भारत में लोकतंत्र का ‘प्रबंधित अवसान’, संविधान का लगातार जारी है अपमान
21वीं सदी की परफेक्ट तानाशाही की ओर बढ़ता राष्ट्र

● भारत में लोकतंत्र का ‘प्रबंधित अवसान’, संविधान का लगातार जारी है अपमान
● 21वीं सदी की परफेक्ट तानाशाही की ओर बढ़ता राष्ट्र
● लोकतंत्र का ढांचा बचा, आत्मा बुझा दी गई
● संस्थाओं का कब्जा, विरोध का व्यवस्थागत दमन
● नियंत्रित चुनाव, असमान अवसरों का नया युग
● मीडिया की मौन सहमति और सरकारी नैरेटिव का प्रभुत्व
● विपक्ष को निर्वाचित सजावट की भूमिका में धकेला
● पहचान, इतिहास और नागरिकता की वैचारिक इंजीनियरिंग
● एक संगठन का राष्ट्र-राज्य में रूपांतरण
● कानून, प्रशासन और चुनाव सभी नियंत्रण की तकनीक बने
◆ नैमिष प्रताप सिंह
मेक्सिको की राजनीति में एक ऐसा दौर आया था, जिसे पूरी दुनिया ने एक अनोखी संज्ञा दी परफेक्ट डिक्टेटरशिप। यह तानाशाही उस तरह की नहीं थी जिसमें बंदूकें हों, कू द’ता हो या संसदें भंग कर दी जाएं। नहीं यह तानाशाही इतनी सुव्यवस्थित, इतनी कानूनी और इतनी चुनावी थी कि वह लोकतंत्र का ही एक परिष्कृत, चमकदार मुखौटा बन गई। चुनाव नियमित होते थे, विपक्ष दिखता था, मीडिया जीवित था। लेकिन सत्ता का पूरा ढांचा और उसकी अंतिम दिशा एक ही केंद्र के अंदर कैद रहती थी। लोकतंत्र था, मगर सिर्फ नाम का; उसकी आत्मा को धीरे-धीरे सोख लिया गया था। आज भारत जिस रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है, वह इसी मॉडल की भयावह याद दिलाता है बस फर्क इतना है कि भारतीय संस्करण और भी विकसित, डिजिटल, गहन और वैचारिक है। यहां सत्ता परिवर्तन का खेल सिर्फ सरकारों के उतरने-चढ़ने तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की परिभाषा को बदल देने की प्रक्रिया में बदल चुका है। यह वही रूपांतरण है जिसमें संविधान अपनी जगह पर है, संसद चल रही है, अदालतें मौजूद हैं, चुनावी रैलियां हो रही हैं। फिर भी लोकतंत्र अपनी कार्यात्मक शक्ति खो चुका है। उसे जीवित रखा गया है, पर सिर्फ दिखाने के लिए एक मंचन की तरह, एक नाटक की तरह। भारतीय लोकतंत्र का यह बदलाव तीन परतों में गहराता है संस्थागत कब्जा, लोकतंत्र का प्रबंधन, और वैचारिक पुनर्निर्माण। ये तीनों परतें मिलकर एक ऐसा ढांचा खड़ा करती हैं जिसमें नागरिक वोट तो डालता है, लेकिन उसके वोट के मायने पहले ही एक वैचारिक और राजनीतिक मशीन पहले से तय कर चुकी होती है। यह परिवर्तन न तो अचानक है, न विद्रोही—बल्कि अत्यंत सुविचारित, कानूनी और धीरे-धीरे संचालित। इसे देखकर भ्रम होता है कि सब सामान्य है, क्योंकि सब कुछ प्रक्रिया के भीतर है, संविधान के भीतर है, नियमों के भीतर है। लेकिन इन्हीं नियमों को इस तरह मोड़ा गया है कि वे अब लोकतंत्र की रक्षा नहीं, बल्कि सत्ता के स्थायीकरण का साधन बन गए हैं। आरएसएस-बीजेपी का यह ढांचा, मेक्सिको की पीआरआई से इसलिए भी अधिक शक्तिशाली है क्योंकि यह सिर्फ राजनीतिक सत्ता पर नहीं, नागरिक की चेतना पर कब्जा जमाता है। पीआरआई ने राजनीति नियंत्रित की, आरएसएस यह नियंत्रित करता है कि कौन देशभक्त है, कौन राष्ट्रद्रोही, किसका इतिहास असली है और किसे नागरिकता का अधिकार है। यह सिर्फ सत्ता का केंद्रीकरण नहीं यह राष्ट्र के मानस का पुनर्गठन है। यह वह प्रक्रिया है जिसमें इतिहास बदला जाता है, पहचानें गढ़ी जाती हैं, नैरेटिव लिखे जाते हैं और नागरिकता को वैचारिक परीक्षा में बदल दिया जाता है। सबसे पहलू यह है कि यह सब कानूनी, लोकतांत्रिक, और शांतिपूर्ण तरीके से होता है। जब तक कि एक दिन आपको महसूस न हो कि देश बदला नहीं गया, देश की आत्मा ही बदल दी गई है।
भारत में लोकतंत्र का नया रूप नियंत्रण का जाल और नागरिकता का पुनर्निर्माण
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां लोकतंत्र की परम्परागत परिभाषाएं तेजी से ध्वस्त हो रही हैं। चुनाव हो रहे हैं, संसदें चल रही हैं, अदालतें मौजूद हैं, विपक्ष दिखता है पर यह सब उसी तरह है जैसे पुरानी हवेली पर नए रंग का प्लास्टर। संरचना वही है, पर भीतर के कमरे पूरी तरह खिसका दिए गए हैं। इस संरचना को पैदा करने की प्रक्रिया धीमी, कानूनी, और बेहद सुनियोजित है। जिसका लक्ष्य सत्ता के स्थायी कब्जे के लिए लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से रूपांतरित करना है। पहला स्तंभ है संस्थागत कब्जा जहां लोकतंत्र की रीढ़ टूटती है। भारत की प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं चुनाव आयोग, प्रवर्तन एजेंसियां, राजस्व तंत्र, पुलिस, नौकरशाही और मीडिया एक-एक करके एक ही वैचारिक केंद्र की परिधि में समेट दी गई हैं।
