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पीएम मोदी की यह कैसी तानाशाही? बस अडानी की नजर में लेते है वाहवाही

खुद विदेश जाकर बकैती करेंगे, लेकिन कैबिनेट से मंजूरी जरूरी नहीं; लेकिन विदेश मंत्रालय वही काम करे तो उसके लिए पहले जरूरी होगी मंजूरी

* मोदी की इजरायल यात्रा से पहले कैबिनेट सचिवालय का तुगलकी फरमान
* इजरायल से किए 16 समझौते- किससे पूछकर मोदी ने कृषि का बाजार खोला?
* भारत से मरने के लिए इजरायल जाएंगे 50 हजार मजदूर, जिम्मेदारी किसकी?
* बड़ा सवाल- समझौते मोदी और इजरायल के बीच हुए तो इसमें भारत कहां है?

नई दिल्ली। पीएम नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बार फिर देश के संविधान को ठेंगा दिखाकर एक अजीबोगरीब फरमान जारी किया है। बीते फरवरी में इजरायल दौरे पर निकलने से पहले केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिवालय ने एक फरमान जारी किया। इसमें पीएम को विदेशी देशों/ एजेंसियों के साथ किसी भी तरह के समझौते, लेटर ऑफ इंटेंट या संयुक्त उपक्रम के लिए अनुबंध करने के लिए अपनी ही कैबिनेट से कोई मंजूरी लेना जरूरी नहीं होगा। यानी पीएम मोदी अपनी ही सरकार को बाइपास कर विदेशी राष्ट्रों और उनकी एजेंसियों के साथ समझौता करना चाहते हैं। इजरायल की यात्रा में उन्होंने 16 समझौते किए। उनमें इजरायल में 50 हजार भारतीय मजदूर भेजने का समझौता भी शामिल था, जिसके लिए पीएम ने अपनी    कैबिनेट से कोई स्वीकृति नहीं ली थी।

क्या लिखा है मेमोरेंडम में?

कैबिनेट सचिवालय से 18 फरवरी 2026 को जारी मेमोरेंडम में लिखा है, “ यह तय किया गया है कि अब से उन अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लिए कैबिनेट की पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होगी, जिन्हें प्रधानमंत्री के उस देश के आधिकारिक दौरे के दौरान या उस विदेशी देश के राष्ट्रप्रमुख/सरकार के भारत के आधिकारिक दौरे के दौरान किसी विदेशी देश/एजेंसी के साथ करने का प्रस्ताव है।” इजरायल के साथ किए गए 16 समझौतों में भारत ने अप्रत्याशित रूप से अपनी कृषि के बाजार को इजरायली कंपनियों के लिए पूरी तरह से खोल दिया है। यह बात जानबूझकर भारत की मीडिया से छिपाई गई, ताकि हंगामा न मचे। लेकिन इसके लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी पूछना जरूरी नहीं समझा। अब इस समझौते का भारतीय किसानों पर क्या असर पड़ेगा, यह कोई नहीं जानता, क्योंकि न तो इस पर कैबिनेट में चर्चा हुई और न ही भारत की संसद को इसकी जानकारी दी गई। पीएम मोदी ने इसके अलावा इजरायल के साथ यूपीआई पेमेंट में भुगतान करने के सिस्टम को स्थापित करने को भी मंजूरी दे दी है, जो कि वित्त मंत्रालय का काम है और इसके लिए भी मोदी ने भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से कोई सलाह नहीं ली। पीएम कार्यालय, यानी पीएमओ के एक अधिकारी का कहना है कि कैबिनेट सचिवालय के इस मेमोरेंडम का कोई तोड़ नहीं है और केवल संसद ही इसके बारे में फैसला ले सकती है। वहीं, एक विपक्षी सांसद ने पीएम नरेंद्र मोदी के इस कदम को भारत में तानाशाही की ओर एक कदम और बढ़ाने जैसा बताया। उन्होंने साफ कहा कि पीएम को देश में कानून का संरक्षक माना जाता है, लेकिन उन्होंने खुद कानून तोड़कर यह जता दिया है कि वे भारत के संविधान की कोई इज्जत नहीं करते।

भारत का कानून क्या कहता है?

