
● भाजपा की राजनीति का झूठ पर टिका है दारोमदार, घुसपैठ पर झूठ बोलती है मोदी सरकार
● सत्ता बचाने का नया हथियार, राष्ट्रवाद के नाम पर नया डर
● राम मंदिर बन गया, अनुच्छेद 370 मिट गया अब वोटों की फसल सींची जाएगी ‘घुसपैठ’ से
● ध्रुवीकरण की राजनीति का नया चारा मिला, मुसलमान निशाने पर
● अमित शाह ने खुद माना बांग्लादेश सीमा से घुसपैठ रोकना असंभव, फिर भी चुनावी भाषणों में वही गूंज!
● सीमा पर बाड़ नहीं, बस झूठ की दीवारें खड़ी की गईं
● राम से रोहिंग्या तक हर बार नया दुश्मन, हर बार वही नफरत
● ‘डबल इंजन’ सरकारें भी असम, त्रिपुरा में घुसपैठ नहीं रोक पाई, फिर दोष बंगाल पर क्यों
● घुसपैठ नहीं, मुद्दा बचाने की कवायद, सत्ता की उम्र बढ़ाने का औजार
● कथित राष्ट्रवाद अब बस एक प्रचारक मुखौटा, असल चिंता न सीमा, न सुरक्षा सिर्फ वोट की
◆ आशुतोष शर्मा
राम मंदिर बन गया, अनुच्छेद 370 मिट गया, और समान नागरिक संहिता का शोर भी अब ठंडा पड़ चुका है। हिंदुत्व की प्रयोगशाला में नया तत्व ‘घुसपैठ’ डाला गया है। सत्ता की लत में डूब चुकी भाजपा ने नफरत की राजनीति को नया चेहरा दे दिया है। झारखंड में न चला तो क्या, बिहार, बंगाल और असम में इसे आजमाने की तैयारी पूरी है। सवाल है क्या सच में घुसपैठ रोकना है या बस अगला चुनाव जीतना है।
सत्ता का एजेंडा और नया डर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जब 1951 में जनसंघ के रूप में अपनी राजनीतिक शाखा खड़ी की थी, तब उसके पास तीन मंत्र थे। समान नागरिक संहिता, अनुच्छेद 370 और गौहत्या पर प्रतिबंध। तीनों का मकसद था हिंदू समाज को एक ध्रुव में बांधना। लेकिन वक्त के साथ ये मंत्र फुस्स होने लगे। अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा आया तो भाजपा की राजनीति को ऑक्सीजन मिली। 1989 से 2019 तक, हर चुनाव में मंदिर का शंखनाद सुनाई दिया। फिर 2024 आया मंदिर भी बन गया, राम लला विराजमान हो गए, मगर जनता ने भाजपा को अयोध्या में ही हरा दिया। ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा औजार अब निस्तेज था। ऐसे में भाजपा को नया ध्रुव, नया डर, नया शत्रु चाहिए था तो अब नाम ‘घुसपैठ’ का।
घुसपैठ एक नया सांप्रदायिक पूंजी निवेश
2024 के चुनाव के बाद भाजपा और आरएसएस के लिए यह सवाल सबसे बड़ा था कि अब ध्रुवीकरण कैसे होगा? क्योंकि राम मंदिर, धारा 370 का खेल खत्म हो चुका था। इसलिए पार्टी ने तय किया कि अब वोटों की फसल ‘घुसपैठ’ के खतरे से उगाई जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को 12 भाषणों में पहली बार लालकिले से घुसपैठ का जिक्र किया। यह कोई संयोग नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति थी। अब भाजपा के नेता हर चुनावी मंच पर यही राग अलाप रहे हैं। घुसपैठ से देश की जनसंख्या संरचना बदल रही है। घुसपैठिए देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या भाजपा सरकार सचमुच घुसपैठ रोकना चाहती है, या बस मुद्दे को जिंदा रखना चाहती है।
अमित शाह की स्वीकारोक्ति घुसपैठ रोकना असंभव
यह विडंबना नहीं तो क्या है कि जो मुद्दा भाजपा चुनावों में अपनी सबसे बड़ी ताकत बना रही है, उसी पर देश के गृहमंत्री खुद नाकाम साबित हुए हैं। एक अखबार के कार्यक्रम में अमित शाह ने खुद कहा कि बांग्लादेश की सीमा पर कई नदियां, झरने, पहाड़ियों और जंगल पर बाड़ लगाना मुश्किल है, घुसपैठ को कोई नहीं रोक सकता। तो सवाल उठता है कि अगर घुसपैठ रोकना असंभव है, तो जनता को बरगलाने के लिए यह मुद्दा बार-बार क्यों उछाला जा रहा है।
‘डबल इंजन’ की सरकार बेअसर, दोष सिर्फ बंगाल पर!
