
- सत्ता की राजनीति में राष्ट्रपति की गरिमा दांव पर
- मोदी सरकार ने राष्ट्रपति पद को बना दिया राजनीतिक औजार!
- बंगाल दौरे को लेकर उठा संवैधानिक गरिमा का सवाल
- चुनावी माहौल में संथाल सम्मेलन की टाइमिंग पर विवाद
- राष्ट्रपति की भूमिका और दलगत राजनीति की सीमा
- ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया से गरमाई सियासत
- राज्यपालों के बाद अब राष्ट्रपति पद भी राजनीतिक बहस में
- केंद्र सरकार बढ़ा रही है टकराव की राजनीति!
- संवैधानिक पदों की निष्पक्षता पर उठते गंभीर सवाल
- लोकतंत्र में राष्ट्रपति की भूमिका पर नई बहस

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च संवैधानिक पद माना जाता है। यह पद सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं बल्कि संविधान की मर्यादा, संस्थाओं की गरिमा और लोकतांत्रिक संतुलन का भी प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह दलगत राजनीति से पूरी तरह ऊपर उठकर काम करेगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से राष्ट्रपति पद को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़े हैं, उसने इस परंपरा और मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल की यात्रा के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से जुड़े प्रोटोकॉल विवाद ने इस बहस को और तेज कर दिया है। राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से यह नाराजगी जताई कि उनकी यात्रा के दौरान राज्य सरकार की ओर से अपेक्षित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर राष्ट्रपति का अपमान करने का आरोप लगाया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद अब भी राजनीतिक विवादों से ऊपर है या उसे भी सियासी संघर्ष का हिस्सा बना दिया गया है। पश्चिम बंगाल में अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के आयोजन और उसमें राष्ट्रपति की भागीदारी को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हुआ जब राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले राजनीतिक माहौल बेहद गर्म था। ऐसे में राष्ट्रपति का किसी जातीय सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक अर्थ ग्रहण करने लगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं संथाल समुदाय से आती हैं और आदिवासी समाज के कार्यक्रम में उनका शामिल होना सामान्य तौर पर विवाद का विषय नहीं होना चाहिए। लेकिन जब कोई कार्यक्रम चुनावी माहौल में आयोजित हो और उसके राजनीतिक निहितार्थ सामने आने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसी आधार पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रपति पद का इस्तेमाल कर रही है। ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति को आदिवासी सम्मान की इतनी चिंता है तो फिर उन घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई जहां आदिवासियों के साथ अत्याचार की खबरें सामने आईं। यह विवाद सिर्फ एक यात्रा या प्रोटोकॉल का मामला नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल छिपा हुआ है। राष्ट्रपति पद की निष्पक्षता अब धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। पिछले एक दशक में कई राज्यपालों को लेकर भी इसी तरह के विवाद सामने आए हैं। विपक्षी दलों का आरोप रहा है कि कई राज्यपाल अपने संवैधानिक दायित्वों से अधिक राजनीतिक भूमिका निभाते दिखाई देते हैं। अब अगर इसी तरह के आरोप राष्ट्रपति पद को लेकर भी उठने लगें तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत माना जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पिछले 12 वर्षों में कई राजनीतिक और संवैधानिक प्रयोग किए हैं। समर्थकों का मानना है कि यह मजबूत नेतृत्व की निशानी है, जबकि आलोचक इसे संस्थागत संतुलन के कमजोर होने के रूप में देखते हैं। पश्चिम बंगाल का यह विवाद भी इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि राष्ट्रपति के स्वागत के लिए मुख्यमंत्री क्यों नहीं पहुंचे। असली सवाल यह है कि क्या संवैधानिक पदों को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। भारत जैसे लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। अगर राष्ट्रपति, राज्यपाल या अन्य संवैधानिक पदों को लेकर लगातार राजनीतिक विवाद खड़े होने लगें तो इससे लोकतांत्रिक ढांचे की निष्पक्षता पर भी असर पड़ता है। पश्चिम बंगाल का यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि लोकतंत्र में संवैधानिक पदों की सीमाएं क्या हैं और सरकारों को इन सीमाओं का कितना सम्मान करना चाहिए।

राष्ट्रपति पद की गरिमा और राजनीति का टकराव
भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में राष्ट्रपति का पद सिर्फ संवैधानिक औपचारिकता नहीं बल्कि संस्थागत संतुलन का प्रतीक माना जाता है। संविधान निर्माताओं ने इस पद को इस तरह डिजाइन किया था कि यह सत्ता की रोजमर्रा की राजनीति से ऊपर रहे और संकट के समय संविधान का अंतिम संरक्षक बनकर सामने आए। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़े हैं, उसने इस पद की निष्पक्षता और गरिमा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की हालिया यात्रा इसी बहस का ताजा उदाहरण बन गई है। अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उनकी उपस्थिति और उसके बाद पैदा हुए प्रोटोकॉल विवाद ने केंद्र और राज्य के बीच पहले से चल रहे राजनीतिक तनाव को और तेज कर दिया है। राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर यह नाराजगी जताई कि उनकी यात्रा के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से उचित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे राष्ट्रपति का अपमान करार दिया। केंद्र सरकार के कई नेताओं ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और तृणमूल कांग्रेस सरकार पर संवैधानिक पद की अवमानना का आरोप लगाया। लेकिन इस विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
चुनावी राजनीति और संथाल सम्मेलन की टाइमिंग
