
● मोदी के बाद योगी ही बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा, इनके सिर पर ही सजेगा पीएम पद का “सेहरा”!
● योगी का दौर विकास भी, विवाद भी लेकिन सफर लोक कल्याण मार्ग की ओर
● राजनीति की भीड़ में एक योगी, जहां खड़े होते बहस वहीं शुरू हो जाती
● अजय से योगी तक वह सफर जिसे अब पूरा देश देख रहा
● यूपी की कुर्सी पर पहली बार लौटा कोई मुख्यमंत्री
● बुलडोजर की धमक से लेकर प्रशासनिक सर्जरी तक
● हिंदुत्व की नई ढंग से व्याख्या कठोरता में भी व्यवस्था
● राष्ट्रीय राजनीति में योगी कौन कहता है चर्चा नहीं
● मोदी के बाद सबसे बड़ा चेहरा
● 2027 सिर्फ यूपी चुनाव नहीं, भावी प्रधानमंत्री की परीक्षा
● साधु, प्रशासक, और संभावित राष्ट्रीय नेतृत्व तीनों का संगम
◆ रीना.एन.सिंह (अधिवक्ता उच्चतम न्यायालय)
नई दिल्ली/राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि नेता पैदा नहीं होते बनाए जाते हैं। लेकिन कभी-कभी समय खुद किसी को चुन लेता है। योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक उदय ऐसा ही है। जहां एक साधु ने सत्ता को नहीं खोजा, बल्कि सत्ता खुद गोरखनाथ मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर उनके पास चली गई। उत्तर प्रदेश जैसा विशाल, जटिल और राजनीतिक रूप से खदबदाता राज्य, जहां मुख्यमंत्री की कुर्सी अक्सर गर्म तवे की तरह रहती है, वहां योगी आदित्यनाथ पांच साल बैठकर गए भी नहीं… बल्कि लौटकर फिर आ गए। अब चर्चा यह नहीं कि योगी यूपी में क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि दिल्ली में आगे क्या कर सकते हैं। किसी नेता के लिए इससे बड़ा ‘व्यंग्यात्मक सकारात्मक’ प्रमाण क्या होगा कि दूसरे राज्यों में लोग मजाक में नहीं, गंभीरता से कहते हैं हमारे यहां भी योगी जैसा एक भेज दो।
लोक कल्याण के पथ से लोक कल्याण मार्ग तक योगी आदित्यनाथ की बदलती राजनीति
भारत की राजनीति में यह दुर्लभ है कि कोई मुख्यमंत्री अपनी प्रशासनिक शैली, वैचारिक प्रतिबद्धता और निडर व्यक्तित्व से राज्य की सीमाओं को लांघकर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन जाए। लेकिन योगी आदित्यनाथ इसका सबसे ताजा और चर्चित उदाहरण हैं। 1992 में जब 22 वर्षीय अजय सिंह बिष्ट ने सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास ग्रहण किया और योगी आदित्यनाथ बने, तब किसी को नहीं लगा होगा कि यह साधु एक दिन देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय भविष्य का सबसे चर्चित चेहरा बन जाएगा। योगी आदित्यनाथ ने न तो परंपरागत राजनीति सीखी, न ही राजनीतिक वंशवाद की सीढ़ियां चढ़ीं। वे जनता की नब्ज, हिंदुत्व की धारा और प्रशासनिक दृढ़ता के साथ राजनीति में उतरे और सीधे सीएम के पद तक पहुंचे। इसी सफर के कारण उनका व्यक्तित्व आज साधु भी, प्रशासक भी, और संभावित राष्ट्रीय नेता का एक अनोखा मिश्रण है।
2017 अप्रत्याशित घोषणा, एक नया प्रयोग
2017 में जब उन्हें मुख्यमंत्री घोषित किया गया, तब कई चेहरे चौंके थे। विश्लेषकों ने यह अनुमान लगाया कि भाजपा ने हिंदुत्व के कट्टर राजनीतिक प्रतीक को प्रशासनिक चेहरा बना दिया। लेकिन अगले पांच वर्षों में योगी ने इस छवि को और गहराई दी। कानून व्यवस्था की सर्जरी, माफियाओं पर प्रहार और हिंदुत्व की आक्रामक व्याख्या। उनकी बुलडोजर शैली इतनी लोकप्रिय हुई कि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक इस मशीन ने शासन की प्रतीकात्मक छवि ले ली।
लोग कहते हैं कि जब अफसर फाइल नहीं समझते, योगी उन्हें बुलडोजर की आवाज में समझाते हैं।
वर्ष 2022 में वापसी… जो यूपी ने कभी नहीं देखी
उत्तर प्रदेश में किसी मुख्यमंत्री का पांच साल पूरे करने के बाद फिर से सत्ता में लौट आना लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन योगी ने यह कर दिखाया 2022 में भाजपा को फिर जीत मिली और योगी मुख्यमंत्री बने ऐतिहासिक, अभूतपूर्व, और उनके नेतृत्व की स्वीकृति का सबसे बड़ा प्रमाण। राजनीति में यह पूरी तरह स्पष्ट संदेश था कि जनता ने योगी की कड़ाई को दंड नहीं, व्यवस्था का इलाज माना।
बुलडोजर बाबा प्रशंसा भी, विवाद भी… लेकिन प्रभाव गहरा
