भारत की बेटियों को बांझ बना सकता है बिल गेट्स का वैक्सीन जिहाद,मोदी सब कुछ कर देंगे बर्बाद
देश भोग रहा है कोविड वैक्सीन का असर, अचानक खून जमने पर मौत का खतरा, मोदी जिद पर अड़े

* गेट्स फाउंडेशन ने बनाई है एचपीवी वैक्सीन, कहीं आबादी को कम करने की साजिश तो नहीं?
* भारत में 2009 में किया था ट्रायल, 7 बालिकाओं की हुई थी मौत, भागना पड़ा था
* यूरोप में बिल गेट्स की वैक्सीन का जबर्दस्त विरोध, भारत का सरेंडर
* अभी स्वैच्छिक और निशुल्क, लेकिन आगे सरकार लोगों को कर सकती है मजबूर
* न्यूजीलैंड की स्टडी में कोविड वैक्सीन से खून में रबड़ जैसे थक्के बनने का राज खुला

नई दिल्ली। कोविड महामारी का तूफान भले ही अभी नहीं हो, लेकिन भारत में 18 साल से नीचे की अवयस्क बालिकाओं पर एक और वैक्सीन का खतरा मंडराने लगा है। भारत सरकार बालिकाओं को सर्वाइकल कैंसर से बचाने के नाम पर एचपीवी का एक ऐसा वैक्सीन लगाने जा रही है, जिसे लेकर बांझपन का जोखिम बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
आपको बता दें कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2024 के आम चुनाव से पहले गेट्स फाउंडेशन के प्रमुख बिल गेट्स से यह वादा किया था कि अगली बार चुनकर आने के बाद भारत एचपीवी वैक्सीन को अवयस्क बालिकाओं में मुफ्त लगाने की अनुमति देगा। हालांकि, इसी साल जनवरी-फरवरी में एप्स्टीन फाइल्स में माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का नाम आने के बाद दर्जनभर यूरोपीय देशों में गेट्स केएचपीवी वैक्सीन का विरोध शुरू हो गया है। लेकिन भारत में मोदी सरकार ने वैक्सीन को लगाने की अनुमति दे दी है।
आपको बता दें कि 2009-10 के दौरान भारत के आंध्रप्रदेश के वारंगल जिले में गेट्स फाउंडेशन की इसी वैक्सीन का ट्रायल किया गया था। बिना अनुमति के किए गए इस ट्रायल में 7 बालिकाओं की मौत हो गई थी। ट्रायल में कई बालिकाओं में बांझपन का खतरा साफ नजर आया था। बाद में तत्कालीन यूपीए सरकार ने एक एनजीओ पाथ के जरिए किए गए ट्रायल को गैरकानूनी घोषित कर गेट्स फाउंडेशन को भारत छोड़कर चले जाने को कहा था।

