देश-विदेश

मोदी जी ट्रम्प से भाग रहे लगातार, आप ने तो कर देश का बंटाधार

 

● ट्रंप की तारीफ या भारत का अपमान

● जब विश्व मंच पर झुकी कूटनीति ने राष्ट्र की गरिमा गिरवी रख दी

● ट्रंप ने कहा टैरिफ की धमकी देकर भारत-पाक का युद्ध रोका, मोदी-शहबाज दोनों झुके

● मोदी को ‘महान’ और ‘सुंदर व्यक्तित्व’ बताने वाले ट्रंप ने शाहबाज शरीफ वो पाक जनरल मुनीर की प्रशंसा की

● भारत की संसद में जवाब देने का मौका मिला, पर प्रधानमंत्री ने चुप्पी साधी

● मोदी सरकार अमेरिका के अपमान को भी प्रशंसा की तरह ले रही!

● पाकिस्तान-बांग्लादेश की नजदीकी बढ़ी, असम-त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल तक फैला ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का नक्शा

● सीमाई साजिशें तेज, सत्ता की राजनीति ‘घुसपैठ’ के पुराने राग पर

● ट्रंप ने चीन से हाथ मिलाया, भारत अब भी वंदना में व्यस्त

● रेअर अर्थ मिनरल्स चीन ने अमेरिका को झुकाया भारत ने अपनी संपदा अडानी-अंबानी को सौंपी

 

यह सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप का बयान नहीं था, बल्कि भारत की विदेश नीति का आइना था। जिसमें आत्ममुग्धता ने आत्मसम्मान को निगल लिया। एशिया पैसिफिक सम्मेलन में ट्रंप ने खुले मंच से कहा कि उन्होंने टैरिफ की धमकी देकर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोका था। यह बयान किसी तीसरे दर्जे के कूटनीतिज्ञ का नहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति का था। यह वही ट्रंप हैं जिन्हें नरेंद्र मोदी दोस्त डोनाल्ड कहकर अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप के आयोजन में फूल बरसाते रहे। आज वही दोस्त भारत को यह बता रहा है कि भारत उसकी चेतावनी से डरकर युद्ध रोकने पर मजबूर हुआ। यह कोई बयान नहीं भारत की कूटनीतिक पराजय का प्रमाणपत्र है।

महान मोदी या मौन मोदी!

ट्रंप ने कहा कि मैंने नरेंद्र मोदी को कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान युद्ध नहीं रोकते, तो हम व्यापार बंद कर देंगे। मोदी महान नेता हैं, सुंदर व्यक्तित्व हैं, फाइटर हैं उन्होंने मेरी बात मानी और युद्ध रोक दिया। सवाल यह नहीं कि ट्रंप ने क्या कहा, सवाल यह है कि मोदी सरकार ने क्या जवाब दिया? कई माह बीतने के बाद भी कोई खंडन नहीं। संसद में जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से कहा कि कम से कम सदन के भीतर कह दीजिए कि ट्रंप झूठ बोल रहे हैं, तब भी प्रधानमंत्री ने चुप्पी ओढ़ ली। यह वही मोदी हैं जो हर मंच पर 56 इंच का सीना बताते थे। क्या भारत की विदेश नीति अब इतनी निर्बल हो गई है कि वह अमेरिकी अपमान को भी कूटनीतिक प्रशंसा में बदल ले।

ट्रंप की जुबान, मोदी की खामोशी

भारत और पाकिस्तान दो परमाणु संपन्न देश हैं। ट्रंप का यह कहना कि टैरिफ की धमकी से युद्ध रुका, पूरी दुनिया में यह संदेश देता है कि भारत अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से नहीं लेता, बल्कि अमेरिकी दबाव से झुक जाता है। जो देश खुद को विश्वगुरु कहता है, वह इतना निर्भर हो गया है कि अमेरिकी व्यापार नीति उसकी रक्षा नीति तय करे। अगर यह झूठ है, तो फिर प्रधानमंत्री की खामोशी उससे भी बड़ा झूठ है।

