योगी के आगे शाह बने आटे का हलवा, यूपी की सियासत में आज भी कायम है बाबा का जलवा
शीत युद्ध का अंत दिल्ली की हार या लखनऊ की जीत!

● जिसने उपराष्ट्रपति 15 मिनट में बदला, वह 8 साल में योगी को नहीं हिला पाया
● दिल्ली की खुराफातें बनाम लखनऊ का धैर्य
● अरविंद शर्मा की रहस्यमई एंट्री और मौन विदाई
● उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री जनता चुनती है, दिल्ली नहीं
● इलाज तो ठीक हो रहा, लेकिन अगर डिप्टी सीएम फोन कर दें तो मरीज का नुकसान तय
● भय और विश्वास का नया समीकरण
● मीडिया माफिया की मिलीभगत ‘सरेंडर’ की स्क्रिप्ट किसने लिखी
● भाजपा के चाणक्य शाह की चालें और नागपुर का संकेत
● योगी में अटल जैसा आत्मविश्वास है, शाह में सत्ता का डर
● 2027 की जंग प्रधानमंत्री पद की पिच पर योगी का कद
◆ सौरभ सोमवंशी
जिस आदमी की कलम से उपराष्ट्रपति का नाम आधे घंटे में मिटकर बदल जाता है, वह योगी आदित्यनाथ को आठ साल में नहीं हिला पाया। यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर बदलती शक्ति-संरचना का सजीव सबूत है।
दिल्ली की साजिशें लखनऊ की दीवारों से टकराकर दम तोड़ चुकी हैं। जिसे लंपट पत्रकार सरेंडर कह रहे हैं, असल में वह दिल्ली के चाणक्य की हार है, और उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्वायत्त योगी युग की औपचारिक शुरुआत है।
दिल्ली की खुराफातें बनाम लखनऊ का धैर्य
यह कहानी 2017 में शुरू होती है, जब नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर में उत्तर प्रदेश के सिंहासन पर गोरखपुर के संन्यासी को बैठाया गया। संघ के भीतर संशय था। क्या एक मठाधीश प्रशासन संभाल पाएगा? दिल्ली की राजनीति में यह मान लिया गया कि योगी एक प्रयोग हैं, जो चलेंगे तो ठीक, नहीं तो बदल दिए जाएंगे। लेकिन योगी न तो दिल्ली की भाषा बोलते थे, न दिल्ली की शैली में झुकते थे। वह सत्ता के गलियारों में भजनलाल नहीं, बल्कि मठ के अनुशासन और प्रशासन दोनों के प्रतिनिधि बनकर उतरे। दिल्ली की खुराफातें शुरू हुईं सत्ता में संत को नाथने के लिए सियासी मंत्र रचे गए।
कभी विधायकों को भड़काया गया, कभी ब्राह्मण असंतोष की स्क्रिप्ट लिखी गई। परन्तु लखनऊ का धैर्य, गोरखनाथ परंपरा की सादगी और योगी की ठोस प्रशासकीय पकड़ ने हर चाल को नाकाम कर दिया।
यह वही मुख्यमंत्री था जिसने बिना एक शब्द बोले सबको मात दी। क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली में बोलना अहंकार कहलाता है, लेकिन काम करना प्रतिरोध बन जाता है।
अरविंद शर्मा की रहस्यमई एंट्री और मौन विदाई
साल 2021 दिल्ली के गलियारों में हलचल, नरेंद्र मोदी के पूर्व सचिव अरविंद शर्मा लखनऊ की धरती पर उतरे।
टीवी चैनलों पर उद्घोष हुआ अब आएगा ब्रह्मास्त्र, योगी के युग का होगा अंत! लेकिन योगी ने समय नहीं दिया।
लखनऊ के दरवाजे पर खड़े उस ब्रह्मास्त्र को मिलने की अनुमति तक नहीं मिली। भाजपा के भीतर यह पहला मौका था जब दिल्ली का भेजा हुआ दूत प्रदेश की सत्ता के सामने बेबस दिखा। कहा गया कि शर्मा भविष्य के मुख्यमंत्री हैं, पर योगी ने स्पष्ट कर दिया कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री जनता चुनती है, दिल्ली नहीं। यह बयान नहीं, एक चुनौती थी। संगठन ने उनको उपाध्यक्ष बनाकर पार्किंग जोन में भेज दिया। यानी दिल्ली की बनाई स्क्रिप्ट को लखनऊ ने कूड़ेदान में डाल दिया।
