विचार/मुद्दा

मोदी जी के अंदर नैतिक साहस का अभाव,अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर गिरा दिया भारत का प्रभाव

मोदी सरकार की विदेश नीति सवालों के घेरे में, कूटनीति या सौदेबाजी

जेलेंस्की की चुभती टिप्पणी और मोदी की चुप्पी

ट्रंप की टैरिफ राजनीति भारत का अपमान,मोदी मौन

पुतिन-शहबाज मुलाकात बदलते समीकरणों से आंख मूंदे मोदी

अमेरिका का दबाव भारत की संप्रभुता पर हमला

यूरोपीय यूनियन की तैयारी भारत को घेरने की नई साजिश

मोदी का दोहरा रवैया जनता के लिए चुप्पी, व्यापारियों के लिए तत्परता

जापान का सबक नैतिक साहस दिखाने वाले नेताओं की मिसाल

लोकतंत्र बनाम व्यापार मोदी किसके साथ खड़े

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार खुद को ‘विश्वगुरु भारत’ का प्रवक्ता बताने से पीछे नहीं हटते। कभी यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के कंधे पर हाथ रखकर भावुक तस्वीरें खिंचवाना, तो कभी पुतिन के सामने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को सफाई देने भेजना, और कभी ट्रंप की झूठी तारीफ पर धन्यवाद ट्वीट करना क्या यही भारतीय कूटनीति का असली चेहरा है। सवाल उठना भी लाजमी है कि जब पूरी दुनिया भारत को दबाव में झुका हुआ देख रही है, तब मोदी आखिर किस नैतिक साहस का प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या वे सचमुच भारत की संप्रभुता की रक्षा कर रहे हैं, या केवल अमेरिका और अपने मित्र कारोबारी वर्ग को खुश करने का खेल खेल रहे हैं।

* जेलेंस्की के बयान ने खोली पोल
* मोदी-जेलेंस्की रिश्तों का पिछला इतिहास
* भावुक तस्वीरें और पुतिन के सामने सफाई
* जेलेंस्की का समर्थन ट्रंप टैरिफ को भारत के खिलाफ जहर
* ट्रंप की व्यापारिक कूटनीति और मोदी का मौन
* भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ रूस से तेल खरीदने की सजा
* पीटर नवारो और स्कॉट बेसेंट के अपमानजनक बयान
* मोदी की प्रतिक्रिया आभार व्यक्त, प्रतिरोध नहीं
* बदलते समीकरण पुतिन-शहबाज की भेंट
* मोदी से मिलने के बाद पुतिन की पाकिस्तान के साथ वार्ता
* भारत की अनदेखी और पाकिस्तान को जगह
* दक्षिण एशिया में भारत की गिरती हैसियत
* अमेरिका और यूरोप का साझा दबाव
* लुटनिक का बयान भारत क्षमा मांगेगा
* ट्रंप के अपमान पर मौन, उनकी तारीफ पर आभार
* देशहित की जगह मित्र कारोबारियों का हित
* शिगेरु इशिबा का इस्तीफा हार की नैतिक जिम्मेदारी
* महंगाई और टैरिफ पर जनता का आक्रोश
* मोदी क्यों नहीं दिखा पाते ऐसा नैतिक साहस
* रूस से तेल खरीद बंद करने का अमेरिकी दबाव
* संप्रभु राष्ट्र होने के बावजूद मजबूरी में चुप्पी
* क्या मोदी विदेशी दबाव को ही ‘कूटनीति’ मानते हैं
* मोदी का मौन भारत की कमजोरी
* लोकतंत्र का असली अर्थ: लोक का हित, न कि पूंजीपतियों का
* क्या मोदी कभी जापान जैसे नैतिक साहस का परिचय देंगे?

मोदी का नैतिक साहस सवालों के घेरे में

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब 2022 में यूक्रेन गए थे, तो उन्होंने वहां की त्रासदी का दर्द बांटने का दिखावा किया। राष्ट्रीय संग्रहालय में युद्ध में मारे गए बच्चों की तस्वीरों पर नजरें झुकाए और राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के कंधे पर हाथ रखकर भावुक मुद्रा में तस्वीर खिंचवाई। यह तस्वीर उस समय खूब प्रचारित की गई, मानो मोदी भारत की मानवीय संवेदनाओं के प्रतीक हों। लेकिन असलियत यह रही कि उस दौरे ने भारत-रूस संबंधों में खटास डाल दी। रूस दशकों से भारत का भरोसेमंद मित्र रहा है, जिसने युद्ध और कठिन समय में हमेशा भारत का साथ दिया। अब वही जेलेंस्की अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति का समर्थन कर रहे हैं और खुलेआम कह रहे हैं कि भारत पर टैरिफ लगाना बिल्कुल सही था। यानी जिसे मोदी ने गले लगाया, उसी ने भारत की पीठ में छुरा भोंका। सवाल यह है कि इस अपमानजनक बयान पर मोदी क्यों खामोश हैं? क्या यह वही कूटनीति है, जिसमें दुश्मन देशों को खुश करने की कोशिश में खुद का ही अपमान हो जाए? भारत की जनता चाहती है कि प्रधानमंत्री सख्त जवाब दें, लेकिन मोदी की खामोशी उनकी प्राथमिकताओं को उजागर कर रही है। वे हर उस मुद्दे पर मौन हो जाते हैं, जिसमें अमेरिका या पश्चिमी ताकतें शामिल हों।

