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मनुवादी विधान की जकड़न में संविधान, बाबा साहेब की मर्यादा का रखे ध्यान

न्याय में भेदभाव और अंबेडकर का सपना अधूरा, जयपुर हाईकोर्ट में आज भी विराजमान है मनु की मूर्ति

जस्टिस ओका की सख्त सलाह कोर्ट में पूजापाठ बंद हो, संविधान को मिले सर्वोच्च सम्मान

75 वर्षों बाद भी संविधान बना है सिर्फ एक राजकीय दस्तावेज

न्यायपालिका में दलित-पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व नगण्य

संविधान की जगह मनुवादी संस्कारों का वर्चस्व

जमीनी हकीकत में पराजित होते अंबेडकर के आदर्श

‘जय भीम’ बन गया है महज रस्म, दर्शन हो गया प्रदर्शन

मनुवाद के पुनरुत्थान के बीच अदालती न्याय का उपहास

(मदन कोथुनियां)

 

जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में भारत का भविष्य रचा, तब उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना की थी जो जातिवाद, पितृसत्ता और धार्मिक वर्चस्व से मुक्त होगा। लेकिन 75 वर्षों के बाद भी यह सपना अधूरा है। मनुवादी सोच, जो सदियों से भारतीय समाज की रगों में बह रही है, आज भी संविधान की आत्मा को बेबस और लाचार किए हुए है।

डॉ.अंबेडकर ने संविधान निर्माण के दौरान रात-दिन मेहनत की। उनका लक्ष्य था सभी नागरिकों को समान अधिकार, न्याय और गरिमा दिलाना। लेकिन अफसोस, आज संविधान की भावनाएं केवल सरकारी कागजों और समारोहों तक सिमट कर रह गई हैं। जमीनी सच्चाई यह है कि सामाजिक संरचना अभी भी मनुवादी परंपराओं से संचालित हो रही है। इस विडंबना का सबसे ठोस प्रतीक जयपुर उच्च न्यायालय परिसर में स्थापित मनु की मूर्ति है। यह वही मनु हैं, जिनकी ‘मनुस्मृति’ ने स्त्रियों, दलितों और शूद्रों को मानवेतर दर्जा देकर सदियों तक सामाजिक अन्याय को वैधता दी। यही वह ग्रंथ था जिसे अंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को सार्वजनिक रूप से जलाया था। लेकिन 1989 में राजस्थान हाईकोर्ट के परिसर में न्यायिक सेवा संगठन के अध्यक्ष पद्म कुमार जैन ने, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एमएम कासलीवाल की अनुमति से मनु की मूर्ति स्थापित कर दी। इसके विरोध में दलित संगठनों और जनपक्षधर नागरिकों ने आवाज़ उठाई। लेकिन हिंदू महासभा ने आचार्य धर्मेन्द्र के जरिए मूर्ति हटाने पर स्टे ले लिया। तब से लेकर आज तक सिर्फ दो बार इस पर सुनवाई हुई है, और हर बार टकराव के कारण मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

यह दृश्य केवल प्रतीकात्मक नहीं है, यह हमारे समाज की भीतरी जटिलता और न्याय प्रणाली की पूर्वग्रह ग्रस्त संरचना को भी उजागर करता है। संविधान चाहे जितना ही समता और न्याय की बात करे, पर यदि उसे लागू करने वाले वही लोग हों जो ‘मनुस्मृति’ के अनुयायी रहे हों, तो न्याय की आशा बेमानी हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अभय ओका ने हाल ही में स्पष्ट तौर पर कहा कि अदालतों में किसी भी कार्यक्रम की शुरुआत धार्मिक पूजापाठ से नहीं, बल्कि संविधान की प्रस्तावना पढ़कर होनी चाहिए। यह वक्तव्य उस तानेबाने पर सीधा प्रहार था जिसमें भारतीय न्यायपालिका आज भी परंपरागत धार्मिक विधियों को प्राथमिकता देती है। जस्टिस भूषण आर. गवई ने भी इस अवसर पर कहा कि अब वक्त है जब संविधान के मूल्यों को वास्तविक सम्मान दिया जाए, न कि उन्हें केवल औपचारिक घोषणाओं तक सीमित रखा जाए।