आज वही अरविंद शर्मा मंत्री हैं, पर विभागों के भीतर उनकी हैसियत नाम मात्र की रह गई है। कभी जो खुद को शाह का प्रतिनिधि समझते थे, अब उन्हीं की फाइलें अधिकारियों के टेबल पर ठंडी पड़ी हैं।
दो डिप्टी सीएम, दो असफल प्रयोग
दिल्ली ने सोचा था कि दो डिप्टी सीएम, योगी को संतुलित रखेंगे। एक को शाह का करीबी बताकर, दूसरे को ब्राह्मण संतुलन का प्रतीक बनाकर आगे किया गया। लेकिन योगी ने दोनों को प्रशासनिक व्यवस्था में सीमित कर दिया। फाइलें वहीं जाती जहां मुख्यमंत्री चाहते, निर्णय वहीं होते जहां योगी संकेत देते। लखनऊ के गलियारों में चुटकी ली जाती है इलाज तो ठीक हो रहा है, लेकिन उपमुख्यमंत्री फोन कर दें तो मरीज का नुकसान तय है। यह चुटकी नहीं, सत्ता के भीतर फैली वास्तविकता है। दूसरे डिप्टी सीएम का हाल और भी रोचक अपने ही विधानसभा क्षेत्र में एक नई नवेली उम्मीदवार से हार गए और वह भी तब जब सत्ता, संगठन और संसाधन सब उनके पक्ष में थे। यह पराजय योगी की नहीं, दिल्ली की थी। जिसने समझा कि सत्ता आदेशों से चलती है, जबकि उत्तर प्रदेश में सत्ता सम्मान से चलती है।
योगी का कार्यकाल भय और विश्वास का नया समीकरण
उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि मुख्यमंत्री ने भय और विश्वास दोनों को प्रशासनिक औजार की तरह इस्तेमाल किया। अपराधी डरने लगे, और जनता को विश्वास होने लगा कि सरकार डराने के लिए नहीं संभालने के लिए है। यही वह सूत्र था जिसने योगी को लोकप्रिय और खतरनाक दोनों बना दिया। लोकप्रिय जनता के बीच, और खतरनाक दिल्ली के भीतर। पांच साल का पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद योगी का दोबारा सत्ता में आना सिर्फ भाजपा की जीत नहीं, बल्कि यह संदेश था कि जनता अब दिल्ली नहीं, लखनऊ की भाषा समझती है। यही वजह है कि 403 विधायकों के बीच तमाम असंतोष के बावजूद किसी ने बगावत का झंडा नहीं उठाया क्योंकि जनता योगी के साथ थी। वह भय जो कभी विरोधियों के लिए था, अब दिल्ली के गलियारों तक पहुंच चुका था।
मीडिया माफिया की मिलीभगत सरेंडर की स्क्रिप्ट किसने लिखी
जब योगी नई दिल्ली पहुंचे तो एक लंपट पत्रकार और उसकी लंपट पत्रकारिणी बहन ने ट्वीट किया कि योगी ने शाह-मोदी के आगे सरेंडर कर दिया। असल में वही दिल्ली दरबार की फ्रेंचाइजी चला रहे थे। जहां खबरें विचार नहीं, सौदा बन चुकी थी। वो भूल गए कि जिस आदमी ने गोरखपुर के मठ से निकलकर पूरी राजनीति की भाषा बदल दी, वह दिल्ली में झुकने नहीं, बस मिलने आया था। आज वही पत्रकार दबी जुबान में कहते हैं साहब, अब तो योगी ही भविष्य हैं। भाजपा के भीतर भी कई नेता योगी कार्ड खेलना चाहते हैं, क्योंकि अब यह ब्रांड सत्ता का गारंटी बॉन्ड बन चुका है।
दिल्ली की स्क्रिप्ट जब फेल हुई, तो मीडिया ने दिशा बदल दी। अब वही चैनल योगी मॉडल की प्रशंसा करने लगे, जिन्हें कल तक तानाशाही की चिंता थी।
शाह की चालें और नागपुर का संकेत
अमित शाह, जिन्हें भाजपा का चाणक्य कहा जाता है, उन्होंने पिछले सात साल में उत्तर प्रदेश में हर संभव प्रयोग किया पर परिणाम वही योगी अपरिवर्तनीय।
