राजनीति

बिहार स्पेशल – भूरा बाल साफ करने की सियासत, मनुवादियो ने लालू को बदनाम करने के लिये झोंक दी थी ताकत

 

● भूरा बाल साफ करने की सियासत

● मनुवादियो ने लालू को बदनाम करने के लिये झोंक दी थी ताकत

● जंगलराज या ब्राह्मणराज का नरेटिव? भूरा बाल से डरते क्यों हैं सभ्य लोग!

● इतिहास को नफरत के रंग से रंगने की कोशिश, तकनीक के तर्क से झूठ की खेती

● 35 साल पुरानी साइकिल से आज की इनोवा तक की तुलना क्या यही है विश्लेषण

● भूरा बाल का भय असल में बराबरी के डर से उपजा जंगलराज का नारा एक जातीय हथियार बना

● लालू प्रसाद यादव का शासन नहीं, ब्राह्मणवाद की सत्ता को लगी थी आग

● जिन्होंने औरतों की नथ उतरवाई, वही बराबरी से डरने लगे और नाम दिया जंगलराज

● 1990 का जंगलराज नहीं, सामाजिक क्रांति, असली जंगल सत्ता के भीतर

● भूरा बाल साफ करो का नारा लालू का नहीं, मगर सच यही कि बाल झड़ गए और ताज भी गिरा

 

सजंय पटेल

 

राजनीति के पास अगर विवेक होता, तो वह यह नहीं पूछती कि लालू यादव ने क्या बिगाड़ा, वह यह पूछती कि लालू यादव ने किसे बिगड़ने नहीं दिया! आज के दौर में जब सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां और सोशल मीडिया की सेनाएं इतिहास को नरेटिव के तराजू पर तौलती हैं, तब यह सुनना कि 90 का दशक बिहार में जंगलराज था, उतना ही मूर्खतापूर्ण है जितना यह कहना कि 1980 के टाइम का रेडियो और आज का स्मार्टफोन एक ही तकनीकी स्तर के हैं।

तुलना की मूर्खता जब समय ही बदल गया

किसी भी सरकार की तुलना अपने तत्कालीन संदर्भ से की जाती है। मगर जब कोई कहता है कि लालू के समय बिहार में सड़कें टूटी थीं, तो उसे यह भी कहना चाहिए कि तब देश की सबसे बड़ी सड़क जी.टी. रोड भी टूटी थी। 1980 के दशक में न इंटरनेट था, न मोबाइल, न कंप्यूटर। सड़कें आग से अलकतरा गरम करके बनाई जाती थीं, मजदूर हाथ से पत्थर पीटते थे। आज रात भर में मशीनें फ्लाईओवर खड़ा कर देती हैं। तो बताइए तब की सरकार और अब की सरकार में तुलना कैसे। अगर यह जंगलराज था, तो यह पूरा देश जंगल था।

तकनीक की टाइमलाइन और तर्क की हत्या

भारत में इंटरनेट 15 अगस्त 1995 को आम जनता के लिए शुरू हुआ। गूगल मैप्स 2009 में आया। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे 2002 में तैयार हुआ। भारत का पहला आधुनिक 4-लेन हाईवे एनएच-8 (दिल्ली-गुड़गांव) वर्ष 2000 में बना। यह सब आने से पहले लोग जिन जीपों पर सवार थे, उनमें ली-एनफील्ड राइफल और .32 बोर की जंग लगी रिवाल्वर थीं। तो लालू प्रसाद यादव के जंगलराज को किस तकनीक से मापा जाए। सेटेलाइट सर्विलांस से, या बुढ़ी जीप की पंक्चर से।

जंगलराज का असली मतलब जब सत्ता का सिंहासन हिला

यह बात किसी डेटा में नहीं, बल्कि सत्ता की जातीय रगों में छिपी है। लालू प्रसाद यादव ने 1990 के दशक में उन लोगों को कुर्सी पर बिठाया, जिन्हें सदियों से चौखट पर बैठने की इजाजत नहीं थी, और जो लोग खुद को सभ्य वर्ग कहते थे, उन्होंने जब यह देखा कि गांव का नाई, धोबी, कहार, पासवान, कुशवाहा अब जिला अधिकारी के बराबर बैठ रहा है तो उन्हें यही दिखा कि जंगलराज आ गया है! दरअसल, लालू यादव ने कानून नहीं, कुर्सी की वंशानुगत पवित्रता तोड़ी थी।

