फ़िल्म तो बहाना है,भाजपाइयों का तो बंगाल निशाना है

बंगाल फाइल्स
बंगाल चुनाव से पहले सांप्रदायिकता की खुराक
फिल्मी प्रोपेगेंडा से लेकर दुर्गापूजा और घुसपैठियों तक, भाजपा का एजेंडा साफ ध्रुवीकरण ही जीत का रास्ता
फिल्मी पर्दे से राजनीति की प्रयोगशाला तक
सांप्रदायिक अफीम से चुनावी खुमारी
‘दीदी ओ दीदी’ से महिला अपमान तक की राजनीति
घुसपैठ के नाम पर अल्पसंख्यकों का शिकार
दुर्गापूजा संस्कृति से सांप्रदायिकता की ओर मोड़
जावेद अख्तर प्रकरण और कट्टरता की जीत
फिल्म निर्माता बनाम समाज का सच
बंगाल की विरासत बनाम भाजपा का एजेंडा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक मैदान गर्म है। भाजपा अपनी पुरानी चाल सांप्रदायिक विभाजन को फिर से हथियार बना रही है। कभी फिल्मों के जरिए, कभी घुसपैठियों का मुद्दा उछालकर और कभी दुर्गापूजा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को धार्मिक जामा पहनाकर माहौल को जहरीला बनाया जा रहा है। विवेक अग्निहोत्री की बंगाल फाइल्स इस चुनावी रणनीति का एक और हिस्सा है। जहां सिनेमा हॉल में बॉक्स ऑफिस से ज्यादा सोशल मीडिया पर प्रचार की राजनीति की जा रही है। सवाल यह है कि क्या यह चुनाव लोकतंत्र की लड़ाई है या फिर सांप्रदायिकता की खुराक बांटने की होड़।
बंगाल फाइल्स सिनेमा नहीं, चुनावी हथियार
विवेक अग्निहोत्री की कश्मीर फाइल्स की तरह बंगाल फाइल्स भी एक ही एजेंडे को साध रही है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण। पांच सितंबर को रिलीज हुई इस फिल्म को शुरुआती दिनों में खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर झूठा हल्ला खड़ा किया गया। कहीं लिखा गया कि इस दृश्य ने तहलका मचा दिया, कहीं कहा गया कि यह अभिनय गजब का है। असलियत यह है कि फिल्म का मुख्य मकसद बॉक्स ऑफिस नहीं बल्कि राजनीतिक बॉक्स को भरना है। भाजपा को मालूम है कि बंगाल की जटिल सामाजिक संरचना को साधना आसान नहीं, इसलिए फिल्मों और प्रचार का सहारा लेकर मतदाताओं के दिल-दिमाग में जहर घोलने की कोशिश की जा रही है।
हार का डर, नफरत का सहारा
बीजेपी के लिए बंगाल हमेशा चुनौती रहा है। अटल-आडवाणी के जमाने में बंगाल ने भाजपा को नकारा। मोदी लहर में भी ममता बनर्जी के किले को ढहाया नहीं जा सका। पिछले चुनाव में ‘दीदी ओ दीदी’ जैसी लचर भाषा ने भाजपा की छवि को और खराब कर दिया। अब भाजपा फिर सांप्रदायिकता का रास्ता अपना रही है। क्योंकि असल मुद्दों पर बंगाल की जनता सवाल पूछेगी बेरोजगारी, महंगाई, महाशक्ति बनने का खोखला सपना और केंद्र द्वारा राज्य की उपेक्षा। भाजपा जानती है कि इन सवालों के जवाब उसके पास नहीं हैं, इसलिए नफरत की खुराक ही उसका अंतिम सहारा है।
घुसपैठियों का मुद्दा अमित शाह की नाकामी पर पर्दा
बीते दिनों भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा खूब उछाला। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि सीमाओं की सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी है? गृह मंत्रालय अमित शाह के पास है, तो घुसपैठ पर रोक क्यों नहीं लगी? असलियत यह है कि गरीब कामगार अल्पसंख्यकों को ‘घुसपैठिया’ बताकर उन्हें डराया और अपमानित किया जा रहा है। कई जगह तो बंगला बोलने वाले भारतीयों तक को शक की निगाह से देखा गया। यह केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।