67 हजार किशोरियों को लगने हैं टीके
भारत सरकार ने 29 मार्च, 5 अप्रैल और 12 अप्रैल 2026 को देशभर में तीन चरणों के टीकाकरण कार्यक्रम के तहत 14 से 15 साल उम्र की 67 हजार किशोरियों को एचपीवी, यानी सर्वाइकल कैंसर से बचाव का टीका लगाने के आदेश दिए हैं। यह टीकारण स्वैच्छिक और निशुल्क होगा। इससे पहले कोविड महामारी के दौरान भी केंद्र सरकार ने टीकाकरण को स्वैच्छिक और निशुल्क बताया था। लेकिन बाद में टीकाकरण को इस तरह से अनिवार्य बना दिया गया कि इसे लगाए बिना यात्रा और स्कूलों में प्रवेश तक की अनुमति नहीं दी गई। इसे देखते हुए एक बार फिर यह माना जा रहा है कि शुरुआती चरणों के बाद केंद्र सरकार दोबारा टीकाकरण को अनिवार्य करने की दिशा में कदम उठा सकती है। सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामें में केंद्र सरकार यह कह चुकी है कि कोविड महामारी के दौरान भारत में लोगों को लगाए गए निशुल्क टीके के दुष्प्रभावों के लिए उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, क्योंकि टीके लोगों ने स्वेच्छा से लगाए हैं और इसके लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। इस यू-टर्न को देखकर भारत में गेट्स फाउंडेशन की एचपीवी वैक्सीन का विरोध शुरू हो गया है। खासकर इसलिए, क्योंकि इसके दुष्परिणामों और साइड इफेक्ट्स को लेकर अभी तक कोई पुख्ता जानकारी सामने नहीं आई है।
कहीं यह अंतरराष्ट्रीय साजिश तो नहीं ?
इससे पहले कोविड महामारी से दो साल पहले ही बिल गेट्स और जेफ्री एप्स्टीन के बीच उस बातचीत के ईमेल को तमाम आशंकाओं का आधार माना जा रहा है, जिसमें गेट्स ने एप्स्टीन से दुनिया की आबादी को घटाने का उपाय पूछा था। यह बातचीत अमेरिकी न्याय विभाग से जारी एप्स्टीन फाइल्स में दर्ज है। इसी से यह धारणा बन गई कि गेट्स फाउंडेशन ने वैक्सीन के जरिए कमाई के इरादे से कोविड वायरस को दुनियाभर में फैलाया और फिर उसकी रोकथाम के लिए एस्ट्राजेनेका नाम की फार्मा कंपनी की मदद से वैक्सीन इजाद की। कई स्वतंत्र जांचकर्ताओं ने आशंका जताई है कि गेट्स फाउंडेशन ने कमाई के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र तक को भागीदार बनाकर दुनियाभर के देशों पर वैक्सीन लगवाने का दबाव बनाया था। भारत के लोगों को लगाई गई कोवैक्सीन और कोविशील्ड वैक्सीन को बनाने में एस्ट्राजेनेका कंपनी का बड़ा हाथ रहा है। बीते दिनों एप्स्टीन फाइल्स में गेट्स फाउंडेशन की इस करतूत का पर्दाफाश होने के बाद यूरोप में एचपीवी वैक्सीन का विरोध शुरू हो गया है। लोग इसे एक बार फिर फार्मा कंपनियों की वैक्सीन निर्माताओं के साथ मिलीभगत मान रहे हैं। उनका कहना है कि गेट्स फाउंडेशन पर वे बिल्कुल भी यकीन नहीं करते, क्योंकि वे कोविड वैक्सीन के मामले में पहले ही दुनिया के साथ धोखा कर चुके हैं।
अकाल मौत का कारण बनी कोविड वैक्सीन
फरवरी 2026 में न्यूजीलैंड के डॉक्टरों ने एक स्टडी में पहली बार यह दावा किया है कि दुनियाभर में जिन लोगों ने कोविड की वैक्सीन लगवाई है, उन सभी के खून में रबड़ जैसे थक्के बनने का खतरा मौजूद है। इस तरह का थक्का बनने के बाद मिनटों में मौत तय है, क्योंकि ह्दय काम करना बंद कर देता है। खून की नलियां जाम हो जाती हैं और इंसान की पलक झपकते मौत हो जाती है। कोविड वैक्सीन के खतरनाक राज पहली बार दुनिया के सामने आए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इंसान में खून जमने का यह खतरा लकवे के कारण होने वाले इसी तरह के खतरे से काफी अलग है, जिसे समय रहते इलाज मिलने से टाला जा सकता है। लेकिन डॉक्टर ब्रूस रेप्ली का कहना है कि यह इंसान की नसों में खून जमने का एक असामान्य तरीका है। इसमें खून का जमाव इतना घना होता है कि वह रबड़ जैसा हो जाता है और उस पर प्रोटीन की एक सफेद पर्त चिपक जाती है, जो कि वैक्सीन का दुष्परिणाम है। भारत में बीते दो साल में स्वस्थ लोगों, युवाओं और यहां तक कि बच्चों में भी चलते-फिरते अचानक गिरने और मौत के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है। हालांकि, आईसीएमआर और दिल्ली के एम्स के विशेषज्ञों की रिसर्च में इन असमय मौतों के बीच असंतुलित और असुरक्षित खान-पान, हार्ट अटैक और डायबिटीज जैसी जानलेवा बीमारियों की वंशावली और नशे का सेवन करने जैसी आदतों को जिम्मेदार बताया गया है। लेकिन यूरोप और अमेरिका में जहां इस तरह की मौतों की दर सालाना प्रति एक लाख पर महज 0.67 % है, वहीं भारत में इनकी संख्या 15% तक पाई गई है।
पोस्टमार्टम में मिले खून के थक्के
न्यूजीलैंड के डॉक्टरों ने कोविड के टीके लगे मरीजों की असमय मौत के बाद उसके शरीर के पोस्टमार्टम में खून के सफेद थक्कों का पता लगाया है। इसके बाद उन्होंने देश के 3 अलग लैब में इसकी जांच की। जांच में पता लगा कि मरीजों की नसों में खून के सफेद थक्के जमा थे। इनके इलास्टिक की तरह थे, जिनकी संरचना खून की लाल कोशिकाओं और प्लैटिलेट्स से अलग थी। ये रबड़ की तरह थे। इनकी इसी प्रकृति के कारण ह्दय में खून का बहाव रुक गया और दिल का दौरा पड़ने मरीज की मौत हुई। सबसे दिलचस्प बात यह है कि मरने वाले लोगों की वंशावली में दिल के दौरे, डायबिटीज या नशे के सेवन जैसा कोई मामला नहीं मिला। खोजकर्ताओं का दावा है कि खून के ये थक्के सल्फर की कमी और फॉस्फोरस की अधिकता के कारण हुई, जो सामान्य तौर पर खून के थक्के जमने के समय नहीं होती। डॉक्टर रैप्ली ने बताया कि इस तरह की संरचना बनाने पर हमारा शरीर किसी बाहरी कारण से मजबूर हुआ है, लेकिन शरीर में इससे लड़ने की क्षमता नहीं है। इस तरह की संरचना से शरीर में ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो जाता है। शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचता है, थकान होती है और नसों में सूजन आ जाती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस रिसर्च से उनकी जांच कोविड महामारी के दौरान लोगों को लगाए गए एमआरएनए टीकों की ओर ले जाती है, जिसे बनाने में एस्ट्राजेनेका कंपनी ने अहम भूमिका निभाई थी। शोध में कोविड के बाद 729 लोगों के मरने की जांच की गई थी।
यूपी समेत सभी राज्यों में लगेगी वैक्सीन
भारत सरकार ने 14 से 15 साल की बालिकाओं को एवपीवी वैक्सीन लगाने के लिए गावी के साथ अनुबंध किया है। इसके अलावा वैक्सीन अलायंस को भी कार्यक्रम में जोड़ा गया है, जो कि गेट्स फाउंडेशन का एक प्रमुख भागीदार है। इस वैक्सीन को यूपी समेत देश के सभी राज्यों में अगले महीने से लगाया जाएगा। भारत सरकार ने एक बयान में कहा कि वैक्सीन की क्वालिटी को बराकरार रखने और कोल्ड चेन को कायम रखने पर पुख्ता ध्यान दिया जा रहा है। वैक्सीन को आयुष्मान आरोग्य मंदिर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में लगाया जाएगा।