अब स्थिति यह है कि नागपुर से लेकर तमिलनाडु तक संघ का संकेत साफ है कि योगी भाजपा के भविष्य हैं। शाह की रणनीति अब आत्मरक्षा तक सीमित है। भाजपा के भीतर यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि बिहार चुनाव के बाद शाह अपने प्यादों को हटाएंगे और योगी को खुला मैदान देंगे। यही कारण है कि लखनऊ में अब यह फुसफुसाहट आम है कि 2027 में चुनाव नहीं, प्रधानमंत्री पद की पिच तैयार हो रही है। शाह के लिए यह खतरे की घंटी है, क्योंकि योगी अब संगठन नहीं, भावनाओं के प्रतीक बन चुके हैं। संघ के पुराने कार्यकर्ता खुले शब्दों में कहते हैं योगी में अटल जैसा आत्मविश्वास है और शाह में सत्ता का डर।
भाजपा के भीतर की खामोश लाइन-वार
पार्टी के भीतर अब दो लाइनें स्पष्ट हैं पहली, जो दिल्ली की संगठन सत्ता में यकीन रखती है। दूसरी, जो योगी की जन सत्ता को असली ताकत मानती है। दिल्ली की लाइन फाइलों से चलती है, योगी की लाइन जनता से।
यही अंतर आज भाजपा के भीतर शीत युद्ध की जड़ है। केशव प्रसाद मौर्य से लेकर ब्रजेश पाठक तक, जितने भी नाम योगी के विकल्प के रूप में उछाले गए सब हवा में उड़ गए। योगी ने न तो किसी को अपमानित किया, न किसी पर हमला किया। बस काम से जवाब दिया यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक शस्त्र है। अब वही विधायक जो कभी दिल्ली के भरोसे योगी को चुनौती देने निकले थे, आज उनके चरण छूते हैं। क्योंकि दिल्ली बदलती है, पर लखनऊ में जनता की नब्ज नहीं बदलती।
2027 की जंग प्रधानमंत्री पद की पिच पर योगी का कद
2027 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ उत्तर प्रदेश की सरकार का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। मोदी के बाद पार्टी के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं जो भीड़ को बिना टेली प्रॉम्प्टर के खड़ा कर सके। योगी वही चेहरा है जिनके पास लोकप्रियता, प्रबंधन और नैतिक संतुलन तीनो है। अमित शाह की भूमिका धीरे-धीरे घट रही है।
उनके प्यादे डिप्टी सीएम, शर्मा, और कई संगठनात्मक चेहरे अब खुद के भविष्य के लिए योगी लाइन में खड़े दिखते हैं। कभी जो योगी को गाइड करने आए थे, अब वही गुरु कहने लगे हैं। यही राजनीति का अनिवार्य सत्य है जो झुकता नहीं, अंततः वही झुकवाता है।
* 1998 से अब तक लगातार जनता के भरोसे पर आधारित, बिना परिवार, बिना गुट योगी की राजनीतिक यात्रा।
* दिल्ली की साजिशें संघ, शाह और मीडिया के कई प्रयोग योगी की राजनीतिक जमीन नहीं हिला सके।
* अरविंद शर्मा दिल्ली की क्लोन लीडरशिप की सबसे बड़ी हार।
* डिप्टी सीएम मॉडल सत्ता संतुलन के नाम पर असफल प्रयोग।
* जनता का समर्थन योगी ब्रांड अब उत्तर प्रदेश में राजनीति से ऊपर का प्रतीक बना।
* संघ का संकेत योगी भविष्य हैं, क्योंकि उनमें सत्ता से पहले आस्था है।
* भाजपा की आंतरिक लाइन दिल्ली बनाम लखनऊ का शीत युद्ध अब अंत की ओर।
* 2027 योगी का चेहरा अब सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, संभावित प्रधानमंत्री के रूप में
दिल्ली झुकी नहीं, पर लखनऊ झुकने नहीं दिया
यह लड़ाई सिर्फ दो नेताओं की नहीं थी, दो विचारों की थी। एक, जो सत्ता को संगठन से नियंत्रित करना चाहता है। दूसरा, जो सत्ता को जनता से संचालित करना चाहता है। अमित शाह सत्ता के रणनीतिकार हैं, लेकिन योगी सत्ता के साधक। यही फर्क दिल्ली की हार और लखनऊ की जीत तय कर गया। आज भाजपा के भीतर अगर कोई संतुलित डर पैदा कर सकता है, तो वह न दिल्ली का गृहमंत्री है, न कोई संगठन मंत्री बल्कि वह संन्यासी है जिसने सत्ता को भी साधना में बदल दिया।