जब दोस्त ने ही मर्यादा तोड़ी

नमस्ते ट्रंप का आयोजन याद कीजिए। गुजरात में सड़कें साफ करवाई गईं, करोड़ों खर्च हुए, जनता की भीड़ जुटाई गई। मोदी ने ट्रंप को ‘महान मित्र’ बताया,
भारत-अमेरिका संबंधों को 21वीं सदी की साझेदारी कहा। आज वही ट्रंप मंच से भारत को शर्मिंदा कर रहे हैं। ट्रंप ने न केवल मोदी बल्कि पाकिस्तान के शाहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की भी तारीफ की।
कहा कि मुनीर एक जबरदस्त फाइटर हैं। वह मुनीर जो हर सप्ताह भारत को धमकी देता है, जो बांग्लादेश और चीन के साथ मिलकर साजिशें रच रहा है, वह ट्रंप की नजर में जबरदस्त फाइटर है और भारत उसकी तारीफ सुनकर भी मुस्कुरा रहा है!

भारत की खामोशी का मतलब क्या

किसी राष्ट्र का आत्मसम्मान केवल उसकी सेना नहीं,
बल्कि उसके नेतृत्व की आवाज में होता है। मोदी सरकार की यह चुप्पी बताती है कि विदेश नीति अब केवल प्रचार और फोटोशूट तक सीमित है। अगर प्रधानमंत्री सच में ‘विश्वगुरु’ भारत के नेता हैं,
तो उन्हें खुलकर कहना चाहिए कि भारत अपने निर्णय खुद लेता है, किसी देश की धमकी से नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि सत्ता के लिए ‘अपमान पर मौन रहना’ भी एक रणनीति है ताकि अमेरिका नाराज न हो।

बांग्लादेश-पाकिस्तान गठजोड़ सीमाओं से बड़ा खतरा

ट्रंप का बयान तो एक शर्म है ही पर असली खतरा सीमाओं पर मंडरा रहा है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की विदाई के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश की नजदीकियां तेजी से बढ़ रही हैं। हाल ही में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से पाकिस्तानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के डिप्टी शमशाद मिर्जा की मुलाकात हुई। यूनुस ने उन्हें जो किताब भेंट की, उसमें ग्रेटर बांग्लादेश का मानचित्र था। जिसमें असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के हिस्से बांग्लादेश का हिस्सा बताए गए हैं। यह कोई भूल नहीं यह रणनीतिक चेतावनी है। भारत के खिलाफ दो मुस्लिम राष्ट्र एकजुट हो रहे हैं, और भारत का नेतृत्व सिर्फ चुनावी रैलियों में घुसपैठियों का नाम ले रहा है।

घुसपैठ पर भाषण, सीमाओं पर मौन

अभी चुनाव आयोग ने देशव्यापी एसआईआर कराने की बात कही है, जिसमें नागरिकता की जांच होगी। भाजपा नेताओं ने तुरंत कहा कि सबसे पहले बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करें। जनता में यह भ्रम फैलाया गया कि देश में दीमक की तरह घुसपैठिए बस गए हैं। लेकिन असल खतरा यह है कि बांग्लादेश हमारे असम और बंगाल के हिस्से को अपना बता रहा है, तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री चुप हैं। यह मुद्दा चुनावी नहीं है, इसलिए खामोशी जरूरी है।

ट्रंप की चीन नीति में यू-टर्न, भारत की दिशा भ्रम की स्थिति में

27 अक्टूबर को डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका और चीन के बीच नया व्यापार समझौता होगा। यह वही ट्रंप हैं जिन्होंने 2020 में चीन पर टैरिफ युद्ध छेड़ा था।
अब वही कह रहे हैं हम साथ काम करेंगे। कारण रेअर अर्थ मिनरल्स। दुनिया के 90 फीसदी दुर्लभ खनिज चीन के पास हैं। इन्हीं से इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल, सैटेलाइट और रक्षा उपकरण बनते हैं। चीन ने इन संसाधनों पर नियंत्रण कर अमेरिका को झुकने पर मजबूर किया। भारत के पास भी ये खनिज हैं, पर सरकार ने उन्हें निजी हाथों में सौंप दिया वो भी अपने मित्र उद्योगपतियों को। जिस चीन ने राष्ट्रीय नीति से काम किया, वहीं भारत ने निजी पूंजी के हवाले कर दिया। प्रचार यह कि भारत आत्मनिर्भर हो गया। भारत के पास रणनीतिक अवसर था कि चीन के समानांतर एक खनिज शक्ति बनने का, पर सरकार ने उस अवसर को भी कॉर्पोरेट प्रॉफिट में बदल दिया। अब न खनिज पर नियंत्रण है, न उसकी रिफाइनिंग की क्षमता। चीन ने जो हथियार बनाया, भारत ने वही संपदा बेच दी। जब ट्रंप चीन से झुके, भारत के पास कुछ कहने के लिए नहीं बचा। क्योंकि हमारी कूटनीति अब सेल्फी डिप्लोमेसी बन चुकी है।

