मोदी के संरक्षण में 32,700 करोड़ का बैंक घोटाला, न खाऊंगा न खाने दूंगा के स्लोगन का निकल गया दिवाला
मोदी राज में कॉरपोरेट लूट, बैंक मौन और अदानी की निगाह

● मोदी के संरक्षण में 32,700 करोड़ का बैंक घोटाला, न खाऊंगा न खाने दूंगा के स्लोगन का निकल गया दिवाला
● मोदी राज में कॉरपोरेट लूट, बैंक मौन और अदानी की निगाह
● 32,700 करोड़ का घोटाला, लेकिन आरबीआई को रिपोर्ट सिर्फ 2434 करोड़ की
● एसआरईआई ग्रुप ने 24 बैंकों का पैसा हड़पा, 23 बैंक चुप क्यों
● 2013 से मोदी सत्ता के करीबी रहे कनोरिया परिवार के तार
● लोन लेकर अपनी ही कंपनियों को सूद पर पैसा देने का खेल
● आरबीआई बोर्ड में बैठा, फिर भी लूट चलती रही
● दीवालिया घोषित कंपनी पर अदानी पावर की दिलचस्पी
● बैंकिंग सिस्टम में सुनियोजित चुप्पी और राजनीतिक संरक्षण
● जनता का पैसा, कॉरपोरेट मुनाफा और सरकार की चुप्पी
◆ पँचशील अमित मौर्य
मुंबई/नई दिल्ली। यह सिर्फ एक बैंक घोटाले की खबर नहीं है। यह उस सड़े हुए तंत्र का पोस्टमार्टम है, जिसे मोदी सरकार ‘अमृतकाल’ कहकर बेच रही है। दिसंबर 2025 में पंजाब नेशनल बैंक द्वारा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को 2434 करोड़ रुपये के लोन घोटाले की सूचना देना दरअसल उस हिमखंड का सिरा था, जिसके नीचे 32,700 करोड़ रुपये की कॉरपोरेट लूट दबी हुई है। पीएनबी ने जैसे ही आरबीआई को चिट्ठी लिखी, बाजार कांप उठा, बैंक के शेयर लुढ़क गए और सिस्टम के भीतर यह संदेश चला गया कि सत्ताधारी दौर में घोटाले उजागर करना अपराध से कम नहीं। लेकिन असली अपराध तो यह है कि 24 बैंकों का पैसा लूटा गया और 23 बैंक आंख मूंदे बैठे रहे। यह चुप्पी संयोग नहीं, साजिश है। यह वही दौर है जिसमें कॉरपोरेट घराने बैंकों से हजारों करोड़ निकालकर खुद को दीवालिया घोषित करते हैं और सरकार आंखें मूंदे खड़ी रहती है। विजय माल्या और नीरव मोदी के बाद अब एसआरईआई ग्रुप उसी कतार में खड़ा है फर्क बस इतना है कि यह घोटाला देश के भीतर रहकर, सिस्टम के संरक्षण में अंजाम दिया गया। 32,700 करोड़ रुपये का यह घोटाला बताता है कि मोदी राज में बैंकिंग सिस्टम किस हद तक कॉरपोरेट के सामने नतमस्तक हो चुका है। जनता का पैसा लुटता है, बैंक मौन रहते हैं और सत्ता के करीबी कॉरपोरेट को ‘संकटग्रस्त संपत्ति’ के नाम पर नया खरीदार मिल जाता है। यही वह बिंदु है जहां गौतम अदानी की परछाईं इस घोटाले पर साफ दिखने लगती है। एसआरईआई ग्रुप का दीवालियापन कोई आर्थिक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है। पहले बैंकों से लोन लूटो, फिर संपत्तियों को अपनी ही कंपनियों में घुमाओ, और अंत में खुद को दिवालिया घोषित कर दो ताकि कोई दूसरा कॉरपोरेट घराना इन्हें औने-पौने में निगल सके। सवाल यह नहीं कि अदानी की नजर इस कंपनी पर क्यों है, सवाल यह है कि मोदी सरकार इस पूरी प्रक्रिया में मूकदर्शक क्यों बनी हुई है। यह मामला सीधे-सीधे उस कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ की ओर इशारा करता है, जिसने भारतीय लोकतंत्र की आर्थिक रीढ़ को खोखला कर दिया है। जब तक ऐसे घोटालों को ‘व्यापारिक जोखिम’ कहकर ढंका जाता रहेगा, तब तक जनता के हिस्से में सिर्फ महंगाई, बेरोजगारी और कर्ज ही आएगा।
पीएनबी ने ही क्यों खोली पोल
पंजाब नेशनल बैंक ने दिसंबर 2025 में आरबीआई को 2434 करोड़ रुपये के लोन घोटाले की रिपोर्ट दी। यह वही पीएनबी है, जिसने नीरव मोदी घोटाले के बाद सबसे ज्यादा आलोचना झेली थी। ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी 23 बैंक, जिनका पैसा एसआरईआई ग्रुप ने हड़पा, वे क्यों चुप हैं? क्या वित्त मंत्रालय का दबाव है या फिर ‘एडजस्टमेंट’ की कोई अंदरूनी डील?