भाजपा के नेता कहते हैं कि बांग्लादेश से घुसपैठ बंगाल सरकार के कारण हो रही है। लेकिन असम और त्रिपुरा जहां भाजपा की सरकार पिछले आठ-दस साल से हैं।
फिर वहां क्यों नहीं रुकी घुसपैठ। क्यों अब भी पशुओं की तस्करी, रोहिंग्या का प्रवेश और अवैध मजदूरों की आवाजाही जारी है। सीमा सुरक्षा बल को सीमा से 150 किलोमीटर अंदर तक कार्रवाई का अधिकार दे दिया गया है, फिर भी घुसपैठ जारी है। अब सवाल यह नहीं कि घुसपैठ कैसे हो रही है, सवाल यह है कि राजनीति कैसे हो रही है।
झारखंड में मुद्दा पिटा, बिहार में नया प्रयोग
असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा को भाजपा ने घुसपैठ के ‘महानायक’ के रूप में झारखंड चुनाव में उतारा था।
पर नतीजा हुआ भाजपा को करारी हार। जनता ने नफरत के इस पुराने फार्मूले को नकार दिया। फिर भी भाजपा ने सबक नहीं सीखा। अब वही घुसपैठ का राग बिहार में गूंज रहा है। मोदी और शाह दोनों हर रैली में बांग्लादेशी घुसपैठियों का जिक्र कर रहे हैं। यह वही बिहार है, जहां न तो कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा है, न ही बांग्लादेश या म्यांमार से कोई बड़ी घुसपैठ रिपोर्ट हुई है।
लेकिन जब मुद्दा वोट बैंक का जो है, तो वास्तविकता मायने नहीं रखती।
घुसपैठ का भ्रमजाल डर से वोट तक का सफर
घुसपैठ की राजनीति भाजपा के लिए सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि पहचान और भय का मुद्दा है। हर बार की तरह यह हम बनाम वे की रेखा खींचने की रणनीति है।
पहले ‘राम’ के नाम पर ध्रुवीकरण, अब ‘रोहिंग्या’ और ‘बांग्लादेशी’ के नाम पर। यह मुद्दा न सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाता है, बल्कि देश के अंदरूनी वर्गीय तनावों को भी बढ़ाता है। गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई सब पीछे है। बस एक ही नारा है घुसपैठिए आ गए हैं।
सत्ता की नैतिकता बनाम सत्ता की मजबूरी
भाजपा की राजनीति का अब यह अनिवार्य सच है कि जब पुराने मुद्दे ठंडे पड़ें, तो नया दुश्मन पैदा करो। राम मंदिर बन गया अब क्या? अनुच्छेद 370 खत्म अब क्या? समान नागरिक संहिता कुछ राज्यों में लागू भी हो गई अब क्या? इस अब क्या के जवाब में भाजपा ने घुसपैठ का मुद्दा तैयार किया है। नया डर, नया शत्रु, नई कहानी। जनता के सामने ‘देश खतरे में’ का वही पुराना पोस्टर बस नाम बदल गया अब वह रोहिंग्या या बांग्लादेशी है।
सीमाएं नहीं, सियासी सीमारेखा खींची गई
भारत की सीमाएं आज भी बाड़, ड्रोन और सैनिक निगरानी से भरी हैं, लेकिन राजनीति की सीमाएं लहूलुहान हैं। लद्दाख में चीन लगातार अतिक्रमण कर रहा है, अरुणाचल में गांव खाली हो रहे हैं, पर प्रधानमंत्री की चिंता वहां नहीं है। उनकी चिंता है बांग्लादेशी मजदूर बिहार कैसे पहुंच गए। चीन की घुसपैठ से नहीं, मुसलमानों की मौजूदगी से डरने वाली यह राजनीति दरअसल एक वैचारिक पाखंड है।