भूरा बाल साफ करो नारा किसका था, डर किसका

ब्राह्मणवादी प्रचार मशीन ने एक नारा गढ़ा भूरा बाल साफ करो, और यह कह दिया कि लालू यादव ने दिया।
जबकि लालू ने कभी ऐसा नारा दिया ही नहीं। यह नारा निचली जातियों की मुक्ति की चेतना से उपजा था। जिसमें भू-भूमिहार, रा-राजपूत, बा-ब्राह्मण, ला-लाला (कायस्थ) यह नारा उन चार जातियों के खिलाफ था, जिन्होंने सदियों तक बाकी समाज को चारपाई, चप्पल और चरित्र तीनों से वंचित रखा। आज बिहार जाति सर्वेक्षण 2023 बताता है कि भूमिहार 2.86 फीसदी, ब्राह्मण 3.65 फीसदी, राजपूत 3.45 फीसदी यानी कुल 10 फीसदी हैं। मगर विधानसभा में 35 फीसदी से अधिक सीटों पर इन्हीं के उम्मीदवार हैं। तो अगर भूरा बाल का अर्थ सत्ता-संतुलन बदलना है, तो हां लालू यादव ने भूरा बाल साफ कर दिया।

जंगलराज की परिभाषा कौन लिखेगा

अगर किसी प्रदेश में एक औरत के साथ सामूहिक बलात्कार हो और उसे नंगा करके गांव में घुमाया जाए, तो क्या वह जंगलराज नहीं। यह घटना बिहार की नहीं उत्तर प्रदेश के बेहमई गांव की थी, जहां ठाकुरों ने फूलन देवी को अपमानित किया था। बदले में फूलन देवी ने गोली चलाई और इतिहास ने कहा वह अपराधी थी। मगर असली अपराधी कौन था वह समाज जिसने उसे अपमानित किया, या वह महिला जिसने प्रतिशोध लिया। जंगलराज तो वहीं था, जहां किसी महिला की नथ उतारी जाती थी और समाज मौन था।

90 का दशक जब उत्तर प्रदेश भी जंगल था

जब लोग कहते हैं कि बिहार जल रहा था, तो यह भी याद रखिए कि उसी दौर में उत्तर प्रदेश में ददुआ, निर्भय सिंह गुर्जर, सीमा परिहार और छबी राम यादव जैसे डाकू आधे प्रदेश पर राज करते थे। दिल्ली-गुड़गांव हाईवे पर डकैती आम थी, लखनऊ-कानपुर के बीच लूट का मतलब रूटीन खबर थी। मगर किसी ने उत्तर प्रदेश में जंगलराज नहीं कहा क्यों? क्योंकि वहां मुख्यमंत्री ब्राह्मण और ठाकुर थे।

कर्पूरी ठाकुर से लालू तक आरक्षण की गालियां और सामाजिक बदला

जब मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने 28 फीसदी आरक्षण लागू किया, तब आरक्षण विरोधियों ने नारे लगाए कि कर्पूरी की माई बीआई, कर कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी धर उस्तरा। एमए बीए पास करेंगे, कर्पूरिया को बांस करेंगे। यह वही समाज था जो आज आरक्षण का लाभ उठा रहा है, मगर तब इन्हीं ताकतों ने कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिरा दी। फिर जब लालू यादव आए उन्होंने उसी समाज को राजनीतिक ताकत दी। इसलिए नहीं कि वह जातिवादी थे, बल्कि इसलिए कि वे जाति के भीतर इंसान खोज रहे थे।

आर्थिक तर्क जब बजट ही 3,492 करोड़ था

जो लोग आज कहते हैं कि लालू ने विकास नहीं किया,
वे यह नहीं बताते कि 1990 में बिहार का पूरा बजट 3,492 करोड़ का था और आज 2025 में बिहार का सार्वजनिक ऋण 2.81 लाख करोड़ रुपए है, जो राज्य के जीडीपी का 32.78 फीसदी है। तो उस दौर के लालू को विकास के तराजू पर तौलना ऐसा ही है, जैसे किसी रिक्शेवाले को मर्सिडीज की माइलेज से तुलना करना।

रणवीर सेना और जातीय आतंक भूरा बाल का प्रतिशोध

जब लालू ने दबे-कुचले समाज को उठाया, तो भूरा बाल की सत्ता ने जवाब दिया। रणवीर सेना, कुंवर सेना, सनलाइट सेना बनाकर। दलितों के गांवों में नरसंहार हुए। यह था असली जंगलराज जब निजी सेनाएं न्याय से बड़ी बन गईं। मगर इतिहास ने इन्हें सामाजिक असंतोष कहा, क्योंकि हत्या करने वाले ऊंची जाति के थे।

