बचाव करते हुए कहा कि आरोपों को साबित करने की मांग संसदीय कार्यमंत्री की है, सदन की नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किरण रिजिजू का यह सेल्फ गोल था। जाने-माने राजनीतिक समीक्षण विनोद अग्निहोत्री कहते हैं कि एक तो लोकसभा में विशेषाधिकार समिति का न होना, और फिर विशेषाधिकार का प्रस्ताव लाने के लिये राहुल के भाषण का वह सब रिकॉर्ड पर लाना पड़ता जिससे सरकार असहज थी। इसी को देखते हुए सरकार ने पैंतरा बदला और निशिकांत दुबे के प्रस्ताव को आगे किया।
इसलिए नहीं आया निशिकांत का प्रस्ताव
लोकसभा में राहुल के भाषण के बाद संसद के गलियारों में सत्ता पक्ष के सांसदों में भी तारीफ के शब्द साफ सुनाई दे रहे थे। भाजपा के कई सांसदों ने दबी जुबान में राहुल के भाषण की तारीफ की, जिससे यह साफ दिखाई दे रहा था कि ट्रेड डील और एप्सटीन फाइल्स को लेकर भाजपा सांसदों के भीतर ही पार्टी लाइन पर एकजुटता नहीं है। वे दो खेमों में बंटे हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बात को भांपकर ही पार्टी आलाकमान ने अगले दिन भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के विशेषाधिकार प्रस्ताव को सदन में पेश होने से रोक दिया। इससे पहले निशिकांत दुबे मीडिया से यह कहते फिर रहे थे कि उनके प्रस्ताव में राहुल गांधी की संसद सदस्यता को हमेशा के लिए निलंबित करने और उन्हें संसद के सत्र में भाग लेने पर आजीवन पाबंदी लगाने की बात कही गई है।
हरदीप पुरी का भी सेल्फ गोल
केंद्रीय मंत्री ने भी संसद सत्र के बीच में मीडिया के सामने अपनी सफाई पेश कर दूसरा सेल्फ गोल किया है। उन्होंने पहले तो अपनी सफाई में यह माना कि वे 2008 में अपराधी साबित हो चुके बाल यौन शोषणकारी, हत्यारे जेफ्री एप्सटीन से 4 बार मिले थे। उनकी इस स्वीकारोक्ति ने ही भाजपा के उस रुख को सीधे नकार दिया, जिसमें पार्टी दावा कर रही थी कि एप्सटीन फाइल्स में जितनी भी जानकारियां निकलकर आई हैं, वे सभी झूठी हैं। पुरी ने दावा किया कि वे खुद एप्सटीन से मिलने नहीं गए। वे 2014 में इंडियन पीस इंस्टीट्यूट में अपने बॉस के साथ एप्सटीन से मिलने गए थे। लेकिन उनके इस बयान के तुरंत बात सोशल मीडिया पर अमेरिकी न्याय विभाग से जारी जानकारियों के हवाले से यह बात साबित हो गई कि हरदीप पुरी केवल 2014 में ही नहीं, बल्कि 2017 तक एप्सटीन के संपर्क में रहे और दोनों के बीच संदेशों को आदान-प्रदान होता रहा। एप्सटीन फाइलों में हरदीप पुरी का नाम कुल 430 बार आया है।
बलि का बकरा बनेंगे हरदीप पुरी?