32,700 करोड़ का पूरा खेल
एसआरईआई ग्रुप ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के 24 बैंकों से हजारों करोड़ का लोन लिया। यह लोन इंफ्रा और पावर प्रोजेक्ट्स के नाम पर लिया गया, लेकिन बड़ी रकम को समूह की अपनी कंपनियों और ट्रस्ट्स में ट्रांसफर कर दिया गया। बीडीओ इंडिया की ऑडिट रिपोर्ट ने इस फर्जीवाड़े की परतें खोलीं।
कनोरिया परिवार का नेटवर्क
एसआरईआई ग्रुप कनोरिया परिवार द्वारा प्रमोट किया गया। हेमंत कनोरिया, सुनील कनोरिया और परिवार के अन्य सदस्यों ने 2018 से 2021 के बीच झूठे दस्तावेजों के आधार पर 13,000 करोड़ रुपये का लोन उठाया और उसे सृष्टि ग्रुप, व्योम इंफ्रा, समसारा एनर्जी जैसी संबद्ध कंपनियों में घुमा दिया।
लोन का पैसा, सूद का खेल
घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बैंक से लिया गया पैसा बाजार से कम ब्याज दर पर उन्हीं कंपनियों को दिया गया, जो कनोरिया परिवार से जुड़ी थीं। यानी बैंकों का पैसा, परिवार का मुनाफा।
आरबीआई बोर्ड में बैठकर भी लूट
2021 में जब वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं, तो आरबीआई ने एसआरईआई ग्रुप के बोर्ड में अपने प्रतिनिधि बैठाए। लेकिन इसके बावजूद लूट का खेल चलता रहा। यह सवाल उठाता है कि नियामक की भूमिका कितनी प्रभावी थी?
मोदी सत्ता से रिश्ते
2013 से ही कनोरिया परिवार नरेंद्र मोदी के संपर्क में रहा है। एसोचैम के मंच से मुलाकातें, ‘इंडिया अंडर मोदी’ जैसे कार्यक्रमों में शिरकत और 2019 की जीत पर सार्वजनिक बधाई ये सभी संकेत राजनीतिक निकटता की ओर इशारा करते हैं।
अदानी की एंट्री की तैयारी दीवालियापन या डिनर प्लेट!