भारत सरकार के कानून 1961 में कहा गया है कि सरकारी कामकाज, खासकर प्रमुख मुद्दों, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समझौते, संधियां, प्रोटोकॉल, एमओयू, संयुक्त घोषणापत्र, इच्छा जताने वाले बयान या विदेशी देश या उसकी एजेंसियों के साथ ऐसे ही किसी समझौतों के लिए कैबिनेट की मंजूरी अनिवार्य है। कानून में ऐसे नीतिगत, वित्तीय या रणनीतिक प्रभाव वाले फैसले लेने से पहले कैबिनेट में इसकी चर्चा और मंजूरी लेने को अनिवार्य किया गया है, ताकि सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी तय हो सके। इसका सीधा मतलब है कि अगर पीएम मोदी बिना कैबिनेट की मंजूरी के अकेले सारे फैसले ले रहे हैं तो वे खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं, न कि भारत सरकार। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इजरायल के साथ मोदी जा 16 एमओयू कर आए हैं, वह पीएम मोदी और इजरायल सरकार के साथ हुआ है और इसके लिए मोदी ही अकेले जिम्मेदार हैं, भारत सरकार नहीं। अब नए मेमोरेंडम में पीएम मोदी के लिए इन सभी शर्तों की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है।

समझौते अदानी और अंबानी के लिए?

इससे पहले भी पीएम नरेंद्र मोदी पर विदेश यात्राओं में अपने दोस्त उद्योगपतियों- गज्ञैतम अदानी और मुकेश अंबानी के लिए समझौते करने का आरोप लगा है। 2017 की अपनी मशहूर इजरायल यात्रा के दौरान वे अपने साथ अदानी को भी लेकर गए थे, जिसके दो साल बाद इजरायल के हाईफा बंदरगाह के विकास का अदानी पोर्ट के साथ समझौता हुआ था। इस यात्रा के बारे में एप्स्टीन फाइल्स में जिक्र है और इसके दावा किया गया है कि मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए वहां नाच-गाना किया था। इसके अलावा पीएम पर 2014 में कुर्सी संभालने के बाद अपनी फ्रांस यात्रा में मुकेश अंबानी के भाई अनिल अंबानी को राफेल डील में सहयोगी बनाने की डील करने का भी आरोप लगा है। अनिल अंबानी की कंपनी को सहयोगी बनाने के लिए खुद पीएम मोदी ने दबाव बनाने की बात फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति होलांद खुद मान चुके हैं। पीएम ने अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान अदानी के कारमाइकल खदान के लिए पैरवी करने का भी आरोप लगा है। ऐसे में इस बात को मानने में कोई हर्ज नहीं कि पीएम अपनी विदेश यात्राओं में अदानी का खास ध्यान रखते हैं और उन्हें व्यापारिक फायदा पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

विदेश मंत्रालय के पर काटे

कैबिनेट सचिवालय के नोट में भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से किए जाने वाले संधियों का भी उल्लेख किया गया है। लेकिन इसके लिए कोई भी ‘संधि’ या फिर ‘समझौता’ शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ है। नोट में यह भी कहा गया है कि भारत सरकार इसे कानूनी रूप से मानने या इससे सहमत होने के लिए बाध्य नहीं है। नोट में कहा गया है कि विदेश मंत्रालय को हर 6 महीने में इस तरह के अंतरराष्ट्रीय समझौतों या अनुबंधों की सूची कैबिनेट के सामने रखनी होगी, ताकि उस पर विचार किया जा सके। कैबिनेट नोट में इस कदम के पीछे यह कारण बताया गया है कि ऐसे समझौतों और अनुबंधों को बिना किसी रोकटोक के तुरंत मंजूरी मिल सके, इसके लिए ऐसा किया गया है। वैसे, विदेश मंत्रालय के अनुबंधों को कैबिनेट से पहले ही मंजूरी मिलने की अनिवार्यता बरकरार रखी गई है। सवाल यह उठता है कि जब भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से ऐसे समझौतों की कैबिनेट से पहले मंजूरी जरूरी है तो फिर पीएम नरेंद्र मोदी को मनमजी करने की छूट क्यों दी जा रही है?

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