यह कब्जा प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियुक्तियों, जांचों, तबादलों और संसाधनों के पुनर्विनियोजन के माध्यम से किया गया। विपक्ष को मिटाया नहीं गया बस इतना कमजोर कर दिया गया कि वह लोकतंत्र की ‘फोटो फ्रेम’ में एक सजावटी अस्तित्व बनकर रह जाए।
सीबीआई और ईडी की कार्रवाई का पैटर्न किसी भी साधारण नागरिक को बता सकता है कि कानून अब एक औजार है एक विशेष दिशा में लक्षित। दूसरा स्तंभ है लोकतंत्र का प्रबंधन मतदान होता है, पर विकल्प ‘प्रबंधित’ होते हैं। मेक्सिको की पीआरआई ने इस तकनीक में महारत हासिल की थी। चुनाव भी होते थे और परिणाम भी तय ही रहते थे। भारत में यह मॉडल अब डिजिटल युग में और भी प्रभावी हो चुका है।
आज मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता के नैरेटिव को बढ़ा रहा है। विपक्ष के पास प्रचार के संसाधन नहीं, मीडिया स्पेस नहीं, और एजेंसियों की तलवार का लगातार भय है। जनता वोट डालती है पर जिस दुनिया में वह वोट डालती है, वही पहले से सत्ता द्वारा तैयार कर दी गई होती है। यही है प्रबंधित सहमति जिसमें जनता को चुनने का भ्रम दिया जाता है, पर चुनने की सीमाएं पहले ही निर्धारित कर दी जाती हैं। तीसरा स्तंभ है वैचारिक पुनर्निर्माण संगठन से राष्ट्र-राज्य तक। यहीं पर भारत पीआरआई से आगे निकलता है। पीआरआई ने सत्ता नियंत्रित की और आरएसएस नागरिक की पहचान नियंत्रित करता है। यह तय करता है कि कौन देशभक्त, कौन ‘असली’ हिंदू, किसका इतिहास असली, किसको नागरिकता का हक, किसे दुश्मन बताया जाएगा। यह सिर्फ शासन नहीं यह चेतना की इंजीनियरिंग है। जब करोड़ों का फंड संघ भवनों पर खर्च हो, जब सुरक्षा बल संघ मुख्यालय की रक्षा करें, और 25 सौ से अधिक संगठन सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक, महिला, युवा, ग्रामीण, पर्यावरणीय, तकनीकी नेटवर्क के रूप में सक्रिय हों तो यह एक संगठन-राज्य का निर्माण प्रतीत होता है।
नागरिकता की पुनर्परिभाषा और इतिहास का पुनर्लेखन
प्राचीन भारत का गौरव, आक्रांताओं की कहानियां, हिंदू पहचान, राष्ट्रवाद इन सबको एक राजनीतिक ईंधन में बदल दिया गया है। जो इससे असहमत है, वह ‘राष्ट्रविरोधी’ हैं। जो सवाल पूछता है, वह ‘शत्रु’ है। यह लेबलिंग नागरिकता को एक वैचारिक परीक्षा में बदल देती है।
डिजिटल युग का तानाशाही मॉडल अदृश्य नियंत्रण की तकनीक
21वीं सदी का यह मॉडल तानाशाही की तरह दिखता नहीं लेकिन काम तानाशाही जैसा ही करता है। यहां सेंसरशिप भी है, पर कानूनी नहीं। मीडिया नियंत्रण भी है, पर कॉर्पोरेट संरचनाओं के माध्यम से। विपक्ष का दमन भी है, पर जांचों के रूप में। सत्ता का केंद्रीकरण भी है, पर राष्ट्रहित के नाम पर। इस मॉडल को ताकत इसलिए मिलती है क्योंकि जनता को लगता है कि सब कुछ सामान्य है। सब कुछ चुनावी ढंग से, व्यवस्थित तरीके से होता रहता है और फिर एक दिन देश की आत्मा बदल चुकी होती है।
लोकतंत्र का अंतिम प्रश्न क्या यह वापसी योग्य
सबसे बड़ी चिंता यही है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे, कानूनी और शांतिपूर्ण ढंग से होती है। इतनी शांत कि जनता को बोध ही न हो कि लोकतंत्र की जमीन उसके पैरों के नीचे से हटा दी गई है। भारत आज जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह किसी एक दल का एजेंडा नहीं यह पूरा वैचारिक प्रोजेक्ट है, जिसे देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे के भीतर गहरे रोपा जा चुका है।
* लोकतंत्र संरचना के रूप में मौजूद, पर आत्मा खो चुका है।
* संवैधानिक संस्थाओं पर वैचारिक कब्जा।
* चुनाव होते हैं, पर समान अवसर नहीं।
* मीडिया नैरेटिव का केंद्रीकरण, विपक्ष का दमन।
* नागरिकता, इतिहास और पहचान का वैचारिक पुनर्परिभाषण।
* आरएसएस का संगठन-राज्य मॉडल पीआरआई से अधिक प्रभावी।
* डिजिटल युग की अदृश्य तानाशाही कानूनी परंतु नियंत्रित।
* राष्ट्र की आत्मा के धीरे-धीरे बदले जाने की प्रक्रिया।