एसआरईआई ग्रुप का पावर और इन्फ्रा सेक्टर में निवेश अदानी ग्रुप के लिए किसी सोने की थाली से कम नहीं है। इंडिया पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड, क्विप्रो एनर्जी और अन्य सहायक कंपनियां अदानी पावर और अदानी इन्फ्रा की विस्तार नीति में पूरी तरह फिट बैठती हैं। सवाल यह नहीं कि अदानी क्यों रुचि ले रहे हैं, सवाल यह है कि क्या बैंकों का हजारों करोड़ का बकाया पहले ‘हेयरकट’ के नाम पर माफ किया जाएगा, ताकि कॉरपोरेट साम्राज्य को एक और निवाला मिल सके। भारत में पहले भी देखा गया है कि कैसे संकटग्रस्त कंपनियों को सस्ते में बेचकर कुछ चुनिंदा घरानों को फायदा पहुंचाया गया। एयरपोर्ट, सीमेंट, बंदरगाह की सूची लंबी है। अब वही मॉडल एसआरईआई ग्रुप पर लागू होता दिख रहा है।
बैंकिंग सिस्टम का सच
यह घोटाला भारतीय बैंकिंग सिस्टम की नंगी सच्चाई उजागर करता है। यहां घाटा हमेशा जनता का होता है और मुनाफा चंद कॉरपोरेट घरानों का। नियामक संस्थाएं या तो असहाय दिखती हैं या मौन साधे रहती हैं। सवाल यह है कि क्या 32,700 करोड़ का यह घोटाला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा, जैसे सैकड़ों अन्य मामले दबा दिए गए। यह मामला साबित करता है कि भारत का बैंकिंग सिस्टम अब भी कॉरपोरेट दबाव और राजनीतिक संरक्षण से मुक्त नहीं हो पाया है। घाटा जनता का, फायदा चंद घरानों का। यह मामला किसी एक कंपनी या एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह मोदी युग के उस आर्थिक मॉडल का आईना है, जिसमें कॉरपोरेट लूट को राष्ट्र निर्माण और जनता के शोषण को सुधार कहा जाता है। 32,700 करोड़ का यह घोटाला एक चेतावनी है। यदि आज सवाल नहीं उठे, तो कल बैंक नहीं बचेंगे, और न ही जनता की गाढ़ी कमाई।
* एसआरईआई ग्रुप पर 32,700 करोड़ रुपये का बैंक लोन घोटाला
* केवल पीएनबी ने 2434 करोड़ की रिपोर्ट आरबीआई को दी
* 24 बैंकों का पैसा डूबा, 23 बैंक चुप
* कनोरिया परिवार पर लोन डायवर्जन के गंभीर आरोप
* आरबीआई की निगरानी के बावजूद घोटाला जारी
* अदानी ग्रुप की संकटग्रस्त कंपनी में रुचि
मोदी सरकार से दस सवाल
1. जब एसआरईआई ग्रुप पर कुल 32,700 करोड़ रुपये का बैंक लोन बकाया है, तो सरकार ने देश को अब तक सिर्फ 2434 करोड़ की जानकारी क्यों दी?
2. जिन 24 बैंकों का पैसा इस समूह ने हड़पा, उनमें से 23 बैंकों ने आरबीआई को अब तक घोटाले की रिपोर्ट क्यों नहीं की?
3. क्या वित्त मंत्रालय या बैंक बोर्ड ब्यूरो ने इन बैंकों को चुप रहने का कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिया है?
4. जब 2021 से आरबीआई स्वयं एसआरईआई ग्रुप के बोर्ड में बैठा था, तब भी लोन डायवर्जन कैसे होता रहा?
5. क्या यह सच नहीं है कि बैंक लोन का पैसा कनोरिया परिवार की अपनी कंपनियों और ट्रस्टों में ट्रांसफर किया गया?
6. क्या सरकार बताएगी कि इस घोटाले में शामिल प्रमोटरों, निदेशकों और बैंक अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
7. क्या यह भी तथ्य नहीं है कि एसआरईआई ग्रुप से जुड़ी कंपनियों को दीवालिया घोषित करने के बावजूद लगातार कारोबार करने दिया गया?
8. क्या सरकार इस बात से इनकार कर सकती है कि संकटग्रस्त कंपनियों को औने-पौने में चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को सौंपने की नीति अपनाई जा रही है?
9. क्या अदानी ग्रुप की एसआरईआई की पावर और इन्फ्रा संपत्तियों में रुचि की जानकारी सरकार और बैंकों को नहीं है?
10. क्या मोदी सरकार जनता को यह भरोसा दिला सकती है कि 32,700 करोड़ का यह घोटाला भी विजय माल्या और नीरव मोदी की तरह फाइलों में दफन नहीं होगा?



