
● योगी आदित्यनाथ ने वनटांगिया समाज का किया सम्मान, लोकतंत्र में दिलवाया उचित स्थान
● जिस लोकतंत्र में वोट का हक नहीं, वहां विकास का जश्न किसका
● 100 साल तक गुलाम रखे गए वनटांगिया और सत्ता की सामूहिक चुप्पी
● आजादी आई, लेकिन वनटांगिया गुलाम ही रहे
● 1947 के बाद देश आजाद हुआ, लेकिन वनटांगिया नहीं इनके गांव राजस्व गांव बने, इन्हें नागरिक नहीं माना गया
● बिना जमीन, बिना पहचान पत्र, बिना वोट ये लोग लोकतंत्र के नक्शे से गायब
● जिस समुदाय के पास वोट ही नहीं, उसकी सुध कौन ले?
● 1998 में सांसद बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने इस समुदाय को पहचाना
● 2009 से कुसम्ही जंगल की ‘जंगल तिकोनिया नंबर तीन’ बस्ती में दिवाली मनाने की शुरुआत
● वन विभाग ने इसे ‘अवैध निर्माण’ बताकर योगी पर एफआईआर कराई
● 2017 में सीएम बनने के बाद योगी ने वह किया, जो दशकों में नहीं हुआ
● क्या वनटांगिया इसलिए उपेक्षित रहे क्योंकि वे सत्ता के लिए ‘लाभकारी’ नहीं थे
◆ सौरभ सोमवंशी
आज जब सत्ता के गलियारों में ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे गूंजते हैं, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई इस लोकतंत्र में सब बराबर थे? क्या आजादी के बाद हर नागरिक को समान अधिकार मिले? अगर ऐसा होता, तो उत्तर प्रदेश के जंगलों में बसे वनटांगिया समुदाय को अपने ही देश में लगभग 100 साल तक वोट के अधिकार से वंचित क्यों रहना पड़ा?
वनटांगिया एक ऐसा नाम, जिसे न तो आजादी के बाद की सरकारों ने याद रखा, न ही लोकतंत्र के ठेकेदारों ने। ये वही लोग हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने जंगल उगाने के लिए बसाया, लेकिन आजादी के बाद भारत की सरकारों ने जंगल में ही भुला दिया। न जमीन का हक, न मकान का अधिकार, न स्कूल, न अस्पताल, न बिजली, न पानी और सबसे बड़ा अपराध, मताधिकार तक नहीं। ये लोग आजाद भारत में भी गुलाम नागरिक थे। इनके गांव सरकारी कागजों में गांव नहीं थे, बल्कि ‘वन भूमि पर अवैध बस्तियां’ माने जाते थे। इनके बच्चे पैदा होते थे बिना पहचान के, जवान होते थे बिना अधिकार के और बूढ़े हो जाते थे बिना किसी पेंशन या सुरक्षा के। ऐसे समय में, जब सत्ता के लिए जाति और धर्म के गणित गढ़े जा रहे थे, वनटांगिया समुदाय किसी भी राजनीतिक समीकरण में फिट नहीं बैठता था, क्योंकि इनके पास वोट ही नहीं था। वोट नहीं, तो प्रतिनिधि नहीं। प्रतिनिधि नहीं, तो सवाल नहीं। सवाल नहीं, तो विकास नहीं।
लेकिन इसी अंधेरे में एक नाम उभरता है योगी आदित्यनाथ। 1998 में जब वे गोरखपुर से सांसद बने, तब उन्होंने उस समुदाय की चिंता शुरू की, जिसे सत्ता दशकों से अनदेखा करती रही थी। विडंबना यह है कि वे ऐसे समुदाय के लिए लड़ रहे थे, जिसके पास उन्हें वोट देने का अधिकार भी नहीं था। जिसने एक पूरे समुदाय को सदी भर तक अंधेरे में रखा। साथ ही यह उस हस्तक्षेप की कहानी भी है, जिसने वनटांगिया समाज को पहली बार लोकतंत्र की मुख्यधारा से जोड़ा।
आजाद भारत के गुमनाम नागरिक