दुर्गापूजा सांस्कृतिक उत्सव से धार्मिक विभाजन तक
बंगाल में दुर्गापूजा सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव है जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं। लेकिन भाजपा इसे भी हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देख रही है। उत्सव को भी राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है। इससे बंगाल की बहुलतावादी संस्कृति पर गहरा आघात हो रहा है। अगर दुर्गापूजा भी ध्रुवीकरण का शिकार हो गई तो बंगाल की आत्मा ही खो जाएगी।
जावेद अख्तर विवाद कट्टरपंथ की जीत, संस्कृति की हार
हाल ही में पश्चिम बंगाल की उर्दू अकादमी ने कट्टरपंथी दबाव में जावेद अख्तर का कार्यक्रम रद्द कर दिया। जावेद अख्तर ने हमेशा दोनों तरह के कट्टरपंथियों का विरोध किया है। लेकिन मुस्लिम संगठनों ने कहा कि उनकी टिप्पणियों से धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। यह घटना बताती है कि सांप्रदायिकता का जहर केवल भाजपा तक सीमित नहीं, बल्कि हर तरफ फैल रहा है। यह बंगाल के सांस्कृतिक ताने-बाने को खा जाने वाला दीमक है।
विवेक अग्निहोत्री फिल्मकार नहीं, प्रोपेगेंडा मास्टर
कश्मीर फाइल्स के बाद विवेक अग्निहोत्री एक फिल्मकार से ज्यादा भाजपा के प्रचारक साबित हुए। विदेशों में घूमकर, रील बनाकर और फिल्म के जरिए झूठ का साम्राज्य फैलाकर उन्होंने खूब कमाई की। बंगाल फाइल्स भी उसी एजेंडे की अगली कड़ी है। सवाल यह है कि क्या फिल्में समाज को जोड़ने का काम करेंगी या फिर चुनावी हथियार बनकर लोगों को बांटेंगी।
ममता बनर्जी के लिए चेतावनी
ममता बनर्जी के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा, दूसरी तरफ कट्टरपंथियों का दबाव। अगर उन्होंने इस खतरे को गंभीरता से नहीं लिया तो बंगाल की सांस्कृतिक विरासत खतरे में पड़ जाएगी। बंगाल की पहचान शक्ति पूजा, कवि सम्मेलन, बौद्धिक विमर्श सब ध्रुवीकरण की आग में झुलस सकते हैं। ममता को यह तय करना होगा कि वे बंगाल की विविधता की रक्षा कैसे करेंगी।
लोकतंत्र या नफरत का कारोबार
चुनाव लोकतंत्र का उत्सव होता है, लेकिन भाजपा ने इसे नफरत का कारोबार बना दिया है। फिल्मों से लेकर भाषणों तक, हर जगह सांप्रदायिक खुराक बांटी जा रही है। विवेक अग्निहोत्री की फिल्में हों या भाजपा के नेता, सबका मकसद सिर्फ एक है ध्रुवीकरण। सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र अब केवल धर्म और नफरत के तराजू पर तौला जाएगा।
* बंगाल फाइल्स फिल्म से ज्यादा राजनीतिक हथियार।
* शुरुआती कलेक्शन फ्लॉप, सोशल मीडिया प्रचार से बढ़ाई गई कमाई।
* भाजपा की रणनीति असल मुद्दों से भागकर सांप्रदायिक एजेंडे पर फोकस।
* घुसपैठियों का मुद्दा गृह मंत्रालय की नाकामी पर पर्दा।
* दुर्गापूजा सांस्कृतिक उत्सव को भी धर्म की राजनीति से दूषित करने की कोशिश।
* जावेद अख्तर विवाद कट्टरपंथ की जीत, संस्कृति की हार।
* ममता बनर्जी के सामने दोहरी चुनौती भाजपा और कट्टरपंथ दोनों।
* लोकतंत्र का उत्सव अब नफरत का कारोबार बनता जा रहा है।