पश्चिम बंगाल में जिस अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन को लेकर विवाद पैदा हुआ, उसकी टाइमिंग ने ही इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया। राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले इस सम्मेलन का आयोजन किया गया और उसमें राष्ट्रपति को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं संथाल समुदाय से आती हैं और आदिवासी समाज के कार्यक्रम में उनकी भागीदारी स्वाभाविक रूप से सम्मान का विषय हो सकती है। लेकिन जब कोई कार्यक्रम चुनावी माहौल में आयोजित हो और उसमें संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति शामिल हो तो उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल की राजनीति में आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राज्य में करीब सात फीसदी आदिवासी मतदाता हैं और उनमें संथाल समुदाय का प्रभाव काफी बड़ा है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले इस तरह का सम्मेलन आयोजित होना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक संदेश देता है। इसी कारण मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस कार्यक्रम को लेकर खुलकर सवाल उठाए।
ममता बनर्जी का पलटवार
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर उठे विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ तौर पर आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रपति पद का इस्तेमाल कर रही है। ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि अगर आदिवासी सम्मान की बात की जा रही है तो फिर उन घटनाओं पर राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई जहां आदिवासी महिलाओं और समुदायों के साथ अत्याचार की खबरें सामने आई थीं। उन्होंने मणिपुर की हिंसा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों से जुड़े विवादों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इन मुद्दों पर राष्ट्रपति की चुप्पी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी बंगाल के मामले में उनकी नाराजगी। ममता बनर्जी का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि केंद्र और राज्य के बीच बढ़ते टकराव का संकेत भी था।
प्रोटोकॉल विवाद या राजनीतिक संदेश
पूरे विवाद में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में प्रोटोकॉल का मामला था या राजनीतिक संदेश देने की कोशिश। भारतीय परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति के किसी राज्य दौरे पर मुख्यमंत्री का स्वागत करना शिष्टाचार माना जाता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। कई मौकों पर मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति भी रही है। हाल के वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब राष्ट्रपति के कार्यक्रमों में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद नहीं रहे, लेकिन उस समय कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ। इसलिए जब पश्चिम बंगाल के मामले में इसे लेकर इतना बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ तो कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसे चुनावी राजनीति के संदर्भ में देखा।
राज्यपालों से शुरू हुआ विवाद
संवैधानिक पदों के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर विवाद नया नहीं है। पिछले एक दशक में कई राज्यों में राज्यपालों की भूमिका को लेकर गंभीर विवाद सामने आए हैं। तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में राज्यपाल और निर्वाचित सरकारों के बीच टकराव लगातार सुर्खियों में रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि कई राज्यपाल अपने संवैधानिक दायित्वों से अधिक राजनीतिक भूमिका निभाते दिखाई देते हैं और कई मामलों में केंद्र सरकार की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन जाते हैं। इसी संदर्भ में अब राष्ट्रपति पद को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
राष्ट्रपति पद का राजनीतिक प्रतीकवाद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले 12 वर्षों में राजनीतिक प्रतीकवाद की राजनीति को काफी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया है। दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदायों से आने वाले नेताओं को बड़े संवैधानिक पदों पर बैठाकर भाजपा ने सामाजिक प्रतिनिधित्व का एक नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का चुनाव भी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना गया था। आलोचकों का आरोप है कि प्रतिनिधित्व की राजनीति के साथ-साथ इन पदों का राजनीतिक इस्तेमाल भी बढ़ा है।
लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता का सवाल
भारत जैसे लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। अगर राष्ट्रपति, राज्यपाल और अन्य संवैधानिक पदों को लेकर लगातार राजनीतिक विवाद खड़े होते रहेंगे तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी असर पड़ेगा। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति पद की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता और मर्यादा है। अगर इस पद को लेकर भी राजनीतिक टकराव बढ़ने लगे तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर हो सकता है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर पैदा हुआ विवाद केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है। यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत में संवैधानिक संस्थाएं अब भी राजनीति से ऊपर हैं या वे भी सियासी संघर्ष का हिस्सा बनती जा रही हैं। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता स्थायी होती है। अगर इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे तो उसका असर पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है।
पश्चिम बंगाल का यह विवाद शायद समय के साथ खत्म हो जाएगा, लेकिन इसने जो सवाल खड़े किए हैं वे लंबे समय तक भारतीय राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था के सामने चुनौती बने रहेंगे।
* राष्ट्रपति की पश्चिम बंगाल यात्रा से उपजा विवाद
* प्रोटोकॉल और संवैधानिक मर्यादा पर सवाल
* चुनावी माहौल में संथाल सम्मेलन की टाइमिंग
* केंद्र और राज्य के बीच बढ़ता राजनीतिक टकराव
* संवैधानिक पदों की निष्पक्षता पर बहस
* राज्यपालों की भूमिका को लेकर पहले से मौजूद विवाद
* राष्ट्रपति पद के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप
* लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर उठते सवाल