राष्ट्रवाद की जगह विज्ञापनवाद
भाजपा ने राष्ट्रवाद को विज्ञापन में बदल दिया है।
हर चुनाव से पहले एक नया पोस्टर पहले पाकिस्तान, फिर आतंकवाद, अब घुसपैठ हर बार एक नया दुश्मन।
राष्ट्रवाद अब नीति नहीं, एक प्रचार उत्पाद है, जिसकी पैकिंग हर चुनाव में बदल दी जाती है।
वास्तविक संकट रोजगार, गरीबी और शिक्षा से ध्यान भटकाना
‘घुसपैठ’ का मुद्दा इतना बार-बार इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि वह जनता के असली सवालों से ध्यान हटाने का साधन है। जवाब न देना पड़े कि कितनी नौकरियां गई, कितनी महंगाई बढ़ी, कितने उद्योग ठप पड़े हैं। जब जनता का पेट खाली हो, तो डर भर दो देश खतरे में है और जनता को राष्ट्रभक्ति के नारे से बहला दो।
सुरक्षा एजेंसियों की सीमाएं, पर सत्ता का असीमित प्रचार
बीएसएफ को सीमा से 150 किलोमीटर तक अधिकार मिला, पर नतीजा वही। घुसपैठ नहीं रुकी, नहीं रुके हथियार, नहीं रुकी तस्करी और न ही भाजपा नेताओं के भाषण रुके। क्योंकि जब सच्चाई असफल हो, तो झूठ को प्रचार में बदल दो।
घुसपैठ बनाम गवर्नेंस सवालों के जवाब नहीं, नारों के गोले
11 साल से भाजपा केंद्र में है, 6 साल से अमित शाह गृह मंत्री हैं, पर कोई ठोस नीति नहीं बनी। बस घोषणाएं, समितियां, और अब एक डेमोग्राफी कमीशन का वादा। यह वही सरकार है जो हर असफलता को साजिश बताती है और हर आलोचना को देशद्रोह। भाजपा जानती है कि ‘घुसपैठ’ एक ऐसा मुद्दा है जो वर्षों तक जिंदा रखा जा सकता है। अभी बिहार में प्रयोग, फिर बंगाल, फिर असम। तीनों राज्यों में मुस्लिम जनसंख्या को लेकर नफरत का माहौल पहले से तैयार है। यह वही राजनीति है जो असली समस्याओं से मुंह मोड़कर काल्पनिक दुश्मनों पर निर्भर है।
जब झूठ सत्ता की नीति बन जाए
घुसपैठ का मुद्दा न नया है, न वास्तविक न रोकने की इच्छा है, न क्षमता। यह बस एक सियासी खुराक है, जिससे हिंदुत्व की थकी हुई राजनीति फिर से उग्र और सक्रिय हो सके। जब राम मंदिर भी वोट नहीं दिला पाया, अनुच्छेद 370 का जोश ठंडा पड़ गया,
तो अब ‘घुसपैठ’ भाजपा का नया हथियार बन चुका है।
* भाजपा की राजनीति अब ध्रुवीकरण 2.0 के चरण में है मुद्दा नया, फार्मूला पुराना।
* घुसपैठ का मुद्दा राष्ट्र सुरक्षा नहीं, सत्ता की सुरक्षा का औजार।
* अमित शाह की स्वीकारोक्ति भाजपा की असफलता का प्रमाण।
* सीमावर्ती राज्यों में भाजपा की सरकारें भी असफल दोष दूसरों पर।
* चीन की वास्तविक घुसपैठ पर मौन, बांग्लादेश की काल्पनिक घुसपैठ पर शोर।
* घुसपैठ का शोर असली मुद्दों बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी को ढकने की साजिश है।
* भाजपा के लिए अब घुसपैठिया वही है जो वोट न दे।
* यह राजनीति नहीं, नफरत का व्यापार है और सत्ता उसका एकमात्र बाजार।