मोदी सरकार की विदेश नीति प्रचार की लाश पर प्रतिष्ठा का शव

मोदी शासन में विदेश नीति को इवेंट मैनेजमेंट में बदल दिया गया है। नमस्ते ट्रंप, हाउडी मोदी, जी 20 समिट, वंदे भारत…हर आयोजन में चमक थी, पर सामर्थ्य नहीं।
कूटनीति अब नारा बन गई है। विश्वगुरु भारत पर जब दुनिया ने सवाल पूछा कि क्या ट्रंप सच कह रहे हैं तो विश्वगुरु मौन हो गया। भारत की प्रतिष्ठा गिर रही है, पर सत्ता को परवाह नहीं यह पहला मौका नहीं जब किसी विदेशी नेता ने भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाया हो।
पहले भी ट्रंप ने कहा था कि मोदी ने मुझसे कश्मीर पर मध्यस्थता मांगी। तब भी मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया था। आज फिर वही अपमान दोहराया जा रहा है। यह मौन केवल चुप्पी नहीं, यह स्वाभिमान की मृत्यु है।

असली संकट दिशा खो चुकी विदेश नीति

मोदी सरकार की विदेश नीति तीन शब्दों फोटो, प्रचार और मौन में सिमट गई है। हर यात्रा कैमरे के लिए होती है, हर संबोधन पार्टी के लिए। जब सवाल देश की प्रतिष्ठा का आता है, तो वही आवाज गुम हो जाती है। ट्रंप के बयान पर अगर भारत ने सख्ती दिखाई होती, तो यह संदेश जाता कि भारत झुकता नहीं। मौन ने बता दिया कि अब सत्ता को प्रतिष्ठा से ज्यादा प्रचार प्यारा है।

कूटनीति की जगह कंगन नीति

भारत की विदेश नीति अब प्रसन्नता की कूटनीति है जो किसी को नाराज नहीं करना चाहती। अमेरिका को खुश रखो, चीन से व्यापार जारी रखो, रूस से तेल खरीदो और जनता से कहो भारत विश्वगुरु है। यह कूटनीति नहीं, एक बहाना है सत्ता की सुरक्षा का।

* ट्रंप का बयान भारत की विदेश नीति के लिए सीधा अपमान है।
* प्रधानमंत्री की चुप्पी अपमान से भी बड़ी शर्म है।
* पाकिस्तान-बांग्लादेश की नजदीकियां सीमा पर खतरे का संकेत।
* घुसपैठ का चुनावी मुद्दा असली सीमा पर साजिशों से ध्यान भटका रहा है।
* ट्रंप चीन से झुके और भारत अपने संसाधन बेचकर भी आत्मनिर्भरता का दावा कर रहा है।
* चीन ने रेअर अर्थ मिनरल्स से ताकत बनाई, भारत ने उन्हें पूंजी के हवाले किया।
* विदेश नीति का आधार अब राष्ट्रहित नहीं, प्रचारहित बन गया।
* जब राष्ट्र अपमान को मौन से ढके, तो सत्ता की चमक भी लज्जा में बदल जाती है।

सत्ता का लक्ष्य जब राष्ट्र से बड़ा हो जाए, तो शर्म भी नीति बन जाती है

भारत की प्रतिष्ठा किसी मंच पर न गिरती, अगर नेतृत्व में साहस होता। परन्तु जब सत्ता का लक्ष्य राष्ट्र से बड़ा हो जाए, तो शर्म भी नीति बन जाती है। ट्रंप ने भारत का अपमान किया पर असली अपमान उस मौन ने किया, जो 140 करोड़ लोगों के स्वाभिमान पर कूटनीतिक शालीनता के नाम पर बैठा रहा। यह वक्त है जब जनता को पूछना चाहिए मोदी जी, क्या मित्र ट्रंप की झूठी तारीफ हमारे राष्ट्रीय सम्मान से बड़ी है!

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