भारत का अपमान, मोदी का मौन

ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाकर साफ संदेश दिया कि अगर भारत रूस से तेल खरीदेगा तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसमें से 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ तो केवल इस आधार पर लगाया गया कि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। यह किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए सीधी चेतावनी है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इसका विरोध करने के बजाय ट्रंप को महान नेता कहा और आभार व्यक्त किया। ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट बार-बार भारत को नीचा दिखाने वाले बयान दे रहे हैं। नवारो ने यहां तक कह दिया कि यूक्रेन में रूस नहीं, भारत लड़ रहा है। यह बयान भारत की वैश्विक छवि पर सीधा हमला था। लेकिन मोदी की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। क्या भारत इतना कमजोर है कि अमेरिकी अपमान को भी चुपचाप सह ले? या फिर मोदी केवल अपने मित्र उद्योगपतियों के हितों के लिए अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहते।

बदलते समीकरणों से आंख मूंदे मोदी

अभी हाल ही में चीन में पुतिन और मोदी की मुलाकात हुई। लेकिन इसके तुरंत बाद रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से भी वार्ता की। यह घटना भारत के लिए किसी झटके से कम नहीं है। दशकों से रूस पाकिस्तान से दूरी बनाए रखता था, लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। मोदी सरकार इसे नजरअंदाज कर रही है, लेकिन असलियत यह है कि पुतिन का पाकिस्तान के साथ बढ़ता रिश्ता भारत की कूटनीति की असफलता है। भारत ने न तो रूस को पूरी तरह साधा और न ही अमेरिका के दबाव का प्रतिरोध किया। परिणाम यह है कि भारत का पारंपरिक मित्र भी अब दूसरे रास्ते खोज रहा है।

तेल कारोबार व भारत की संप्रभुता पर हमला

भारत जैसे देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है। रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत की आर्थिक जरूरत है। लेकिन अमेरिका खुलेआम धमकी दे रहा है कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदे। ट्रंप सरकार के कई मंत्री और सलाहकार भारत को मजबूर कर रहे हैं कि वह अमेरिकी शर्तों पर झुके। वॉशिंगटन के दबाव का आलम यह है कि यूरोपीय यूनियन भी भारत के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है। यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा साफ कह चुके हैं कि रूस के खिलाफ और कठोर प्रतिबंध लगाने की जरूरत है, और इसमें भारत को भी घेरा जाएगा। यह भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है। लेकिन मोदी इस पर भी चुप हैं। क्या यही है मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’

भारत को घेरने की नई साजिश

यूरोपीय यूनियन का प्रतिनिधिमंडल जल्द ही वॉशिंगटन पहुंचने वाला है ताकि रूस के खिलाफ और सख्त कदम उठाए जा सकें। इस एजेंडे में भारत भी शामिल है। यानी अमेरिका के साथ-साथ यूरोप भी भारत पर दबाव डालने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री होवार्ड लुटनिक ने हाल ही में बयान दिया कि भारत एक-दो महीने में क्षमा मांगेगा और समझौते की मेज पर लौटेगा। यह भारत की गरिमा पर सीधा हमला है। लेकिन मोदी सरकार के किसी मंत्री ने इसका विरोध नहीं किया। लोकतंत्र में चुना हुआ प्रधानमंत्री यदि देश की गरिमा की रक्षा नहीं कर सकता, तो फिर जनता का प्रतिनिधित्व क्यों।

जनता के लिए चुप्पी, व्यापारियों के लिए तत्परता

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब मुद्दा जनता का होता है—महंगाई, बेरोजगारी, टैरिफ, या किसानों की पीड़ा तो प्रधानमंत्री खामोश रहते हैं। लेकिन जब मामला अपने मित्र उद्योगपतियों का होता है, तब फौरन ट्वीट और बयान झरने लगते हैं। ट्रंप ने मोदी को महान नेता कहा, तो तुरंत मोदी ने आभार व्यक्त किया। लेकिन जब ट्रंप ने भारत के खिलाफ बेहूदे बयान दिए, तब मोदी चुप्पी साध गए। यह चयनित प्रतिक्रिया मोदी की प्राथमिकताओं को उजागर करती है। जनता नहीं, बल्कि पूंजीपति मित्र पहले। लोकतंत्र में यह रवैया खतरनाक है।

नैतिक साहस दिखाने वाले नेताओं की मिसाल

जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने हाल ही में केवल इस कारण इस्तीफा दे दिया कि उनकी पार्टी चुनाव हार गई। उन्होंने कहा कि जनता ने हमें नकार दिया है, इसलिए अब हमें सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं। यह नैतिक साहस का उदाहरण है। भारत में क्या मोदी कभी ऐसा कर पाएंगे। लगातार चुनावी जीत का ढोल पीटने वाले मोदी कभी यह स्वीकार करेंगे कि जनता महंगाई, बेरोजगारी और विदेशी दबाव से परेशान है, शायद नहीं। क्योंकि मोदी की राजनीति का आधार नैतिकता नहीं, बल्कि प्रचार और पूंजी का गठजोड़ है।

लोकतंत्र बनाम व्यापार

लोकतंत्र का मतलब है जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता की सरकार। लेकिन मोदी के दौर में यह परिभाषा बदलकर व्यापारियों के लिए, व्यापारियों द्वारा, व्यापारियों की सरकार बन गई है। जेलेंस्की का भारत विरोधी बयान हो या ट्रंप की टैरिफ राजनीति, मोदी का मौन यह साबित करता है कि वे राष्ट्रहित से ज्यादा अपने निजी राजनीतिक और कारोबारी हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसा नेता वास्तव में लोकतंत्र का प्रहरी कहलाने लायक है। जापान ने दुनिया को दिखा दिया कि नैतिक साहस क्या होता है। अब भारत की जनता पूछ रही है क्या मोदी कभी वैसा साहस दिखा पाएंगे।

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