बावजूद इसके, अधिकांश न्यायिक और प्रशासनिक आयोजनों में दीप प्रज्वलन और पूजन आज भी नियम हैं। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि मनुवादी संस्कृति कैसे संवैधानिक विचारों पर हावी है। जस्टिस ओका ने स्वीकार किया कि कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें पूर्ण सफलता नहीं मिली। यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि संविधान को व्यवहार में लाने के रास्ते में संस्कृतिकरण और धार्मिक जड़ता सबसे बड़ी बाधा हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस व्यवस्था पर प्रश्न उठाया था। उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका में दलित, पिछड़े और वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। जब तक हर तबके की भागीदारी न्याय के मंदिरों में नहीं होगी, तब तक संविधान का वास्तविक मूल्यांकन अधूरा रहेगा।

आज भी भारत की 90 प्रतिशत आबादी, जो दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों से मिलकर बनी है, वह न्याय और गरिमा के लिए संघर्ष कर रही है। संविधान में प्रदत्त आरक्षण और सामाजिक न्याय की व्यवस्था को अब ‘तुष्टीकरण’ कहकर मज़ाक बनाया जा रहा है, जबकि ब्राह्मणवादी परंपराओं को ‘धार्मिक आस्था’ कहकर संरक्षित किया जा रहा है। ‘जय भीम’ जैसे नारे, जो कभी विद्रोह और आत्मसम्मान के प्रतीक थे, अब एक उत्सवधर्मिता और रस्म बन कर रह गए हैं। डॉ. अंबेडकर के अनुयायी उनकी तस्वीरों पर माला चढ़ाते हैं, लेकिन उनके विचारों को अपनाने में पीछे हैं। संविधान, जो एक क्रांति का दस्तावेज था, अब शपथ लेने की औपचारिकता भर बन गया है।

जयपुर हाईकोर्ट परिसर में एक तरफ मनु की चमकती मूर्ति खड़ी है, तो दूसरी तरफ अंबेडकर की मूर्ति उपेक्षित है। यह दृश्य प्रतीक है उस भारतीय समाज का, जहां आज भी न्याय के नाम पर भेदभाव और परंपराओं के नाम पर अत्याचार हो रहा है। यदि हमें सचमुच अंबेडकर का भारत बनाना है, तो जरूरी है कि संविधान केवल किताबों में न रहे। वह हमारे व्यवहार, हमारी संस्कृति और हमारी संस्थाओं में जीवंत हो। अदालतों से लेकर संसद तक, स्कूलों से लेकर पंचायतों तक, हर जगह मनुवाद को बेनकाब कर के संवैधानिक मूल्यों को स्थापित करना होगा। अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब संविधान केवल एक राजकीय दस्तावेज बनकर रह जाएगा और भारत पुनः उसी मनुवादी दलदल में फंसा मिलेगा, जिससे निकलने के लिए डॉ. अंबेडकर ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था।

* संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह आज भी मनुवादी संस्कारों की जकड़न में कैद है।
* जयपुर हाईकोर्ट परिसर में आज भी मनु की मूर्ति न्यायपालिका के चेहरे पर एक कटाक्ष बनकर खड़ी है।
* जस्टिस अभय ओका ने हाल ही में खुले मंच से कहा कि पूजापाठ के बजाय संविधान की प्रस्तावना के सामने झुकना चाहिए।
* पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने न्यायपालिका में दलित-पिछड़ा प्रतिनिधित्व न होने पर चिंता जाहिर की थी।
* मनुस्मृति, गीता और पौराणिक ग्रंथों ने सदियों से दलितों-स्त्रियों के अस्तित्व को दबाया है, आधुनिक संविधान भी इससे बच नहीं पाया।
* 1989 से आज तक मनु की मूर्ति हटाने का मामला लंबित है, केवल दो बार सुनवाई और हर बार टकराव का माहौल।
* अंबेडकर के अनुयायी आज सिर्फ ‘जय भीम’ की रस्म निभाते हैं, दर्शन से कोसों दूर जा चुके हैं।
* धार्मिक अनुष्ठानों के सहारे संवैधानिक कार्यक्रमों की शुरुआत एक विडंबना बन चुकी है।

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