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। संविधान समानता, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देता है। लेकिन इसी लोकतंत्र के भीतर उत्तर प्रदेश के जंगलों में एक ऐसा समुदाय भी रहा, जिसे आज़ादी के बाद भी नागरिक मानने से इनकार किया गया। यह समुदाय है वनटांगिया। ये न तो अपराधी थे, न घुसपैठिए, न ही किसी दूसरे देश से आए लोग। वे इसी मिट्टी के बेटे-बेटियां थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के लिए जंगल उगाए, साखू के पेड़ लगाए, रेलवे के स्लीपर तैयार करवाए और बदले में जंगलों में बसने की अनुमति पाई। लेकिन यह अनुमति कभी अधिकार में नहीं बदली। 1947 में अंग्रेज गए, सत्ता बदली, झंडा बदला, संविधान बना, लेकिन वनटांगिया वहीं के वहीं रह गए। बिना जमीन के मालिकाना हक, बिना पहचान पत्र, बिना स्कूल, बिना अस्पताल और सबसे अहम बिना वोट के अधिकार। लोकतंत्र में वोट सबसे बड़ी ताकत होता है। लेकिन जब किसी समुदाय के पास वोट ही न हो, तो वह सत्ता के लिए अदृश्य हो जाता है। वनटांगिया इसी अदृश्यता के शिकार बने।
वनटांगिया जंगल बसाने वाले गुलाम
‘वन’ यानी जंगल, ‘टांगिया’ शब्द वर्मा की टांगिया कृषि प्रणाली से आया है। अंग्रेजों ने जब बड़े पैमाने पर रेलवे लाइनें बिछाईं, तो साखू (साल) के पेड़ों की भारी कटाई हुई। इसकी भरपाई के लिए जंगलों में नए साखू वन विकसित किए गए। इसके लिए गरीब, भूमिहीन मजदूरों को जंगलों में बसाया गया। उन्हें पेड़ों की देखरेख करनी थी और सीमित क्षेत्र में खेती करने की अनुमति दी गई। यह जमीन वन विभाग की थी, मजदूरों की नहीं। समय के साथ ये मजदूर वहीं बस गए। दूसरी पीढ़ी ने जंगल के बाहर की दुनिया देखी ही नहीं। मूल गांवों से संपर्क टूट गया। जंगल ही उनका घर बन गया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, महाराजगंज, गोंडा, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, लखीमपुर खीरी, मिर्जापुर, सोनभद्र, चंदौली, सहारनपुर, बिजनौर, ललितपुर और चित्रकूट जैसे जिलों में आज भी वनटांगिया बस्तियां मौजूद हैं।
आजादी के बाद भी बेदखली का डर
1947 के बाद वनटांगिया समुदाय को यह उम्मीद थी कि अब उन्हें नागरिक माना जाएगा। लेकिन हुआ इसके उलट। इनकी बस्तियों को कभी राजस्व गांव का दर्जा नहीं दिया गया। सरकारी रिकॉर्ड में ये बस्तियां ‘वन भूमि पर अवैध कब्जा’ मानी जाती रहीं। न तो स्थायी मकान बनाने की अनुमति, न स्कूल, न सड़क। घास-फूस की झोपड़ियां ही जीवन का आधार रहीं। वन विभाग की ओर से समय-समय पर बेदखली की कार्रवाई का भय अलग। पत्ते तोड़कर बेचने और दिहाड़ी मजदूरी ही जीवन का साधन था।
वोट नहीं, तो प्रतिनिधित्व नहीं
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व वोट से आता है। लेकिन वनटांगिया समुदाय को मतदान का अधिकार ही नहीं था। न आधार कार्ड, न वोटर आईडी। सरकारी योजनाएं कागजों में थीं, लेकिन इनके लिए नहीं। यही कारण रहा कि आजादी के बाद कई दशकों तक कोई जनप्रतिनिधि इनके बीच नहीं आया। राजनीतिक दलों के लिए यह समुदाय अस्तित्वहीन था।
सांसद योगी और एक अनदेखी शुरुआत
1998 में गोरखपुर से सांसद बने योगी आदित्यनाथ ने पहली बार इस समुदाय की स्थिति पर ध्यान दिया। गोरखपुर से सटे कुसम्ही जंगल की वनटांगिया बस्ती ‘जंगल तिकोनिया नंबर तीन’ में उनका जाना एक सामान्य राजनीतिक दौरा नहीं था। 2009 से उन्होंने दीपावली का पर्व इसी बस्ती में मनाना शुरू किया। यह सिर्फ त्योहार नहीं था, बल्कि संदेश था कि यह समुदाय भी समाज का हिस्सा है। बच्चों को स्कूल बैग, स्टेशनरी, मिठाई दी जाती। उनसे बातचीत होती। सांसद के तौर पर योगी लोकसभा में इनकी आवाज बने।