भारत में अपराध और राजनीति का रिश्ता कोई नया नहीं, लेकिन अपराधियों के विरुद्ध योगी की शैली नई थी। केंद्रित, तेज, और राजनीतिक दबाव से लगभग मुक्त। यूपी पुलिस का मनोबल पहली बार कई जगह दिखाई दिया कि ऊपर से कोई फोन नहीं आएगा। यही कारण है कि पूरे देश में एक ‘व्यंग्यात्मक सकारात्मक’ ट्रेंड चला योगी जैसा सीएम चाहिए। आलोचक कहते रहे कि यह अति-कठोरता है, लेकिन समर्थकों का तर्क था जहां अपराधी नहीं सुनते, वहां ढोल नहीं, बुलडोजर बजता है।
भाजपा का भविष्य मोदी के बाद सबसे चर्चा में कौन
यह प्रश्न अब सिर्फ टीवी चैनलों का नहीं रह गया है।
भाजपा के भीतर और राष्ट्रीय राजनीति में भी यह चर्चा मौजूद है कि मोदी के बाद यदि कोई नेता सबसे अधिक जन पक्षीय पहचान रखता है तो वह योगी आदित्यनाथ हैं। स्पष्ट विचारधारा दुविधा नहीं, कठोर प्रशासन कोई ढील नहीं, राजनीतिक ईमानदारी कोई निजी परिवार नहीं, कोई वंश नहीं, जनप्रियता गांव से शहर तक एक समान अपील। हिंदुत्व व विकास का अनोखा मेल इन्हीं कारणों से वे भाजपा की राष्ट्रीय नेतृत्व सूची में सबसे ऊपर माने जाते हैं।
दिल्ली की राजनीति योगी पर बढ़ती निगाहें
दिल्ली के सियासी गलियारों में एक वाक्य अक्सर सुनाई देता है कि जब भी भाजपा नेतृत्व में बदलाव होगा, चर्चा योगी पर शुरू होगी। 2029 तक का राजनीतिक परिदृश्य देखें, तो यह एकदम स्पष्ट है कि योगी को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका मिल सकती है।।2027 का यूपी विधानसभा चुनाव इसलिए सिर्फ यूपी का चुनाव नहीं क्योंकि यह भविष्य के प्रधानमंत्री की संभावित परीक्षा भी है।
साधु व प्रशासक का अनोखा राजनीतिक मॉडल
योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी उनका व्यक्तित्व है। साधु होने से उन पर व्यक्तिगत स्वार्थ या पारिवारिक लाभ का आरोप नहीं लगता। वहीं मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि कठोर, ईमानदार और तेज फैसले लेने वाली रही है। देश में ऐसे नेता बहुत कम हैं जो धर्म, राष्ट्रीय सुरक्षा, और विकास तीनों पर समान मजबूती से बोलते हों।
चुनौतियां जिनसे बचना नहीं, सामना करना होगा
हालांकि योगी का उदय सरल नहीं है। एक राष्ट्रीय नेता बनने के लिए उन्हें सिर्फ उत्तर प्रदेश नहीं, पूरे देश में स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। सभी जातियों, वर्गों और राज्यों को एक साथ जोड़ना होगा। हिंदुत्व की छवि के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि और कूटनीति की समग्र पहचान बनानी होगी। लेकिन योगी की अब तक की यात्रा दिखाती है कि वे चुनौतियों को अवसर में बदलना जानते हैं।
योगी आदित्यनाथ भाजपा के भविष्य का सबसे ठोस स्तंभ
भारत की राजनीति में अक्सर नेता बनते-बिगड़ते रहते हैं, लेकिन कुछ लोग समय के साथ और मजबूत होते जाते हैं। योगी आदित्यनाथ उन नेताओं में से हैं। यदि वे दिल्ली पहुंचते हैं तो उनकी प्राथमिकताएं स्पष्ट होंगी कि आंतरिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, और विकास का तेज मॉडल। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत एक ऐसे नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है जो कठोर भी होगा, लेकिन स्पष्ट राष्ट्रवादी भी होगा जो प्रशासनिक रूप से सक्षम भी होगा। यह प्रोफाइल आज भाजपा में योगी आदित्यनाथ के अलावा किसी के पास लगभग नहीं है।
* वर्ष 1992 में संन्यास लेने वाले अजय सिंह बिष्ट आज भाजपा के भविष्य के सबसे प्रमुख चेहरे।
* वर्ष 2017 में योगी की नियुक्ति अप्रत्याशित, लेकिन 2022 की वापसी ऐतिहासिक।
* कानून व्यवस्था सुधार में बुलडोजर शैली समर्थकों के लिए इलाज, आलोचकों के लिए विवाद।
* मोदी के बाद भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे चर्चा योगी आदित्यनाथ की।
* 2027 का यूपी चुनाव संभावित राष्ट्रीय नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा।
* साधु व प्रशासक योगी का राजनीतिक मॉडल भाजपा की विचारधारा से पूरी तरह मेल खाता है।
* राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ने की संभावना वर्ष 2029 तक परिदृश्य साफ।
* योगी का उदय विकास, हिंदुत्व और प्रशासनिक कड़ाई तीनों का संगम।