इस पूरे घटनाक्रम में दो बातें बहुत साफतौर पर उभर चुकी हैं। एक तो यह कि बजट सत्र में भाजपा का फ्लोर मैनेजमेंट बहुत ही कमजोर रहा और इसकी जिम्मेदारी पार्टी व्हिप और संसदीय कार्यमंत्री पर आयद होती है। दूसरी बात यह कि स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के कारण उनके सदन में न रहने के कारण पूरी व्यवथा चरमरा गई। किरण रिजिजू ने संसद में अपनी बात रखने की जगह बाहर मीडिया में अपनी बात कही और उन्होंने स्पीकर के केबिन में विपक्ष की महिला सांसदों की चर्चा के संपादित वीडियो फुटेज जारी करते हुए आरोप लगाए। हरदीप पुरी ने भी सदन में अपनी बात कहने की जगह बाहर निकलकर मीडिया को इंटरव्यू दिए, जिससे हालात और बिगड़े।
भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि भाजपा नेतृत्व के लिए डैमेज कंट्रोल के रूप में कुछ बड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी का इस्तीफा लगभग तय माना जा रहा है। इसमें सबसे बड़ा जोखिम यह भी है कि अगर पार्टी पुरी का इस्तीफा लेती है तो एप्सटीन फाइल्स में सामने आई सारी जानकारियों की विश्वसनीयता पर मुहर लग जाएगी। हमलावर विपक्ष इसे अपनी बड़ी जीत के रूप में पेश कर सकता है।
गोयल भी फंसे हैं
सरकार को मुसीबत में डालने का काम वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी किया है। उन्होंने भी अमेरिका से ट्रेड डील के मसले पर संसद में जितना कहा, उससे कहीं ज्यादा वे सदन के बाहर मीडिया से बोले। फिर भी डील का बचाव नहीं कर सके, क्योंकि डील की पूरी तस्वीर ही अभी तक साफ नहीं है। अमेरिका ने ट्रेड डील का ढांचा जारी करने के बाद नई फैक्ट शीट में कई बिंदु हटाए और नए बिंदुओं को जोड़ा, जिससे विपक्ष का शक और गहरा गया। खासतौर पर, कृषि के क्षेत्र मे डील के अहम बिंदुओं पर पीयूष गोयल आम जनता तक ठीक से संदेश नहीं दे पाए।
अब आगे क्या?
केंद्र मे भाजपा नीति एनडीए सरकार के सामने इधर कुआं, उधर खाई की स्थिति है। अगर वह हरदीप पुरी से इस्तीफा मांगती है तो विपक्ष की जीत तय होगी। वहीं, अगर सरकार डैमेज कंट्रोल के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल का फेरबदल कर नए मंत्रियों को जगह देती है तो नए चेहरों की तलाश भी अपने आप में एक बड़ी समस्या है, क्योंकि सरकार को तेलुगू देशम और जनता दल यूनाइटेड का समर्थन है। केंद्र की कमजोर स्थिति को भांपकर दोनों दल सरकार में बड़े हिस्से, यानी मंत्रियों की संख्या को बढ़ाने की मांग कर सकते हैं। केवल हरदीप पुरी का इस्तीफा मांगने से ऐसा लगता नहीं कि 9 मार्च से शुरू होने वाले बजट सत्र के दूसरे हिस्से में विपक्ष की आक्रामकता कम हो जाएगी।
ब्रांड मोदी की इमेज कैसे सुधरेगी
भाजपा के नवनियुक्त अध्यक्ष नितिन नबीन और ऐसे मामलों में हमेशा से चाणक्य की भूमिका निभाते रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सामने इससे भी बड़ी समस्या पार्टी के उन सांसदों को समझाने की है, जिन्हें अब यह लगने लगा है कि ट्रेड डील और एप्सटीन फाइल्स के बाद पीएम मोदी की एक ब्रांड के तौर पर छवि को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है। इनमें से बहुत से ऐसे सांसद भी हैं, जो केवल मोदी की छवि के सहारे लोकसभा चुनाव जीतकर आए हैं।
अहम बात यह है कि प्रतिपक्ष के नेता कांग्रेस सांसद राहुल गांधी लगातार सत्ता पक्ष के इन सांसदों को निशाना बनाकर उन्हें पाला बदलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कांग्रेस के एक सांसद ने दावा किया कि पार्टी उस रणनीति पर भी गंभीरता से विचार कर रही है, जिसमें दबाव में आकर भाजपा से अलग हुए सांसदों के गुट को बाहर से समर्थन देकर चरणसिंह की सरकार बनाने जैसे इतिहास को दोबारा दोहराए जाने की नौबत भी आ सकती है। जानकार सूत्रों के अनुसार, परदे के पीछे से इस तरह की सुगबुगाहटें और चर्चा चल भी रही है। जो भी हो, केंद्र सरकार के लिए अब एक-साथ चार मोर्चों पर लड़ना और वह भी अगले करीब एक महीने में थोड़ी टेढ़ी खीर दिखाई देती है। लेकिन यह तो तय है कि आने वाले दिनों में लुटियंस जोन में कुछ बड़े धमाके जरूर हो सकते हैं।