शिक्षा के लिए स्कूल और एफआईआर
वनटांगिया बस्तियों में सबसे बड़ी समस्या शिक्षा की थी। 2019 में बच्चों के लिए अस्थायी विद्यालय की व्यवस्था की गई। लोहे के एंगल और टीन शेड से एक छोटा स्कूल खड़ा हुआ। लेकिन वन विभाग ने इसे अवैध निर्माण बताते हुए योगी आदित्यनाथ समेत अन्य लोगों पर एफआईआर दर्ज कर दी। यह घटना बताती है कि व्यवस्था किस हद तक असंवेदनशील थी। बच्चों को पढ़ाने की कोशिश भी अपराध बन गई। बाद में विभाग को पीछे हटना पड़ा और स्कूल चल पाया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद निर्णायक हस्तक्षेप
2017 में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। यही वह मोड़ था, जहां वनटांगिया समाज का इतिहास बदला। अपने पहले कार्यकाल में ही गोरखपुर, गोंडा, बलरामपुर, महाराजगंज समेत 38 वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम घोषित किया गया। यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं था, बल्कि संवैधानिक न्याय की दिशा में कदम था। राजस्व गांव का दर्जा मिलते ही इन बस्तियों को मतदान का अधिकार मिला।
विकास की मुख्यधारा में प्रवेश
राजस्व ग्राम घोषित होने के बाद सरकारी योजनाओं के दरवाजे खुले। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के घर बने। बिजली पहुंची, पक्की सड़कें बनीं, स्ट्रीट लाइट लगी, स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र खुले, आरओ वाटर प्लांट लगे। आधार कार्ड, राशन कार्ड, उज्ज्वला गैस, पेंशन वह सब मिला जो नागरिक होने का प्रमाण होता है।
185 करोड़ की सौगात
31 अक्टूबर 2024 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वनटांगिया समाज के लिए 185 करोड़ रुपये की योजनाओं की घोषणा की। गोरखपुर जनपद की 75 ग्राम पंचायतों के कायाकल्प की योजना बनी। यह राशि केवल विकास नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा की भरपाई का प्रतीक थी।
आत्मनिर्भरता की ओर कदम
सरकारी सहयोग से कई वनटांगिया परिवार अब खेती और उद्यम की ओर बढ़े हैं। महाराजगंज के बरगदवा राजा गांव के रामगुलाब द्वारा सुनहरी शकरकंद की खेती इसका उदाहरण है। उनकी सफलता का उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी किया।
सौ साल की कसक और सवाल
आज वनटांगिया बस्तियों में बदलाव दिखता है। लेकिन यह सवाल बना रहता है कि अगर यह सब 2017 के बाद हो सकता है, तो 70 साल पहले क्यों नहीं? क्या लोकतंत्र केवल वोट वालों का होता है? क्या बिना वोट वाला समुदाय नागरिक नहीं होता? वनटांगिया समाज की कहानी केवल एक समुदाय की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा है।
विकास से पहले अधिकार
वनटांगिया समुदाय का संघर्ष बताता है कि विकास योजनाओं से पहले अधिकार जरूरी हैं। मताधिकार मिला, तो पहचान मिली। पहचान मिली, तो विकास पहुंचा। यह कहानी याद दिलाती है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध किसी को अदृश्य बना देना है।
* वनटांगिया समुदाय 100 वर्षों तक लोकतंत्र से बाहर रहा
* आजादी के बाद भी मताधिकार नहीं मिला
* राजनीतिक उपेक्षा की जड़ में वोट की अनुपस्थिति
* योगी आदित्यनाथ ने सांसद रहते आवाज उठाई
* सीएम बनने के बाद कानूनी और प्रशासनिक समाधान
* राजस्व ग्राम का दर्जा सबसे बड़ा बदलाव
* विकास योजनाओं से जीवन स्तर में परिवर्तन