मीडिया का नरेटिव जंगलराज बिकता है, न्याय नहीं

90 के दशक की मीडिया का केंद्र दिल्ली था, जहां से बिहार को देखने वाले पत्रकार अक्सर दक्षिण पटना से आगे नहीं जाते थे। उनके लिए बिहार मतलब गाय, गन्ना, और गन था। इसी मीडिया ने भूरा बाल का नारा लालू के नाम पर चिपकाया, इसी मीडिया ने जंगलराज शब्द का ईजाद किया और इसी मीडिया ने सामाजिक न्याय को जातिवाद में बदल दिया।

लालू बनाम सोशल मीडिया का आगमन

आज जब सोशल मीडिया है, तो हर झूठ का मुकाबला डेटा से किया जा सकता है। जंगलराज शब्द की उम्र उतनी ही है जितनी पत्रकारों की सुविधाजनक स्मृति की। अब लोग खुद गूगल पर जाकर देख सकते हैं कि
कौन से दशक में अपराध दर सबसे अधिक थी, कौन सी सरकार के समय हत्या और अपहरण में उछाल आया। वे यह भी देखेंगे कि लालू के शासन का अपराध स्तर उतना नहीं था जितना बाद के सुशासन काल में हुआ।

भूरा बाल से लोकतंत्र की सफाई

लालू प्रसाद यादव ने जिस सत्ता को हिलाया, वह सत्ता केवल राजनीतिक नहीं, मानसिक और सामाजिक ढांचे की सत्ता थी। उन्होंने पहली बार उन लोगों को मंच दिया
जो सदी दर सदी दरवाजे पर खड़े रहकर सलाम बजाते थे। उन्होंने उन्हें कहा कि अब तुम भी सत्ता में बराबर हो, और यही ब्राह्मणवाद को नागवार गुजरा।

जंगलराज एक जातीय ब्रांड

जंगलराज कोई शासन-विश्लेषण नहीं, यह एक ब्रांडेड गाली है। जिसे ब्राह्मणवादी सत्ता ने उस दिन ईजाद किया जब पिछड़ी जातियों ने सिर उठाया। क्योंकि सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा अपराध नहीं, बराबरी होती है। पटना हाईकोर्ट ने नगर निगम के एक फैसले में जंगलराज शब्द का प्रयोग किया और कहा कि ब्राह्मणवाद ने उसी शब्द को लालू के माथे पर चिपका दिया। प्रकाश झा जैसे फिल्मकारों ने शूल, अपहरण जैसी फिल्में बनाकर बच्चा यादव और साधू यादव जैसे किरदारों में अपराध का चेहरा दिया, मगर उन्हीं फिल्मों में सत्ता के सामंती चरित्र को सफेदपोश बना दिया। अब वही बिहार सोशल मीडिया पर अपना सच लिख रहा है।
नरेटिव की दीवारों में दरार पड़ चुकी है। इतिहास की अदालत में जंगलराज का आरोप हमेशा उन्हीं पर लगाया गया जो जंगल से नहीं, सत्ता के दरवाजे से बाहर रखे गए थे। लालू यादव ने दरवाजा खोला और वही सबसे बड़ा अपराध था। ब्राह्मणवाद की अदालत में बराबरी हमेशा अपराध ही होती है। जिसे जंगल कहा गया, वह दरअसल जन गण का राज था।

* तुलना का तर्क झूठा 1990 की सरकार की तुलना 2025 की तकनीकी व्यवस्था से करना ऐतिहासिक अज्ञानता।
* भूरा बाल नारा झूठा लालू ने यह नारा नहीं दिया; यह दलित-पिछड़े समाज की चेतना से उपजा।
* जंगलराज बराबरी का भय असली डर था सत्ता में दलितों-पिछड़ों की भागीदारी।
* रणवीर सेना की भूमिका सवर्ण वर्चस्व ने लालू की सामाजिक क्रांति के खिलाफ जातीय आतंक फैलाया।
* आर्थिक सच 1990 में बिहार का बजट मात्र 3,492 करोड़ रुपए था, आज के 2.8 लाख करोड़ रुपए वाले युग से अनुचित।
* मीडिया का अपराध जंगलराज का नरेटिव मीडिया ने गढ़ा, समाज ने नहीं।
* असली जंगलराज वह था जब औरतों की नथ उतराई जाती थी, जब गरीब की डोली पहले हवेली में उतरती थी।
* आज का दौर सोशल मीडिया ने झूठे नरेटिव की जड़ें हिला दी हैं अब इतिहास खुद बोल रहा है।

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